पुरानी कहावत बिल्कुल सच है -"जब व्यक्ति का एक पैर जमीन पर पड़े,तभी दूसरा पैर उठाना चाहिए। "
परन्तु कुछ लोग दिखावे के चक्कर में अपना धन तो गँवाते ही हैं,परिवार का मान-सम्मान भी नष्ट कर देते हैं।
आज सोसायटी में मीता के घर के सामने लगी ट्रक को देखकर हम सहेलियों का कलेजा हिल-सा गया।यूँ तो सोसायटी में ट्रकों का आना-जाना कोई नई बात नहीं है,परन्तु हमें मीता के बेटे की नासमझी पर तरस आ रहा था,जिसने दिखावे के चक्कर में अपना फ्लैैट बेच दिया।सीधे सरल उसके माता-पिता उम्र के इस पड़ाव पर किराए के घर में जाने को मजबूर हो गए।
सारा सामान ट्रक में लोड हो जाने के बाद मर्माहत दिल और भींगे नयनों से मीता हम सहेलियों से गले मिलकर फूट-फूटकर रो पड़ी।हमारा अंतर्मन विदीर्ण हो उठा।एक लम्हें के लिए मानो चहुँओर सन्नाटा -सा पसर गया।धीरे-धीरे अवरुद्ध कंठ और मूक वाणी लिए हम सहेलियाँ अपने-अपने फ्लैट में वापस आ गईं।
मैं घर आकर उदास और अनमनी-सी सोफे पर बैठ गई।एक सच्चे दोस्त की प्रतिमूर्ति मीता हमसे दूर जा चुकी थी।उसके साथ बिताए हुए पाँच वर्ष मेरी आँखों के समक्ष चलचित्र की भाँति घूमने लगा।मुझसे एक साल पूर्व मीता के बेटे ने इस सोसायटी में फ्लैट खरीदा था।जब मैं इस सोसायटी में आई थी तो अनजान जगह के कारण मेरा दिल नहीं लग रहा था। शाम में अकेलापन दूर करने के लिए मैं सोसायटी के पार्क में चली गई। वहाँ दुबली-पतली सी सीधी -सरल मीता ने मुझे आकृष्ट किया।साधारण-सी साड़ी में भी उसका सौन्दर्य निखर रहा था।धीरे-धीरे उसके साथ मेरी घनिष्ठ मित्रता हो गई।वह एक घरेलू सीधी-सरल गौरवर्णी संभ्रांत महिला थी।मेरे पति के बीमार होने पर मीता पति-पत्नी ने हमारी काफी मदद की।वैसे तो उसके सरल स्वभाव के कारण सभी सहेलियाँ उसे पसन्द करतीं थीं,परन्तु मेरा उसके साथ कुछ विशेष लगाव हो चला था।वह भी मुझे बड़ी बहन मानते थी।
पिछले कुछ समय से मैंने महसूस किया कि मीता ज्यादा ही खामोश रहने लगी है,बहुत ज्यादा बातें करने की तो कभी उसकी आदत नहीं थी।उसके चेहरे की सरलता उसकी परेशानी को खुद बयां कर रही थी।हमेशा उसकी पेशानी पर बल पड़े रहते थे।चेहरे पर तनाव की लकीरें स्पष्ट दिखतीं थीं।भावनाओं से छलकती आँखों को शून्य में टँगें हुए मैंने कितनी बार देखा।
एक दिन अकेले में कुरेदने पर उसने अपनी सारी मन की व्यथा कह डाली।उसने बताया कि उसके पति प्राइवेट स्कूल में शिक्षक थे।उसकी जिन्दगी हमेशा अभावों में ही गुजरी,परन्तु सीमित साधनों में ही उसने बच्चों को पढ़ाया
लिखाया और एक अपना एक छोटा-सा घर भी लिया था।पाँच बर्ष पूर्व अच्छे पैकेज पर बेटे की विदेश में नौकरी लग गई। अब बेटे को पुराने छोटे घर के कारण शर्म महसूस होने लगी।उसने पुराने घर को बेचकर इस सोसायटी में बड़ा-सा फ्लैट बैंक से लोन लेकर ले लिया।एक साल तक तो सबकुछ ठीक रहा,परन्तु उसके बाद विदेश में उसकी नौकरी छूट गई। बेटा वापस अपने देश लौट आया।यहाँ नौकरी का प्रयास कर ही रहा था कि कोरोना महामारी आ गई। उसके लिए 'सिर मुड़ते ही ओले पड़े' का मुहावरा चरितार्थ हो गया।
नौकरी छूटने के बावजूद बेटे के रहन-सहन और जीवन शैली में कोई बदलाव नहीं आया।दिखावे के लिए उसने अच्छी नस्ल का कुत्ता खरीद लिया।नौकरी छूटने की बात बाहर किसी को नहीं बताता और शानो-शौकत से रहता।एक साल में ही उसकी सारी जमा-पूँजी समाप्त हो गई। मीता पति-पत्नी तो बेटे को समझाने के सिवा कुछ नहीं कर सकते थे।कोरोनाकाल समाप्त होने पर बेटे को नौकरी तो मिल रही थी,परन्तु वह दिखावे के चक्कर में कम पैकेज की नौकरी नहीं कर रहा था। विदेेश की ऊँँची सैलरी का नशा उसके मन से नहीं उतर रहा था।एक साल से बैंक की किश्तें भी नहीं नहीं जा रहीं थीं।आखिर बैंक ने किश्तें न चुकाने के कारण आखिरी नोटिस भेज दी।बैंक की रकम चुकाने के कारण बेटे को आनन-फानन में यह फ्लैट भेजना पड़ा।अपनी कहानी सुनाकर मीता फूट-फूटकर रो पड़ी।
मेरे पास भी मीता को सान्त्वना देने के सिवा कुछ नहीं था।मैंने उसे सान्त्वना देते हुए कहा -"मीता!धैर्य रखो।अच्छे दिन नहीं रहें तो बुरे दिन भी नहीं रहेंगे।तुलसीदास जी ने भी कहा है-सबै दिन न रहत एक समान"।
उसे सान्त्वना देते हुए बार-बार मेरे मन में ख्याल आ रहा था कि मीता का बेटा अगर दिखावे के चक्कर में नहीं रहता और कम पैकेज की नौकरी कर लेता तो उनलोगों को ये दुर्दिन नहीं देखने पड़ते।सच ही कहा गया है कि चाहत की अलगनी पर धोखे के कपड़े नहीं सुखाए जाते,परन्तु मीता का बेटा यही कर रहा था जिसका परिणाम पूरे परिवार को भुगतना पड़ा।
समाप्त।
लेखिका-डाॅक्टर संजु झा(स्वरचित)
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