कूरियर

 पूरा घर बच्चों के उधम से गुलजार था। हर तरफ शोर और ठहाके लग रहे थे। आज रक्षाबंधन पर प्रियंका का पूरा मायका दीपक के घर डटा था। त्योहार के इस उल्लास में भी दीपक अनमना-सा था। कोई चार-पांच दिन पहले माधवी से बात हुई थी तो उसने कहा था कि राखी भेज दी है मगर रक्षाबंधन के दिन भी राखी नहीं पहुंची। लॉबी में प्रियंका और बाकी बहनें निखिल को राखी बांध ही रही थीं, तभी डोरबेल बजा। दीपक जनता था कि पोस्टमैन आया है। दरवाजे पर पोस्टमैन ही था और पैकेट माधुरी ने ही भेजा था। मायूस दीपक के चेहरे पर मुस्कान तैर गई। हर्ष के आवेश में उसने प्रियंका से पैकेट छीन लिया। पैकेट में डोरी वाली राखी और एक पुड़िया निकली। कागज की पुड़िया में रोली और अक्षत का चावल था।

'पहली बार! माधुरी दी ने डोर वाली हल्की राखी भेजी है। नहीं तो हर साल लाख कहने पर भी भारी-भरकम पैकेट भेजती थीं। राखी से ज्यादा तो कुरियर का खर्च आता था।' प्रियंका की बात पर सभी मुस्कुरा उठे मगर दीपक फिर खामोश था।

उसने प्रियंका की छोटी बहन आस्था को राखी पकड़ा दी और बांधने के लिए कहा।

देर शाम सभी रिश्तेदार लौट चुके थे। दीपक को हरारत महसूस हुई तो वह सोने चला गया। सुबह भी वह देर से सोकर उठा और जल्दीबाजी में बैंक के लिए निकल गया। आज बैंक में काम भी बहुत होगा।

रास्ते में उसे बचपन की बातें याद आ रही थीं। घर में सभी लोग माधुरी को संतोषी बुलाते थे। उसने अपने लिए कभी कुछ नहीं मांगा। वह खुद कितना जिद्दी था। किसी सामान के लिए जिद कर ली तो कर ली। जबतक वह चीज मिल नहीं जाती, मुंह बना ही रहता था। मगर माधुरी, वह तो अपनी जायज जरूरतों के लिए भी कभी मुंह नहीं खोलती थी। यहाँ तक की बीमार पड़ने पर भी घर में किसी को नहीं बताती थी। उसके इसी त्याग और सीधेपन से अम्मा हमेशा चिंतित रही।

लंच के वक़्त माधुरी का फोन आया। दीपक समझ गया था। उसने माधुरी के अकाउंट में आज ही एक लाख रुपए ट्रांसफर किए थे।

'भईया आपने गलती से मेरे खाते में रुपये ट्रांसफर कर दिए हैं।' माधुरी ने छूटते ही कहा।

'नहीं! वह रुपये मैने तुम्हारे लिए भी भेजे हैं।'

'मगर क्यों? क्या करना है उसका?'

'वो तुम्हारी राखी का नेग है।'

क्या? इतनी बड़ी रकम? नेग के लिए? तुम्हारा दिमाग तो ठीक है भईया? तुम्हारी अपनी हालत ठीक नहीं है। दो बच्चों का खर्च है। और मुझे इसकी जरूरत भी क्या है अभी?'

'तुम कितना भी परेशान हो जाओ मगर मुझे कभी नहीं बताओगी माधुरी! मैं जानता हूँ कि आजकल तुम्हारा हाथ तंग है।'

नहीं भईया! तुम उस हल्की-पतली डोर वाली राखी से परेशान हो गए? वो तो मैंने सुधीर के कहने पर भेजी। ये मुझे डांट रहे थे कि मेरे इतना महंगा पैकेट भेजने के कारण तुम्हें भी बदले में महंगी चीजें देनी पड़ती हैं। तुम्हारी कसम!!'

माधुरी मैं राखी की बात नहीं कर रहा। पैकेट पर सुधीर की लिखावट देखकर मैं समझ गया था कि कुरियर दामाद बाबू ने किया था। उन्होंने समझदारी दिखाकर पतली डोर वाली राखी भेजी होगी। मगर!'

'मगर क्या भैया?'

मुझे चिंता हुई अक्षत-रोली की पुड़िया देखकर।'

'उससे क्या चिंता हो गई?'

'अक्षत का चावल। वो कितना मोटा चावल है माधुरी! तुम इतना सस्ता चावल क्यों खा रही हो माधुरी?'

'मेरे भाई! दुनिया की हर बहन को तुम्हारे जैसा भाई मिले मगर वह चावल हमारे घर में खाने के लिए इस्तेमाल नहीं होता। घर में स्टीम राइस पड़ा था और अक्षत के लिए कच्चे चावल की जरूरत थी। मेरे कहने पर ही सुधीर पास की दुकान से एक चुटकी कच्चा चावल ले आए थे।

भाई-बहन, दोनों की आंखें डबडबा रही थी।


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