मुनिया और दादी

 मुनिया भागती हुई आई। अपनी फ्रॉक की जेब से एक पुड़िया निकाली, जिसमें उसने लड्डू छुपाए हुए थे।

जल्दी से पुड़िया अपनी अम्मा-दादी को पकड़ाते हुए बोली –

“अम्मा! बहुत छुपते-छुपाते तुम्हारे लिए लाई हूं, जल्दी से खा लो। अगर माई (माँ) आ गई तो आज हमारी खैर नहीं।”

जर्जर शरीर को किसी तरह समेटते हुए, नन्हीं सी चंचल मुनिया की दादी भीगी आंखों के साथ धीरे-धीरे उठीं और मुनिया को गले लगाकर बोलीं –

“ना जाने कौन से अच्छे कर्म किए मैंने, जो मुझे इतनी प्यारी बिटिया मिली।”

मुनिया ने दादी को अपने से अलग करते हुए कहा –
“लड्डू खा लो अम्मा, क्यों नहीं लेतीं? आज माई ने टीका करवाने का सोचा होगा ना, बनना है मुझे। आप खा कर दिखाओ और बताओ कैसे हैं। मेरा पेट तो आपको खाते हुए देखकर ही भर जाएगा।”

दादी ने आह भरते हुए कहा –
“तू ठीक कहती है बिटिया… बुढ़ापे में सब साथी छूट जाते हैं। कल ही मेरा मन मीठा खाने का कर रहा था।”

मुनिया बोली –
“आज मैं माई के साथ उनके काम पर गई थी। मालिकिन के घर पूजा थी, उन्होंने सबको लड्डू बांटे। मुझे चार लड्डू मिले। दो तो माई ने ले लिए, बाबू को देने के लिए। दो बच्चों को दिए गए। मैं तो हर वक़्त तुम्हारे लिए सोचती हूं, इसलिए छुपा लाई।”

इतने में कम्मो (मुनिया की माँ) की आवाज़ आई।
दोनों – दादी और पोती – का तो मानो दिल ही बैठ गया।
दादी ने जल्दी से लड्डू की पुड़िया अपनी सिरहाने रखे फटे हुए कंबल के नीचे छुपा दी।


तभी पड़ोस की जानकी आई और कम्मो को बताने लगी –
“मेरी सास भगवान को प्यारी हो गईं, इसलिए मैं अपने परिवार के साथ आज शाम की ट्रेन से गांव जा रही हूं। तुम मेरी झुग्गी का ध्यान रखना।”

कम्मो दुख जताने के बजाय बोली –
“तेरे तो भाग खुल गए जो बुढ़िया दुनिया से विदा हो गई।
एक हमारी बुढ़िया को देख, भगवान ने जैसे मरने की तारीख लिखना ही भूल गया है।
यह मर जाए तो घर का कोना खाली हो जाए। कितनी जगह घेरती है चारपाई लेकर।”

जानकी ने भी हामी भरते हुए कहा –
“सच कहती है। तेरी झुग्गी तो बहुत छोटी है। तुम पांचों को एक साथ जमीन पर सोने में कितनी मुश्किल होती होगी। बुढ़िया की चारपाई ही तो घर घेर लेती है।”


यह सब सुन दादी की आंखों से आंसुओं की धारा बह चली।
धीरे-धीरे सोच रही थीं –
“क्या मिला है मुझे इस जिंदगी से…”

तभी कम्मो की आवाज़ से मुनिया घबरा गई।
कम्मो कह रही थी –
“कब तक खटिया तोड़ती रहोगी? अब थोड़ा-थोड़ा चलने की कोशिश करो।”


कम्मो रसोई से खाना लाई।
बच्चे बाहर दोस्तों के साथ खेल रहे थे और मोहन (दादी का बेटा) काम पर गया हुआ था।
कम्मो अकेली ही खाना खाने बैठ गई और दादी को पहली दिन की बासी रोटी हरी मिर्च के साथ दे दी।

कम्मो खुद आनंद से ताज़ा खाना खा रही थी, और दादी को बासी रोटी खाते हुए देखकर चुप थी।

दादी सोच रही थीं –
“चिड़िया (पोती) और मोहन (बेटा) का ही सहारा है… और पोती का प्यार ही है, जो अब तक जिंदा हूं। वरना बहू के अपमान और व्यवहार से तो मैं कब की यह दुनिया छोड़ चुकी होती।”


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