कनक जब से सागर से ब्याह कर इस घर में आई थी, तब से उसने देखा कि एक छोटी-सी लड़की उसके इर्द-गिर्द चुपचाप मंडराती रहती थी। उम्र रही होगी पाँच-छह साल। बड़ी-बड़ी आँखों में अजीब-सा डर, होंठ जैसे हमेशा सिले हुए, और हाथों में गुड़िया का एक टूटा-फूटा टुकड़ा।
कनक ने मुस्कुराकर उसे अपने पास बुलाया –
“आओ बेटा, ज़रा मेरे पास।”
लड़की झट से कमरे से बाहर भाग गई। कनक को अजीब-सा लगा, मगर उसने मन में सोचा, शायद मुझसे घबराती है। नई जगह, नई बहू… बच्चों को समय तो लगता ही है।
कुछ देर बाद वही बच्ची फिर दरवाज़े पर खड़ी थी। कनक ने इस बार चॉकलेट निकालकर कहा –
“देखो, ये तुम्हारे लिए लाई हूँ। पसंद है न तुम्हें?”
लड़की ने धीरे-धीरे कदम बढ़ाए, हाथ से चॉकलेट ली, मगर तुरंत कमरे के कोने में जाकर खड़ी हो गई। उसकी आँखों में जैसे कोई दबी हुई घबराहट थी।
कनक ने ससुराल वालों से पूछा –
“ये बच्ची कौन है?”
सासु माँ ने ठंडी साँस लेकर कहा –
“ये रानी है… तुम्हारे जेठ हरिशंकर की बेटी। उसकी माँ का देहांत प्रसव के समय ही हो गया था। तब से यह बच्ची घर में पल तो रही है, पर माँ का आंचल कभी नसीब नहीं हुआ।”
कनक का दिल पिघल गया। उसने सोचा, ये बच्ची तो बिल्कुल अकेली है। यही वजह है कि यह किसी से खुलकर बात नहीं करती।
अगले दिन कनक ने रानी को अपने साथ बैठाकर बालों में चोटी बनाने की कोशिश की।
“इतने उलझे बाल… चलो आज मैं इन्हें ठीक कर दूँ।”
रानी चुप रही, मगर उसकी आँखों में एक चमक-सी आई। शायद उसे पहली बार किसी ने स्नेह से छुआ था। उस दिन पहली बार रानी ने मुस्कुराकर “थैंक्यू” कहा।
कनक को लगा जैसे उसके दिल में कोई मधुर संगीत बज उठा हो।
धीरे-धीरे रानी उसके कमरे में आने लगी। कभी स्कूल की कॉपी दिखाती, कभी अपनी गुड़िया। कनक भी उसे कहानियाँ सुनाती – राजकुमार, परियाँ और माँ-बेटी के प्यार की कहानियाँ।
रानी अक्सर कहती –
“कनक दीदी, मेरी भी मम्मी होती तो मुझे रोज़ बाल बनातीं, मेरे साथ खेलतीं।”
कनक की आँखें भर आतीं। वह उसे सीने से लगाकर कहती –
“अबसे मैं ही तुम्हारी मम्मी हूँ।”
लेकिन घर में सबको यह रिश्ता सहज नहीं लगता था। खासकर सागर।
एक दिन उसने कनक से कहा –
“तुम क्यों इस बच्ची के पीछे पड़ी रहती हो? वो जेठ की बेटी है। हमारा क्या लेना-देना?”
कनक ने दृढ़ स्वर में कहा –
“सागर, यह बच्ची माँ के स्नेह से वंचित है। अगर हम भी इसे अनदेखा करेंगे तो यह बिल्कुल अकेली हो जाएगी। सोचो, अगर हमारी बेटी होती और यूँ बेसहारा रह जाती तो?”
सागर चुप हो गया। उसने पहली बार पत्नी की आँखों में देखा – वहाँ करुणा और ममता का अथाह सागर लहरें मार रहा था।
धीरे-धीरे रानी कनक से खुलने लगी, लेकिन एक बात थी जो उसे हमेशा परेशान करती।
कभी खाना खाते-खाते अचानक उसका हाथ काँपने लगता, कभी रात को चीखते हुए उठ जाती।
एक रात कनक ने उसे सीने से लगाकर पूछा –
“क्या हुआ बेटा? क्यों डर गई?”
रानी ने सिसकते हुए कहा –
“जब मैं बहुत छोटी थी, सब कहते थे कि माँ मुझे छोड़कर चली गईं। सब मुझसे कहते हैं कि मैं अपशगुनी हूँ, तभी माँ मर गईं। दीदी… क्या सच में मैं ही बुरी हूँ?”
कनक की आँखों से आँसू बह निकले। उसने रानी का चेहरा थामते हुए कहा –
“नहीं बेटा! तुम भगवान की सबसे प्यारी संतान हो। माँ का जाना तुम्हारी गलती नहीं है। अबसे कोई भी तुम्हें अपशगुनी कहेगा तो पहले उसे मुझसे बात करनी होगी।”
उस दिन रानी पहली बार चैन से सोई।
गाँव में त्योहार आया। सब रिश्तेदार घर आए हुए थे। रानी नई फ्रॉक पहनकर कनक के पीछे-पीछे घूम रही थी। तभी किसी चाची ने ताना मारा –
“अरे, ये तो वही अपशगुनी लड़की है… इसके कारण ही तो इसकी माँ गई। कनक बहू, इसे ज्यादा सिर पर मत चढ़ाओ।”
रानी का चेहरा उतर गया। वह भागकर आँगन के कोने में छिप गई।
कनक का खून खौल उठा। उसने सबके सामने ऊँची आवाज़ में कहा –
“रानी मेरी बेटी है। और मेरी बेटी को कोई अपशगुनी कहेगा, तो यह मैं बर्दाश्त नहीं करूँगी। बच्चा कभी अपशगुनी नहीं होता। बच्चा तो भगवान का दिया आशीर्वाद होता है।”
सारा माहौल सन्नाटे में डूब गया। सास-ससुर भी सिर झुकाकर रह गए। पहली बार सबको एहसास हुआ कि इस बच्ची को तानों से नहीं, प्यार से जीने का हक़ चाहिए।
धीरे-धीरे पूरा घर रानी से अपनापन जताने लगा। सागर भी अब रानी के साथ खेलता, उसे स्कूल छोड़ने जाता।
एक दिन कनक मंदिर जाने लगी तो रानी ने उसका आँचल पकड़ लिया –
“मम्मी… आप मुझे छोड़कर तो नहीं जाओगी न?”
कनक की आँखें छलक पड़ीं। उसने रानी को गले से लगाकर कहा –
“नहीं बेटा, माँ कभी अपनी संतान को नहीं छोड़ती।”
उस दिन से रानी के होंठों पर डर की जगह हमेशा मुस्कान रहने लगी।
कनक ने जिस बच्ची को पहली बार चुपचाप कमरे के कोने में खड़ा देखा था, वही रानी अब आँगन में खिलखिलाती दौड़ती फिरती थी। उसकी आँखों में अब डर नहीं, आत्मविश्वास था। और यह सब संभव हुआ था एक बहू की ममता और उसके साहस से।
इस कहानी का संदेश यही है –
रिश्ते खून से नहीं, दिल से बनते हैं। और जब कोई औरत किसी बच्चे को ममता से गले लगाती है, तो वह माँ कहलाने का हक़दार हो जाती है।
0 टिप्पणियाँ