घमंड

 सुमित्रा देवी का चेहरा बदल गया. "यही तो दिक्कत है तुम आजकल की लड़कियों की. अपना पैसा तो जैसे तुम लोगों को काटता है. अरे, मैं अपने बेटे की पॉलिसी की बात कर रही हूँ, तुम्हारी सैलरी नहीं मांग रही. और वैसे भी, राघव मेरा बेटा है. उसके पैसे पर मेरा हक़ है या नहीं?"

काव्या चुप हो गई. राघव, उसका पति, एक सीधा-साधा इंसान था जो अपनी माँ की किसी बात को टाल नहीं सकता था. वह एक एमएनसी में काम करता था, अच्छी तनख्वाह थी, लेकिन घर के आर्थिक फैसलों में सुमित्रा देवी का हस्तक्षेप हमेशा बना रहता था.

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सुबह की गुनगुनी धूप बालकनी में लगे पौधों पर पड़ रही थी. काव्या ने एक हाथ में कॉफ़ी का मग थामा हुआ था और दूसरे हाथ से 'रातरानी' के मुरझाए पत्तों को हटा रही थी. आज रविवार था, हफ़्ते का इकलौता दिन जब उसे ऑफिस की फ़ाइलों और मीटिंग्स की भागदौड़ से थोड़ी राहत मिलती थी. लेकिन ये राहत भी कहाँ पूरी होती थी? घर की जिम्मेदारियाँ किसी न किसी बहाने दस्तक दे ही देती थीं.

"काव्या! काव्या!" अंदर से आवाज़ आई. यह आवाज़ थी उसकी सास, सुमित्रा देवी की.

काव्या ने एक गहरी सांस ली, खुद को मानसिक रूप से तैयार किया और अंदर की ओर बढ़ गई. सुमित्रा देवी सोफ़े पर बैठी थीं, सामने सेंटर टेबल पर ढेर सारे पुराने एल्बम्स और कुछ कागज़ात बिखरे पड़े थे.

"जी माँ जी?" काव्या ने पूछा.

"अरे बहू, देखो तो ज़रा. कल रात को अलमारी साफ़ करते वक़्त ये पुराने कागज़ मिल गए. ये देखो, जब राघव छोटा था, तब हमने ये ज़मीन ली थी. और ये देखो, राघव के मुंडन की फ़ोटो. कितना गोल-मटोल था न?" सुमित्रा देवी ने उत्साह से एक पुरानी ब्लैक एंड व्हाइट तस्वीर दिखाई.

काव्या मुस्कुरा दी. "हाँ माँ जी, बहुत प्यारा लग रहा है."

"और ये देखो," सुमित्रा देवी ने एक और कागज़ निकाला. "ये राघव की पुरानी एलआईसी (LIC) पॉलिसी के कागज़ हैं. इसे रिन्यू करवाना था, शायद डेट निकल गई. तुम तो बैंक में मैनेजर हो न? ज़रा देख कर बताओ तो इसमें कितना पैसा मिलेगा अगर अभी तुड़वा दें?"

काव्या ने कागज़ हाथ में लिया. यह पंद्रह साल पुरानी पॉलिसी थी. "माँ जी, इसे तुड़वाने से नुकसान होगा. अभी दो साल और बचे हैं मैच्योरिटी में. क्यों तुड़वाना चाहती हैं?"

सुमित्रा देवी थोड़ा हिचकिचाईं. उन्होंने अपना चश्मा ठीक किया और बोलीं, "अरे वो... मेरी छोटी बहन की बेटी, रिया की शादी है न अगले महीने. सोच रही थी कि उसे कोई अच्छा सा सेट दिलवा देती. आखिर मेरी सगी भांजी है. अब राघव तो इन सब झमेलों में पड़ता नहीं, और तुम्हारे पास तो वक़्त ही कहाँ होता है घर-गृहस्थी सोचने का. तो सोचा मैं ही कुछ इंतज़ाम कर लूँ."

काव्या को एक पल के लिए झटका लगा. रिया की शादी? वही रिया जिसकी माँ, यानी सुमित्रा देवी की बहन, सरला मौसी ने काव्या की शादी के वक़्त दहेज कम लाने पर तंज कसा था? काव्या को याद आया कि उसकी खुद की शादी में सुमित्रा देवी ने उसे एक भारी-भरकम सोने का हार दिया था, लेकिन बाद में पता चला था कि वो आर्टिफ़िशियल था और असली वाला उन्होंने अपनी बेटी, यानी काव्या की ननद, शिखा के लिए लॉकर में रख दिया था.

"माँ जी," काव्या ने संयमित स्वर में कहा, "पॉलिसी तुड़वाना समझदारी नहीं होगी. और वैसे भी, रिया की शादी में इतना महंगा तोहफ़ा देना ज़रूरी है क्या? अभी तो हमने घर की ईएमआई भी बढ़वा ली है क्योंकि रेनोवेशन का काम चल रहा है."

सुमित्रा देवी का चेहरा बदल गया. "यही तो दिक्कत है तुम आजकल की लड़कियों की. अपना पैसा तो जैसे तुम लोगों को काटता है. अरे, मैं अपने बेटे की पॉलिसी की बात कर रही हूँ, तुम्हारी सैलरी नहीं मांग रही. और वैसे भी, राघव मेरा बेटा है. उसके पैसे पर मेरा हक़ है या नहीं?"

काव्या चुप हो गई. राघव, उसका पति, एक सीधा-साधा इंसान था जो अपनी माँ की किसी बात को टाल नहीं सकता था. वह एक एमएनसी में काम करता था, अच्छी तनख्वाह थी, लेकिन घर के आर्थिक फैसलों में सुमित्रा देवी का हस्तक्षेप हमेशा बना रहता था.

शाम को राघव ऑफिस से लौटा. वह थका हुआ लग रहा था. काव्या ने उसे चाय दी और उसके पास बैठ गई.

"राघव, माँ जी अपनी पुरानी एलआईसी तुड़वाना चाहती हैं," काव्या ने धीरे से कहा.

राघव ने चाय की चुस्की लेते हुए पूछा, "क्यों? अचानक क्या ज़रूरत पड़ गई?"

"रिया की शादी के लिए. वो उसे सोने का सेट देना चाहती हैं."

राघव हंस पड़ा. "क्या? रिया की शादी के लिए मेरी पॉलिसी? माँ भी न... कमाल करती हैं. ठीक है, मैं बात करूँगा उनसे."

लेकिन जब राघव ने बात की, तो सुमित्रा देवी ने घर सिर पर उठा लिया.

"हां-हां, अब तो तुम बीवी की ही सुनोगे. मैंने तुझे पाल-पोसकर बड़ा किया, पढ़ाया-लिखाया, और आज तू मुझसे हिसाब मांग रहा है? मेरी बहन की बेटी की शादी है, मेरी नाक का सवाल है. और तुम दोनों क्या जानो इज्ज़त क्या होती है. तुम तो बस अपना बैंक बैलेंस देखते हो."

सुमित्रा देवी ने रोना-धोना शुरू कर दिया. "तुम्हारे पिताजी होते तो आज मुझे ये दिन न देखना पड़ता. वो तो मेरे एक इशारे पर सब कुछ कर देते थे."

राघव अपनी माँ के आंसुओं के आगे हमेशा की तरह पिघल गया. उसने काव्या की तरफ बेबसी से देखा. काव्या समझ गई कि अब बहस का कोई फायदा नहीं.

"ठीक है माँ, आप रोइए मत. मैं कल ही पेपर साइन कर दूँगा," राघव ने हार मान ली.

काव्या को बहुत गुस्सा आया. यह पैसे उनकी भविष्य की योजनाओं के लिए थे. वे अगले साल एक नई गाड़ी लेने की सोच रहे थे. लेकिन अब वो सपना फिर से टलने वाला था.

अगले दिन बैंक में काव्या का मन काम में नहीं लग रहा था. वह बार-बार सोच रही थी कि कैसे सुमित्रा देवी हमेशा भावनात्मक अत्याचार (emotional blackmail) करके अपनी मनमानी कर लेती हैं. तभी उसके केबिन में एक बुजुर्ग महिला आईं. उनका नाम कमला देवी था. वे अपने पेंशन अकाउंट के सिलसिले में आई थीं.

"बेटी, ज़रा देखो तो मेरी पेंशन आई या नहीं? मेरे बेटे ने कहा था कि इस महीने लेट होगी," कमला देवी ने पासबुक बढ़ाते हुए कहा.

काव्या ने चेक किया. "नहीं माता जी, पेंशन तो एक तारीख को ही आ गई थी. आपके अकाउंट से तो पैसे भी निकल चुके हैं."

कमला देवी के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. "पैसे निकल गए? पर मैंने तो निकाले ही नहीं. मेरा एटीएम कार्ड तो मेरे बेटे... ओह!" वह अचानक चुप हो गईं. उनकी आंखों में एक समझ और एक गहरा दर्द उभर आया.

"क्या हुआ माता जी?" काव्या ने पूछा.

"कुछ नहीं बेटी... शायद मुझे ही भूलने की बीमारी हो गई है. शायद मैंने ही उसे कहा होगा निकालने को," कमला देवी ने लड़खड़ाती आवाज़ में कहा और उठीं. जाते-जाते उन्होंने बुदबुदाया, "अपना पेट काटकर बच्चों को पालो, और वो बुढ़ापे में हमारी ही रोटी छीन लें."

काव्या उन्हें जाते हुए देखती रही. उसे लगा जैसे वह अपना भविष्य देख रही हो. अगर आज उसने कदम नहीं उठाया, तो कल उसकी स्थिति भी शायद ऐसी ही होगी. राघव अच्छा है, लेकिन अपनी माँ के मोह में वह अपने और काव्या के भविष्य को खतरे में डाल रहा है.

शाम को घर लौटते ही काव्या ने देखा कि सुमित्रा देवी बहुत खुश हैं. वे फ़ोन पर अपनी बहन सरला से बात कर रही थीं.

"हाँ दीदी, चिंता मत करो. मैंने राघव से कह दिया है. सेट तो तनिष्क का ही होगा. अरे, अपनी रिया है, कोई पराई थोड़ी है."

काव्या सीधे अपने कमरे में गई. उसने अपनी अलमारी से कुछ निकाला और फिर ड्राइंग रूम में आ गई.

"माँ जी," काव्या ने कहा.

सुमित्रा देवी ने फ़ोन रखा. "हाँ बहू, आ गई? चाय बना लो ज़रा, गला सूख गया बातें करते-करते."

"चाय बाद में बनेगी. पहले मुझे आपसे कुछ बात करनी है," काव्या की आवाज़ में एक अजीब सी दृढ़ता थी.

सुमित्रा देवी ने भौंहें सिकोड़ीं. "क्या बात है?"

काव्या ने एक फाइल टेबल पर रख दी. "यह राघव की पॉलिसी के पेपर्स हैं. और यह... यह उस होम लोन के पेपर्स हैं जो हमने पिछले महीने रेनोवेशन के लिए लिया था."

"तो?"

"तो यह कि अगर आप राघव की पॉलिसी तुड़वाकर रिया की शादी में पैसे देंगी, तो हम होम लोन की ईएमआई नहीं भर पाएंगे. और अगर ईएमआई बाउंस हुई, तो बैंक घर ज़ब्त कर सकता है," काव्या ने झूठ बोला. हालांकि स्थिति इतनी खराब नहीं थी, लेकिन उसे पता था कि सुमित्रा देवी को सिर्फ 'घर जाने' के डर से ही रोका जा सकता है.

सुमित्रा देवी के चेहरे का रंग उड़ गया. "क्या बकवास कर रही हो? राघव की इतनी अच्छी तनख्वाह है, ईएमआई क्यों बाउंस होगी?"

"तनख्वाह अच्छी है माँ जी, लेकिन खर्चे भी तो हैं. और आपको तो पता है, राघव ने पिछले साल शिखा दीदी (ननद) के बेटे के एडमिशन के लिए भी दो लाख दिए थे. वो पैसे अभी तक वापस नहीं आए. हमारी सेविंग्स लगभग खत्म हैं. अगर यह पॉलिसी टूटती है, तो हमारे पास बैकअप के लिए कुछ नहीं बचेगा."

तभी राघव घर में दाखिल हुआ. उसे माहौल में तनाव महसूस हुआ.

"क्या हुआ?" उसने पूछा.

"तेरी बीवी कह रही है कि अगर मैं पॉलिसी तुड़वाऊँगी तो घर नीलाम हो जाएगा!" सुमित्रा देवी ने चिल्लाकर कहा.

राघव ने काव्या की तरफ देखा. काव्या ने उसे आँखों से इशारे में चुप रहने को कहा.

"राघव," काव्या ने कहा, "आप माँ जी को समझाइए कि रिया की शादी में 50 हज़ार का शगुन काफ़ी है. दो लाख का सेट देना हमारी हैसियत से बाहर है. और वो भी तब जब सरला मौसी खुद करोड़पति हैं. उनके दामाद का अपना बिज़नेस है. उन्हें हमारे पैसों की ज़रूरत नहीं है, यह सिर्फ दिखावा है."

"दिखावा?" सुमित्रा देवी आग बबूला हो गईं. "तुम मेरे परिवार को दिखावटी कह रही हो? और तुम होती कौन हो यह तय करने वाली कि मैं क्या दूँ?"

"मैं इस घर की बहू हूँ, माँ जी. और राघव की पत्नी. जब घर पर मुसीबत आती है, तो मुझे भी उसे झेलना पड़ता है. याद है पिछले साल जब आप बीमार पड़ी थीं? अस्पताल का तीन लाख का बिल मैंने अपनी ज्वैलरी गिरवी रखकर भरा था. तब आपकी प्यारी बहन सरला मौसी ने एक बार भी हालचाल नहीं पूछा था, पैसे देना तो दूर की बात है."

सुमित्रा देवी सन्न रह गईं. यह सच था. लेकिन उनका अहंकार मानने को तैयार नहीं था.

"तुम... तुम एहसान जता रही हो?"

"एहसान नहीं, हकीकत बता रही हूँ. राघव, आपको फैसला करना होगा. या तो हम अपनी सुरक्षा और भविष्य चुनें, या फिर रिश्तेदारों की झूठी शान. अगर आप आज यह पॉलिसी तुड़वाते हैं, तो कल को अगर (भगवान न करे) कोई मेडिकल इमरजेंसी आती है, तो हमारे पास एक रुपया नहीं होगा. क्या सरला मौसी तब मदद करेंगी?"

राघव ने एक पल के लिए अपनी माँ को देखा, फिर काव्या को. उसे काव्या की बातों में सच्चाई नज़र आ रही थी.

"माँ," राघव ने पहली बार अपनी माँ की आंखों में आंखें डालकर कहा, "काव्या सही कह रही है. हम पॉलिसी नहीं तुड़वाएंगे. मैं रिया के लिए 51 हज़ार का लिफाफा और एक अच्छी सी साड़ी भिजवा दूँगा. इससे ज़्यादा हम नहीं कर सकते."

"राघव! तू अपनी माँ की बात काट रहा है?" सुमित्रा देवी ने अपनी छाती पीटना शुरू कर दिया. "हाय राम, कलयुग आ गया. जोरू का गुलाम बन गया मेरा बेटा."

"ड्रामा बंद कीजिए माँ," राघव की आवाज़ ऊंची हो गई. "आप हर बार यही इमोशनल ड्रामा करती हैं. शिखा दीदी को पैसे दिए, वापस नहीं मिले. मौसी को पिछले साल तीर्थ यात्रा के लिए पैसे दिए, उन्होंने थैंक यू तक नहीं बोला. मैं मेहनत करता हूँ, दिन-रात खटता हूँ, ताकि हम सुख से रह सकें. दूसरों की झोली भरने के लिए नहीं."

सुमित्रा देवी चुप हो गईं. बेटे का यह रूप उन्होंने पहले कभी नहीं देखा था.

"और सुनिए," राघव ने आगे कहा, "वह पॉलिसी मेरे नाम पर है, लेकिन उसके नॉमिनी पापा थे, और पापा के बाद अब काव्या है. क्योंकि अगर मुझे कुछ हुआ, तो मेरा घर काव्या संभालेगी, सरला मौसी नहीं."

राघव अपने कमरे में चला गया. काव्या ने सुमित्रा देवी को पानी का गिलास दिया, लेकिन उन्होंने हाथ मारकर गिरा दिया और अपने कमरे में जाकर दरवाज़ा बंद कर लिया.

अगले दो दिन घर में सन्नाटा रहा. सुमित्रा देवी ने खाना-पीना छोड़ दिया. राघव परेशान था, लेकिन काव्या ने उसे समझाया कि यह सिर्फ दबाव बनाने का तरीका है.

तीसरे दिन, दरवाजे की घंटी बजी. काव्या ने दरवाज़ा खोला तो सामने सरला मौसी खड़ी थीं. उनके साथ उनकी बेटी रिया भी थी.

"अरे काव्या, कैसी हो? दीदी हैं क्या?" सरला मौसी ने अंदर आते हुए पूछा.

सुमित्रा देवी आवाज़ सुनकर बाहर आईं. उनका चेहरा उतरा हुआ था.

"अरे दीदी, तुम तो फ़ोन ही नहीं उठा रही. मैं तो कार्ड देने आई थी," सरला मौसी ने मिठाई का डिब्बा और कार्ड टेबल पर रखा. "और सुनो, एक खुशखबरी है. रिया के ससुराल वालों ने कहा है कि उन्हें दहेज-वहेज कुछ नहीं चाहिए. बस शादी सादगी से हो जाए. उन्होंने तो यह भी कहा है कि लड़की वालों की तरफ से कोई महंगा तोहफ़ा न दिया जाए."

सुमित्रा देवी चौंक गईं. "क्या? सच में?"

"हाँ दीदी. और सुनो, मुझे तुमसे एक माफ़ी भी मांगनी थी. पिछली बार जब तुम बीमार थीं, मैं आ नहीं पाई थी. दरअसल, मेरे पति का बिज़नेस घाटे में चल रहा था, हम बहुत परेशान थे. हमें शर्म आ रही थी बताने में. अब हालात थोड़े सुधरे हैं."

सरला मौसी ने सुमित्रा देवी का हाथ पकड़ा. "दीदी, तुमने राघव से जो सेट की बात की थी न, उसकी कोई ज़रूरत नहीं है. तुम बस आ जाना और आशीर्वाद देना. वही सबसे बड़ा तोहफ़ा है."

सुमित्रा देवी की आँखों में आंसू आ गए. उन्हें अपनी गलती का अहसास हुआ. वे अपनी झूठी शान के लिए अपने बेटे और बहू पर दबाव डाल रही थीं, जबकि उनकी बहन को उसकी ज़रूरत ही नहीं थी.

रिया काव्या के पास आई. "भाभी, आपकी वो ग्रीन वाली साड़ी बहुत सुंदर है. क्या मैं शादी के एक फंक्शन के लिए उसे पहन सकती हूँ? मम्मा कह रही थीं कि आपकी चॉइस बहुत क्लासी है."

काव्या मुस्कुरा दी. "ज़रूर रिया. तुम मेरे कमरे से ले लेना. और हाँ, मैचिंग ज्वैलरी भी ले जाना."

रिया खुश होकर काव्या के गले लग गई.

शाम को जब मेहमान चले गए, तो सुमित्रा देवी काव्या के पास आईं. वे रसोई में सब्जी काट रही थीं.

"बहू," सुमित्रा देवी ने धीमे स्वर में कहा.

काव्या ने मुड़कर देखा. "जी माँ जी?"

"मुझे माफ़ कर दो. मैं अपनी ज़िद में यह भूल गई थी कि तुम दोनों भी मेरे अपने हो. मैं बाहर वालों की वाहवाही के चक्कर में घर की शांति भंग कर रही थी. राघव ने सही कहा, बुरे वक़्त में तुम ही काम आई थीं."

काव्या ने सुमित्रा देवी के हाथ थाम लिए. "माँ जी, माफ़ी मत मांगिए. आप बस यह समझिए कि हम आपके दुश्मन नहीं हैं. हम भी चाहते हैं कि परिवार का नाम हो, लेकिन घर की नींव हिलाकर नहीं. अगर नींव मज़बूत रहेगी, तभी तो हम दूसरों की मदद कर पाएंगे."

सुमित्रा देवी ने काव्या के माथे को चूमा. "तू सच में समझदार है. मैंने ही तुझे समझने में देर कर दी."

रात को खाने की टेबल पर हंसी-मज़ाक गूंज रहा था. राघव को यकीन नहीं हो रहा था कि सब कुछ इतनी जल्दी ठीक हो गया.

"अरे राघव," सुमित्रा देवी ने खाते हुए कहा, "वो पॉलिसी रिन्यू करवा लेना. और नॉमिनी में... नॉमिनी में काव्या का नाम ही रहने देना. ठीक है?"

राघव और काव्या ने एक-दूसरे को देखकर मुस्कुरा दिया.

उस रात काव्या बाल्कनी में खड़ी होकर आसमान को देख रही थी. 'रातरानी' के मुरझाए पत्तों के बीच एक नई कली खिल रही थी. उसे लगा कि रिश्तों में भी ऐसा ही होता है. कभी-कभी पुराने, सड़े-गले विचारों को छांटना पड़ता है ताकि नई समझ और प्रेम की कलियां खिल सकें.

उसने एक गहरी सांस ली. हवा में ठंडक थी, लेकिन मन में एक सुकून वाली गर्मी. उसने महसूस किया कि 'न' कहना मुश्किल होता है, लेकिन कभी-कभी एक सही 'न' कई गलत 'हाँ' से बेहतर होता है. उसने न सिर्फ अपने पैसे बचाए थे, बल्कि अपने परिवार को एक बड़ी दरार से भी बचा लिया था.

पीछे से राघव आया और उसके कंधे पर हाथ रखा.

"थैंक यू, काव्या."

"किसलिए?"

"मुझे सही रास्ता दिखाने के लिए. और माँ को संभालने के लिए."

काव्या ने राघव के कंधे पर सिर रख दिया. "यह हमारा घर है राघव. इसे संभालना हम दोनों की जिम्मेदारी है."

चांद बादलों के पीछे से निकल आया था, ठीक वैसे ही जैसे इस घर की खुशियां गलतफहमियों के बादलों से बाहर निकल आई थीं.

लेखिका : मनोरमा शर्मा 


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