'ये तुम्हारे बच्चे किस तरह से बात करने लगे हैं मेरे साथ, कोई तमीज, कोई संस्कार तुमने सिखाए ही नहीं तभी इतनी हिम्मत पड़ रही है बाप से यूं बात करने की।', आनंद चीखते हुए उर्वशी से बोला।
'अब क्या हो गया और ये किस तरह से बात कर रहे हो बच्चे सिर्फ मेरे अकेले के हैं क्या?' उर्वशी ने भी तेज आवाज में कहा।
'बच्चे पालने की जिम्मेदारी मां की होती है तो मां के ही हुए ना मेरी जिम्मेदारी पैसा कमाना था वो किया। और होगा क्या, दोनों के दोनों बार- बार यही रट लगा रहे हैं कि पापा आप खाली बैठे मां पर मत चिल्लाया करो कुछ बागवानी या और काम किया करो। खाली बैठे रहते हैं और झगड़ा करके घर की शांति भंग करते हो।' आनंद बिगड़ते हुए बोला।
'तो क्या ग़लत कह रहे हैं बच्चे आपकी आदत हमेशा से अपनी मनमानी करने की रही है। 'मैंने कहा इसलिए ऐसा ही होना चाहिए और ऐसा ही होगा।' बच्चों को और मुझे हमेशा डांट फटकार कर हमारी बेइज्जती करके बात की आपने। चालीस बरस के खुद होकर भी आपको ठीक से बोलना ना आया लेकिन चौदह पंद्रह साल के बच्चों से सिर्फ तमीज़ और संस्कार की उम्मीद की आपने। जब छोटे -छोटे बच्चे ग़लत कर लेते तब जाकर आप उनको टोकते वो भी कितने बुरे तरीके से झिड़क कर। कभी प्यार से तो समझाया ही नहीं फिर जो जहर बांटा था वही तो वापस मिल रहा है तो भुगतना भी तो आपको खुद ही पड़ेगा ना। अब जहर के बदले जहर ही मिलेगा प्रेम तो मिलने से रहा।' उर्वशी बोली।
'बड़ी जुबान चल रही है तुम्हारी याद है अपनी औकात कि भूल गई दस-दस बार सॉरी कहती थीं तब मैं जाकर मानता था। आज बड़े पर निकल आए हैं तुम्हारे। बच्चों के दम पर इतना इतराओ मत।' बौखलाहट में आनंद बोला उसे अब भी अपना ही सिक्का जमाए जो रखना था।
'हां, सॉरी तो कहती थी मैं पर इसलिए नहीं कि हर बार मेरी गलती होती थी या मेरे मन में कोई अफसोस था अपनी गलती पर। सॉरी सिर्फ और सिर्फ इसलिए बोलती थी कि बात वहीं खत्म हो जाए और तुम्हारा जहर तुम में ही रहे मुझ तक और बच्चों तक ना पहुंचे। अब बच्चे भी समझदार हैं और तुम्हारे जहरीले शिकंजे से दूर भी हैं। बचपन में तो तुमने दबा लिया जैसा मन चाहा उनसे करवाया पर अब वो जहर से दूर हैं इसलिए बेअसर है तुम्हारा कुछ भी कहना भी हमेशा के लिए। और हां, इज्जत ना उम्र बढ़ने भर से नहीं मिल जाती उसे कमाना पड़ता है विनम्रता और अच्छे व्यवहार से और ये गुण तो तुममें हैं नहीं तो अपना जहर अब खुद पियो और जिन बीजों को तुमने जहर से सींचा है उनके फल भी अब तुम्हीं चखो।' उर्वशी तेज मगर संयत आवाज में इतना बोलकर वहां से चली गई।
और आनंद उर्वशी की बात सुनकर सन्न होकर उसको जाता हुआ देखता ही रह गया।
स्मिता सक्सेना
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