खून के आँसू रोना

 अनाथाश्रम  के पार्क  में बैठे सिन्हा। दम्पत्ति खून के आँसू रो रहे हैं।हालातों के कारण बार-बार उनकी आँखों में खून के आँसू आ रहे हैं,उनके होठों पर थरथराहट और सीने में गर्म लावा धधक रही है।फरवरी महीने में शाम की ठंढ़ी हवाएँ  भी उनके विचलित तन-मन को  सिहरा रही है।दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे का हाथ पकड़कर सुस्त कदमों से अपने छोटे से कमरे में आ जाते हैं।उनकी पत्नी  शीलाजी सोचती हैं कि कहाँ वो आलीशान अपना घर और कहाँ ये छोटा -सा कमरा!

शीलाजी नम आँखों से पति से कहती हैं -" सुनिए जी!हमने पूर्व जन्म में कौन- से पाप किए  थे कि सबकुछ  रहते हुए  भी हमें यहाँ लावारिसों की तरह रहना पड़ रहा है?"


पति सुरेशजी पत्नी को सान्त्वना देते हुए कहते हैं -"शीला! हमने कभी कोई  पाप नहीं किए  हैं।परन्तु एक गलती अवश्य की है कि  हम ममता में जरुर अंधे हो गए थे, जिसके कारण हमें खून के आँसू रोने पड़ रहे हैं।"

शीलाजी ने पति की बातों को अनमने ढ़ग से सुना और  चुपचाप  बिस्तर पर लेट गईं।मन अतीत की गलियों में भटकने लगा।गुजरा हुआ एक-एक लम्हा उन्हें कुरेदता चला गया।


शादी के बारह वर्ष के बाद बेटे उदय का जन्म हुआ था।बेटे के आगमन से मानो उनके बुझे हुए जीवन में फिर से अरुणोदय हो गया।बेटा उदय  बचपन से ही बहुत ही होनहार और संस्कारी था।होनहार पूत के लक्षण पालने में ही दिख जाते हैं।नाम के अनुरूप उसमें भास्कर -सा प्रखर तेज था। उसने पढ़ाई  समाप्त होने पर माता-पिता के कारण बाहर नौकरी करने के बजाय पिता का ही बिजनेस सँभाल लिया।


 अचानक उदय की मुलाकात नीता नाम की लड़की से हुई,जिसके साथ उसे प्यार  हो गया।उसके माता-पिता को नीता का व्यवहार और चाल-चलन बिल्कुल ही पसन्द  नहीं था,परन्तु बेटे की खुशी की खातिर  उन्होंने नीता को बहू बना लिया।नीता ने  पति का बिजनेस  भी ज्वाइन कर लिया।कुछ समय बाद नीता एक बेटे की माँ बन गई। अब घर और ऑफिस  में नीता का रुतबा बढ़ रहा था और सिन्हा दम्पत्ति का कम हो रहा था।धीरे-धीरे सुरेशजी अस्वस्थ रहने लगें।एकलौता बेटा समझकर उन्होंने उदय को पूरा कारोबार सौंप दिया।उन्हें कोई  शिकायत नहीं थी।बेटा-बहू दोनों उनकी इज्जत और मान-सम्मान करते थे।


अचानक से उनकी जिन्दगी बदल गई। एक रात सोते हुए  बेटा उदय के दिल की धड़कन  रुक गई। उनकी तो दुनियाँ ही उजाड़ और वीरान  हो गई। कुछ लोगों ने उदय की मौत के पीछे नीता की साजिश को भी बताया,परन्तु वे लोग बेटे की मौत से गम के समन्दर में इस तरह डूबे थे कि उन्हें कुछ समझ में ही नहीं आया।उस विपत्ति की घड़ी में नीता ने बड़ी ही चालाकी से बिजनेस और घर अपने नाम करा लिया।सुरेश जी ने आँखें मूँदकर बहू पर भरोसा करते हुए  सारे कागजात पर दस्तखत कर दिए।उन्हें इस बात का एहसास तक नहीं हुआ कि मकान के दस्तावेज तक पर बहू दस्तखत ले चुकी है।बिजनेस और मकान अपने नाम करवाने पर बहू ने उन दोनों को घर से निकाल दिया।एक विराट शून्य के सिवा उनके हाथों में कुछ भी नहीं था।किसी तरह भटकते-भटकते वे इस अनाथाश्रम  में पहुँच गए।सोचते-सोचते  शीलाजी की आँखों से अनवरत अश्रुधारा बहने लगीं।


पत्नी की आँसुओं को पोंछते हुए  सुरेशजी ने कहा-" शीला!मत रोओ। भगवान के घर देर है,पर अंधेर नहीं।जिसने हमें खून के आँसू रुलाएँ हैं,एक दिन वह खुद खून के आँसू रोएगा।" 

शीलाजी उठकर आशाभरी नजरों से पति का हाथ थाम लेतीं हैं।


सचमुच हर अनुभव इंसान के जीवन  में सबक लाता है और कुछ कटू-मधुर यादें छोड़ जाता है।आगे बढ़ने का नाम ही जीवन है।

समाप्त। 

लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)


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