ममता का असली वारिस

 लक्ष्मी देवी बरामदे में बैठी तुलसी को पानी दे रही थीं। उम्र का असर उनके शरीर पर साफ झलकता था। कमर झुकी रहती और कदम भी भारी हो चुके थे। मगर दिल में अभी भी अपने दोनों बेटों के लिए ढेर सारा प्यार और ममता समेटे हुए थीं।

उनके दो बेटे थे—अमित और राकेश। अमित स्वभाव से गंभीर, जिम्मेदार और परिवार के प्रति समर्पित। वहीं छोटा बेटा राकेश आलसी, थोड़ा चालाक और हर वक्त आरामतलबी का शौकीन। पति राजेंद्र प्रसाद का कई साल पहले देहांत हो चुका था। जाते-जाते उन्होंने अपनी पत्नी से कहा था—

“लक्ष्मी, बड़ा बेटा अमित जिम्मेदार है। पुराने बाजार वाली दुकान उसी को देना। और नई दुकान मैं राकेश के नाम लिख जाऊँगा। दोनों के हिस्से बराबर रहेंगे, कोई कड़वाहट नहीं होगी।”

राजेंद्र प्रसाद साड़ियों का बड़ा व्यापार करते थे। समय रहते उन्होंने दोनों बेटों को अलग-अलग दुकानें दे दी थीं। अमित को पुराना बाजार और राकेश को नयी मार्केट में नई दुकान।

शुरुआती दिनों में सब ठीक चला, मगर समय के साथ राकेश का व्यापार गिरता चला गया। उसकी लापरवाही, मौज-मस्ती और दोस्तों में वक्त बरबाद करने की आदतों ने दुकान को कमजोर कर दिया। दूसरी ओर अमित ने मेहनत और ईमानदारी से पुरानी दुकान को नई ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया।

एक शाम राकेश की पत्नी संध्या बड़बड़ाते हुए कमरे से निकली—
“राकेश, मुझसे नहीं होती हर समय तुम्हारी मम्मी की सेवा। दिन-रात कोई न कोई काम। अभी-अभी मैं लेटी ही थी कि उन्होंने कॉफी माँग ली। क्या मैं उनकी नौकरानी हूँ?”

राकेश ने धीरे से समझाया—
“संध्या, कुछ दिन की ही बात है। मम्मी को खुश रखो। जब तक वो बड़े बाजार वाला घर और पुरानी दुकान मेरे नाम नहीं कर देतीं, तब तक उनकी तीमारदारी करनी ही पड़ेगी। उसके बाद तो अमित और उसकी पत्नी ही संभालेंगी उन्हें। हमें तो सिर्फ घर और दुकान चाहिए। सोचो, तुम घर की रानी बनोगी और मैं दुकान का मालिक।”

दरवाजे के पास खड़ी लक्ष्मीदेवी ने यह सब सुन लिया। पहले तो उन्हें विश्वास ही नहीं हुआ। वो तो संध्या को यह कहने आई थीं कि— “कॉफी मत बनाना, मैं मंदिर से लौटकर पी लूँगी।” लेकिन जो कानों में पड़ा, उसने उन्हें भीतर तक हिला दिया।

“तो यह वजह है अचानक मेरे प्रति इनकी मिठास और सेवा भाव की! असलियत तो संपत्ति है, ममता नहीं।”

लक्ष्मीदेवी की आँखों में आँसू भर आए।

लक्ष्मीदेवी को वह दिन याद आया जब राजेंद्र प्रसाद ने दोनों बेटों को दुकानें बाँटी थीं।

उन्होंने राकेश से कहा था—
“बेटा, यह नई दुकान है। मेहनत से चलाओगे तो बहुत आगे जाओगे।”

राकेश उस समय खुशी से फूला नहीं समाया था। पुरानी दुकान अमित को मिलने पर उसने ताना भी मारा था—
“भैया को तो पुरानी चीजें पसंद हैं, मुझे तो नई चाहिए। देखना, मैं इस दुकान को सबसे बड़ा ब्रांड बना दूँगा।”

मगर समय का खेल देखिए—आज अमित की दुकान दिन दूनी रात चौगुनी तरक्की कर रही थी और राकेश की दुकान घाटे में थी।

उस रात लक्ष्मीदेवी ने नींद की बजाय एक फैसला लिया।
“राजेंद्र जी, आपने जाते-जाते कहा था कि बड़ा बाजार वाली दुकान अमित को मिले। अब वही होगा। राकेश चाहे कुछ भी सोचे, मैं संपत्ति गलत हाथों में नहीं जाने दूँगी।”

अगली सुबह उन्होंने अमित को बुलाया और सारी बात बता दी। अमित पहले तो चौंक गया, फिर बोला—
“मां, मैं आपके निर्णय के खिलाफ नहीं जाऊँगा। मगर मैं नहीं चाहता कि राकेश और भाभी को लगे कि मैंने आपसे कुछ कहलवाया। आप जैसा उचित समझें, वैसा कीजिए।”

लक्ष्मीदेवी ने बेटे के सिर पर हाथ रखा।
“बेटा, तू हमेशा अपने कर्तव्य को निभाता आया है। यही तेरी सबसे बड़ी पूँजी है।”

कुछ दिनों बाद लक्ष्मीदेवी ने पूरे परिवार को बैठक में बुलाया। सबके सामने उन्होंने कहा—
“बड़े बाजार वाला घर और दुकान अमित के नाम होंगे। यह तुम्हारे पिताजी की आखिरी इच्छा थी और मैं उसी को पूरा कर रही हूँ।”

राकेश और संध्या के चेहरे उतर गए।

संध्या गुस्से से बोली—
“मम्मी, आपने हमारे साथ अन्याय किया है। सारी ज़िंदगी आपकी सेवा की और आखिर में सब भैया को?”

लक्ष्मीदेवी ने दृढ़ आवाज़ में कहा—
“सेवा? जो सेवा स्वार्थ से की जाए, वह सेवा नहीं कहलाती बहू। सेवा तो वही है जिसमें बदले की अपेक्षा न हो। तुमने मुझे नौकरानी समझा और अमित ने मुझे मां समझा। यही अंतर है।”

राकेश चुप हो गया। उसके पास कोई जवाब नहीं था।

समय बीतता गया। अमित ने दुकान को और भी सफल बनाया। उसने अपनी कमाई से भाई राकेश की दुकान को भी संभालने की कोशिश की, मगर राकेश की आदतें कहाँ बदलने वाली थीं।

लक्ष्मीदेवी अपने आखिरी दिनों में अमित के घर पर रहीं। बहू कविता ने उन्हें मां की तरह सेवा दी। लक्ष्मीदेवी के मन में संतोष था कि उन्होंने अपनी संपत्ति सही हाथों में दी।

अपने अंतिम क्षणों में उन्होंने कहा—
“ममता का असली वारिस वही होता है, जो बिना स्वार्थ मां-बाप की सेवा करे। धन-दौलत तो आनी-जानी चीज़ है, मगर असली पूँजी इंसान का चरित्र और कर्तव्य होता है।”

यह कहानी हमें बताती है कि माता-पिता के प्रति सेवा और सम्मान कभी लालच के लिए नहीं होना चाहिए। जो संतान अपने माता-पिता की सच्चे मन से देखभाल करती है, वही वास्तव में उनकी संपत्ति और आशीर्वाद की हकदार होती है।


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