आंखें चार होना

 ‌ दोनों लखनऊ स्टेशन से ट्रेन में चढ़े थे।

"आपको कहां जाना है?मैं दिल्ली जा रही हूं और आप?"लड़की ने कहा।

"मैं भी दिल्ली ही जा रहा हूं।"लड़के ने कहा। दोनों मुस्कुरा दिए थे।"दिल्ली में क्या करते हैं आप?"लड़की ने पूछा

"मैं दिल्ली में एक कंपनी में काम करता हूं। 2 दिनों की छुट्टी थी इसलिए मम्मी- पापा से मिलने चला गया था और अब वापस दिल्ली जा रहा हूं। मैं लखनऊ में रहता हूं।"

"और मैं अपनी मम्मी पापा से मिलने दिल्ली जा रही हूं ।मैं लखनऊ में जॉब करती हूं।"

"अरे वाह! तब तो हम मिल भी  सकते हैं।" खुशी से चहकते हुए लड़के ने कहा।

सच में, हम मिल सकते हैं ,जरूर मिलेंगे क्यों नहीं!"मुस्कुराते हुए लड़की ने कहा। अरे हां, हम एक दूसरे का नाम तो जान लें। दोनों एक साथ बोल पड़े थे और  ठहाका लगाकर हंस पड़े थे।

मैं शेखर। और मैं सृष्टि।

दोनों अपने-अपने बर्थ पर आ गए। संजोग से दोनों की सीट आमने-सामने थी।  दोनों एक दूसरे से हर तरह की बातें करते रहे। ऐसा जान पड़ा था जैसे दोनों एक दूसरे को जानते समझते रहे हो। दोनों आपस में खाना-पीना भी शेयर किए। बातचीत करते ,एक दूसरे को जानते-समझते,समय कैसे बीत गया पता ही नहीं चला। बातचीत का लेनदेन होते-होते अंततः फोन का भी लेन-देन हुआ। "अरे शेखर !अब तो हमारा स्टेशन भी आ गया।"सृष्टि ने मासूमियत से कहा।

"अरे हां सृष्टि!" शेखर भी मायूस हो गया था। ऐसा लग रहा था जैसे दोनों एक दूसरे को बहुत दिनों से जानते हों।

ट्रेन की इस सफर में इतनी प्रगाढ़ता इतनी आत्मीयता!! दोनों के मन में यही मंथन हो रहा था। दोनों एक दूसरे से मन की बात कह नहीं पा रहे थे लेकिन दोनों की आंखें चार हो गई थीं, यानी कि उन्हें प्यार हो ही गया था। दोनों की मन: स्थिति एक जैसी थी। अगला स्टेशन दिल्ली आते हीं दोनों अपने-अपने बैग के साथ उतरे। ट्रेन में चढ़ते समय दोनों मुस्कुराहट के साथ मिले थे, उतरते समय दोनों के चेहरे पर मायूसियत नजर आ रही थी । दरअसल उन्हें प्यार हो गया था। ट्रेन के इस सफर में प्यार सफर करने लगा था।कहते हैं ना! प्यार, स्थान और समय से परे होता है। कब, कैसे, और कहां हो जाए ,कोई नहीं जान पाता। प्यार हो गया तो हो गया।  ट्रेन से उतर

दोनों एक दूसरे से हाथ मिलाएं। दोनों अपने-अपने ऑटो रिक्शा पकड़े और हाथ हिलाते हुए एक दूसरे को तब -तक देखते रहे जब -तक आंखों से ओझल नहीं हुए।


दोनों की फोन पर बातें होतीं रहतीं थीं। दूर रहकर भी वे बहुत करीब थे। दोनों के हृदय तल में प्यार की ज्योति जलने लगी और एक दूसरे के लिए तड़प बढ़ने लगी। और तब......

शेखर ने अपनी मम्मी से सृष्टि के साथ प्रेम प्रसंग को बताया और उसके साथ शादी की इच्छा जाहिर की । सृष्टि भी अपने मम्मी- पापा से शेखर से प्यार होने की बात बता चुकी थी । दोनों परिवारों की रजामंदी से शेखर और सृष्टि की शादी हो गई।


संगीता श्रीवास्तव

लखनऊ

स्वरचित , अप्रकाशित।


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