बेटा... मैं तुम्हारे मामा के घर जा रही हूं।
क्यों मां, और तुम आजकल मामा के घर बहुत जा रही हो ... तुम्हारा मन मान रहा तो चली जाओ ... मां तुम ये पैसे रख लो ... तुम्हारे काम आ जाएगे।
मां का मन भर आया उसे आज अपने दिए संस्कार लौटते नजर आ रहे थे।
जब मोहन स्कूल जाता था ... वह मां से जेब खर्च लेने में हमेशा हिचकता था क्योंकि घर की आर्थिक स्थिति ठीक नहीं थी पिता जी मजदूरी करके बड़ी मुश्किल से घर चला पाते थे ... पर मां फिर भी उसकी जेब में कुछ सिक्के डाल देती थी ... जबकि वह बार-बार मना करता था।
पिता जी मां को हमेशा कहते थे।
तुम इसे बिगाड़ कर ही मानोगी ... पर मां हमेशा हंसकर टाल जाती थी
पत्नी का स्वभाव भी उसकी मां की तरफ कुछ खास अच्छा नहीं था वह रोज कहासुनी करती थी ... उसे ये बडो से टोका-टाकी पसन्द नही थी ... बच्चे भी दादी के कमरे मे नही जाते, मुझे भी देर से आने के कारण बात करने का समय नही मिलता।
एक दिन मां का पीछा किया ... आखिर मां को मामा के घर जाने की इतनी जल्दी क्यों रहती है।
वह यह देख कर हैरान रह गया कि मां तो मामा के घर जाती है नहीं है।
वह तो स्टेशन पर एकान्त में एक पेड़ के सहारे घंटों बैठी रहती थी।
तभी पास खड़े एक बजुर्ग, जो यह सब देख रहा थे उन्होंने बोला ... बेटा ... क्या देख रहे हो।
जी ... वो
अच्छा तुम उस बूढ़ी औरत को देख रहे हो ... वो यहां अक्सर आती है और घंटों पेड़ तले बैठ कर सांझ ढले अपने घर लौट जाती है अच्छे घर की लगती है।
बेटा ... ऐसी एक नही अनेकों बुजुर्ग मांए बुजुर्ग पिता तुम्हें यहां आसपास मिल जाएंगे।
जी, मगर क्यो❓
बेटा ... जब घर में बड़े-बुजुर्गों का प्यार नही मिलता ... उन्हें बहुत अकेलापन महसूस होता हैं तो वे यहां वहां बैठ कर अपना समय काट देते है।
वैसे क्या तुम्हें पता है ... बुढ़ापे में इन्सान का मन बिल्कुल बच्चे जैसा हो जाता है उस समय उन्हें अधिक प्यार और सम्मान की जरूरत पड़ती है पर परिवार के सदस्य इस बात को समझ नहीं पाते वो यहीं समझते हैं इन्होंने अपनी जिंदगी जी ली है फिर उन्हें अकेला छोड देते है कही साथ ले जाने से कतराते है, बात करना तो दूर अक्सर उनकी राय भी उन्हें कड़वी लगती है जबकि वह बुजुर्ग तो अपने बच्चों को अपने अनुभवों से आनेवाले संकटों और परेशानियों से बचाने के लिए सलाह देते है।
घर लौट कर किसी से कुछ नहीं कहा। जब मां लौटी वह घर के सभी सदस्यों को देखता रहा।
किसी को भी मां की चिन्ता नही थी मां से कोई बात नही करता कोई हंसता खेलता नही था, जैसे मां घर मे हो ही नही ऐसे परिवार में पत्नी बच्चे सभी मां को इग्नोर करते हुए दिखे।
सबको राह दिखाने के लिऐ आखिर उसने भी अपनी पत्नी और बच्चों से बोलना बन्द कर दिया ... वो काम पर जाता और वापस आता किसी से कोई बातचीत नही ... बच्चे पत्नी बोलने की कोशिश भी करते तो वह भी इग्नोर कर काम मे डूबे रहने का नाटक करता।..
तीन दिन मे सभी परेशान हो उठे ... पत्नी,बच्चे इस उदासी का कारण जानना चाहते थे.।
मोहन ने अपने परिवार को अपने पास बिठाया।
उन्हें प्यार से समझाया कि मैंने तुम से चार दिन बात नहीं की तो तुम कितने परेशान हो गए।
अब सोचो तुम मां के साथ ऐसा व्यवहार करके उन्हें कितना दुख दे रहे हो ।
मेरी मां मुझे जान से प्यारी है जैसे तुम्हारी माँ और फिर मां के अकेले स्टेशन जाकर घंटों बैठकर रोने की बात छुपा गया।
सभी को अपने बुरे व्यवहार का खेद था।
उसदिन जैसे ही मां शाम को घर लौटी।.
सभी बच्चे उनसे चिपट गए ...
दादी आज हम आपके पास बैठेंगे ... कोई किस्सा कहानी सुनाओ ना।
मां की आँखें भीग गई वो बच्चों को लिपटकर उन्हें प्यार करने लगी और फिर जो किस्से कहानियों का दौर शुरू हुआ वो घंटों चला इस बीच मोहन की पत्नी उनके लिए फल तो कभी चाय नमकीन लेकर आती मां बच्चों और मोहन के साथ स्वयं भी खाती और बच्चों को भी खिलाती अब घर का माहौल पूरी तरह बदल गया था।
एक दिन सुबह सुबह मोहन पत्नी और मां को एक साथ बैठे देखकर जोर से बोला ... मां ... क्या बात आजकल मामा के घर नहीं जा रही हो ...
नही बेटा अब तो अपना घर ही स्वर्ग लगता है ...
_सच मां_... मोहन मां को देखते हुए बोला
मां बहु को सीने से लगाकर बोली ..हां स्वर्ग से भी सुंदर!!
0 टिप्पणियाँ