राजू के बड़े भाई बोले –
“वकील साहब कितने बजे तक आएंगे? हमें शाम को निकलना भी है।
अगर बाबूजी की वसीयत का यह नाटक नहीं होता तो हम कल ही निकल जाते।
बाबूजी को क्या ज़रूरत थी वसीयत बनाने की?
सब कुछ तो हम तीनों भाइयों का ही था, बराबर बाँट लेते।
दिल्ली में इतनी छुट्टी नहीं मिलती,
न ही बच्चों की स्कूल में और न ही ऑफिस में।”
राजू भला-बुरा और सच्चे दिल का इंसान था।
वैसे तो वह हमेशा हंसता-मुस्कुराता रहता था,
लेकिन अभी कुछ दिनों से उदास और खामोश हो गया था।
और होता भी कैसे नहीं?
अभी 13 दिन पहले ही उसके बाबूजी उसे हमेशा के लिए छोड़कर चले गए थे।
बाबूजी सिर्फ उसके पिताजी नहीं थे,
उसकी पूरी दुनिया थे।
उसकी जान बसती थी उनमें।
उन दोनों बड़े भाइयों के लिए जो “नालायक” बेटा कहलाता था,
वही बाबूजी की सबसे बड़ी ताक़त था।
जब राजू हाई स्कूल में था,
तभी माँ गुजर गई थी।
उस समय दोनों भाई शहर में थे।
सिर्फ राजू ही था उनके पास।
मरने से पहले माँ ने राजू का हाथ पकड़कर कहा था –
“बेटा, मुझे वचन दे कि तू अपने बाबूजी को कभी अकेला नहीं छोड़ेगा,
हमेशा उनका ख्याल रखेगा।”
राजू ने काँपते हाथों से माँ को वचन दे दिया था।
उसने यह बात न तो बाबूजी को बताई और न ही अपने भाइयों को।
गांव में सिर्फ इंटर तक स्कूल था।
बड़े भाई इंजीनियर थे,
उन्होंने राजू को शहर बुलाकर इंजीनियरिंग करने को कहा।
छोटे भाई, जो खुद डॉक्टर थे, उन्होंने भी कहा –
“तू बता, जो पढ़ाई करना है, मैं अच्छे कॉलेज में एडमिशन करवा दूँगा।”
राजू पढ़ना चाहता था,
लेकिन भाभियों के व्यवहार के कारण
उसमें समझाने की हिम्मत ही नहीं थी।
बड़ी भाभी गाँव आने से कतराती थीं।
छोटे भाई ने भी माँ के जाने के एक साल बाद
अपनी सहकर्मी डॉक्टर से शादी कर ली।
उन्हें तो गाँव का माहौल वैसे भी पसंद नहीं था।
ऐसे में बाबूजी को शहर ले जाना संभव नहीं था,
और गाँव छोड़कर जाना भी नहीं।
हरी काका ने कहा था –
“राजू बेटा, तुम चले जाओ,
मैं बाबूजी का ध्यान रख लूँगा।”
पर राजू का मन नहीं माना।
उसने पढ़ाई छोड़ने का फैसला कर लिया।
बाबूजी ने बहुत समझाया,
लेकिन राजू अपने निर्णय पर अटल रहा।
गांव में रहकर खेती शुरू की।
इतनी मेहनत की कि हर साल सबसे अच्छी फसल
राजू के ही खेत में होती।
पैसा मिलता तो बाबूजी ज़मीन खरीदते।
धीरे-धीरे आसपास के गांव में सबसे ज्यादा ज़मीन
राजू और उसके बाबूजी के पास हो गई।
बाबूजी हमेशा कहते –
“ये ज़मीन तेरे नाम कर दूँ।”
लेकिन राजू हमेशा बाबूजी के नाम ही कर देता।
बाबूजी ने पास के गांव की एक लड़की सुनीता से
राजू की शादी कर दी।
शादी से पहले राजू ने सुनीता को माँ का वचन बता दिया।
कहा –
“भविष्य में कभी भी तुम मुझसे शहर जाने को मत कहना।
मैं अपने बाबूजी को छोड़कर कहीं नहीं जाऊँगा।”
राजू का यह समर्पण सुनकर सुनीता
उसकी दीवानी हो गई थी।
वह अक्सर कहती –
“मैं बहुत खुशनसीब हूँ,
जो मुझे राजू जैसा देवता पति मिला है।”
भाभियाँ घमंडी थीं।
सुनीता को “थर्ड क्लास” कहकर बुलाती थीं।
सुनीता जवाब नहीं देती,
सोचती –
“साल में कभी-कभी ही तो आती हैं,
अब क्या बहस करें?”
आखिरकार वह दिन आ गया।
वकील साहब आए।
आंगन में पूरा परिवार, गांव के बुजुर्ग और सभी रिश्तेदार बैठे थे।
सब सोच रहे थे –
आज अपने-अपने हिस्से की प्रॉपर्टी लेकर निकल जाएंगे।
वकील साहब ने वसीयत पढ़नी शुरू की –
“मेरे नालायक बेटों!
तुम्हें हमेशा यही लगता रहा कि राजू नालायक है।
लेकिन सच यह है कि ऐसा बेटा सदियों में जन्म लेता है।
उसने मेरा ख्याल बेटे की तरह नहीं,
माँ की तरह रखा।
अपनी माँ को दिए वचन के लिए
उसने अपना पूरा जीवन कुर्बान कर दिया।
मेरे पास जो कुछ भी है,
वह सिर्फ और सिर्फ राजू की मेहनत का नतीजा है।
इसलिए मेरी सारी संपत्ति सिर्फ राजू की है।
मेरी शहरी बहुओं का उन गहनों पर कोई अधिकार नहीं है
जिन्हें पहनने में उन्हें शर्म आती है।
वे सारे गहने मेरी बहू सुनीता के हैं।
मेरे लायक बेटों ने कभी पलटकर यह नहीं देखा
कि मैं कैसा हूँ,
मुझे क्या चाहिए।
जब-जब मैं बीमार पड़ा,
मेरे राजू ने मेरी सेवा की।
मेरे दूसरे बेटों ने तो मिलने तक की ज़रूरत नहीं समझी।”
वसीयत पढ़ी जा चुकी थी।
जो लोग राजू को नालायक कहते थे,
वे सब चुप खड़े थे।
दोनों बड़े भाई गुस्से में अपने परिवार के साथ
हमेशा के लिए चले गए।
आंगन में खड़ा राजू अब गांव का सबसे अमीर व्यक्ति था।
लेकिन वह खुद को सबसे गरीब महसूस कर रहा था।
क्योंकि उसकी असली दौलत – उसके बाबूजी –
उसे हमेशा के लिए छोड़कर जा चुके थे।
0 टिप्पणियाँ