घूँघट

 रिज़र्वेशन नही मिला और जाना भी ज़रूरी था तो जनरल कंपार्टमेंट में ही घुस गई मैं। जैसे-तैसे करके एक टाँग पर ही सही... बैठने की जगह भी मिल गई। बैठते ही मैनें चारो ओर नज़र दौड़ाई...बहुत भीड़ थी और सब सट-सटकर बैठे थे ,ऊपर से जुलाई की उमस भरी गर्मी...उफ्फ..

मेरे ठीक सामने की सीट पर घूँघट से अपने चेहरे को पूरी तरह से ढके हुये एक नवयुवती बैठी थी उसके बगल में एक महिला, जो शायद उसकी सास थी और साथ में एक मोटा सा,अधेड़ आदमी अपनी शर्ट उतारकर बार-बार उससे पसीना पोंछता जा रहा था।

युवती जैसे ही थोड़ा सा घूँघट उठाकर कुछ देखना चाहती कि सास उसे डपट देती.. "ससुर बगलै मा बइठे हैं,खबरदार जो उनके सामने घूँघट हटाया" घबराकर वह बेचारी फिर से लँबा सा घूँघट खीच लेती।

उधर "हाय गर्मी, बहुतै गर्मी है"..कहते हुए उस पुरुष ने,जो युवती का ससुर ही था,अब अपनी बनियान पेट के ऊपर चढ़ा ली और शर्ट से अपने शरीर पर हवा करने लगा।

उस युवती की हालत देखकर अब मुझे सास पर गुस्सा आ रहा था। पर उनसे कैसे कहूँ ,और किस अधिकार से ? डर लग रहा था कि नाराज़ होकर कहीं लड़ने ही ना लगें। अब हवन करते हुए अपने हाथ तो नही जला सकती थी मैं, फिर भी मन था कि मान ही नही रहा था।

"गर्मी बहुत है ना माँजी?" बहुत सोचकर मैंने बात शुरू की।

"हाँ बिटिया...बहुतै जादा गरम है। उमस वाली है ना..यही खातिन" पल्लू से हवा करते हुए वो बोलीं।

"ये आपकी बहू है? लगता है अभी जल्दी ही शादी हुई है इसकी?" मैंने बहू की तरफ इशारा करते हुए बात आगे बढ़ाई।

"हाँ..अबहिन कुछै महीना भवा है बिआव (ब्याह)का।"

"ओह्ह!! तभी ये इतना लंबा घूँघट किये है। पर माँजी, बहुत गर्मी लग रही होगी इसको भी?" मैंने दाँव खेला।

"अरे!!! तो का भवा? थ्वारा (थोड़ा) सहि ले। अब गर्मी है तो का नंगी नचिहे का? हम पंचै तो अबहिन तक(अभी तक) घूँघुट काढ़ित है" उनकी आवाज़ थोड़ी तल्ख़ हो गई।

"नही,नही आँटी जी। मेरा मतलब है कि गर्मी की वजह से अंकल जी ने तो अपनी बनियाइन तक ऊपर कर लिया है,, सबके सामने अपना पेट भी दिखा रहे हैं,और अगर बहू का चेहरा दिख जाये तो नंगी कैसे..?"

उन्होंने गुस्से से मुझे घूरा, फिर तुरंत ही अपने पति की ओर देखा ...."ऐ सुनो ,कमीज काहे उतारे हो ? उघारे(बगैर कपड़ों के) नीक (अच्छा)लागत है का? चलो,पहिले कमीज पहिनो" पति को ऑर्डर देकर तुरंत ही वह बहू की ओर मुख़ातिब हुईं "अउर दुलहिन... तुमहू तनिक का (ज़रा सा) घूँघुट ऊपर सरकाय लो.."

सुनते ही बहू ने झट से अपना घूँंघट ऊपर सरका लिया और मुझे देखकर मुस्कुराते हुए अपनी पलकें झपका दी।

कल्पना मिश्रा


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