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फैसला

 शारदा जी के दो बेटे हैं। बड़ा बेटा नेवी में है और छोटा बेटा टीचर है, अपने ही शहर में। दोनों की शादी हो चुकी है।

रागिनी उनकी बड़ी बहू है, जो टीचर है, और प्रियंका छोटी बहू है, जो घर पर ही रहती है और उसे पूरे दिन घर के कामों से फुर्सत ही नहीं मिलती। क्योंकि जेठानी रागिनी तो सुबह स्कूल के लिए निकलती और आते-आते शाम हो जाती थी। वैसे तो रागिनी को कुछ ज्यादा परेशानी नहीं थी, लेकिन शारदा जी की एक बात उन्हें बहुत खलती थी।

शारदा जी हमेशा हर निर्णय में अपनी बड़ी बहू रागिनी से ही पूछती थीं, जबकि घर के कामकाज के लिए उन्हें हमेशा प्रियंका ही दिखती थी।

तभी एक दिन —
“बड़ी बहू, सुनो! आज तुम्हारी छुट्टी है तो क्यों न बाजार चलें। दूर की रिश्तेदारी में मेरी एक बहन के बेटे की शादी है। कल उसका फोन आया था। सभी को आमंत्रित किया है उसने और कहा है कि अपनी दोनों बहुओं को भी साथ लेकर आना। तो क्यों न तुम दोनों के लिए साड़ियां ले आएं।” शारदा जी ने कहा।

“ठीक है मम्मी जी, थोड़ी देर में चलते हैं। पहले प्रियंका को बोलूँ फटाफट नाश्ता बना दे, इतने में मैं नहा लेती हूँ, फिर निकलते हैं।” रागिनी ने कहा।

“भाभी, मैं भी आपके साथ चलती हूँ। मैं भी अपनी पसंद की साड़ी ले आऊँगी और नाश्ता बस तैयार ही समझो, फटाफट बना देती हूँ।” प्रियंका ने कहा।

“छोटी बहू, तुम्हारा दिमाग खराब हो गया है क्या? फिर घर के काम पीछे से कौन करेगा? कपड़े भी बहुत सारे पड़े हैं धोने के लिए। और वैसे भी बड़ी बहू की पसंद अच्छी है, चिंता मत करो तुम्हें साड़ी पसंद आएगी।” शारदा जी ने मुँह बनाते हुए कहा।

प्रियंका सोचने लगी — जेठानी जी जरूर मम्मी जी से कहेंगी कि प्रियंका को भी साथ करने दो, कम से कम हम दोनों मिलकर लेंगे। प्रियंका ने जेठानी जी के मुँह की ओर देखते हुए सोचा।

लेकिन जेठानी जी ने प्रियंका के अनुमान के विपरीत शारदा जी की हाँ में हाँ मिलाई और प्रियंका से कहने लगीं —
“मम्मी जी सही ही कह रही हैं प्रियंका। हमें आते-आते शाम हो जाएगी और घर के सब काम रह जाएंगे।”

जेठानी जी ने झट से जवाब दिया।

आज प्रियंका का सब्र टूट गया और वह अपनी जेठानी और सास से कहने लगी —
“माफी चाहूँगी आप दोनों से, लेकिन अब आगे से मैं घर के सारे कामकाज नहीं करूंगी। मैं कोई नौकरानी नहीं हूँ इस घर की, जो आगे-आगे आप लोगों के काम करती रहूँ और आपके इशारों पर नाचती रहूँ। जब आप मुझे अपने साथ कहीं ले जाना भी जरूरी नहीं समझतीं, तो क्या मेरी पसंद कोई मायने नहीं रखती आप लोगों के लिए?

ठीक है, आगे से घर सबका है तो काम भी सबका होगा। मैं सिर्फ अपने ही कपड़े धोऊंगी। आपको जाना है तो जाइए, लेकिन आगे से मुझसे कोई उम्मीद मत रखना। मैं कमाती नहीं हूँ इसका मतलब यह थोड़े ही है कि मेरी कोई वैल्यू ही नहीं है। जबकि आपको तो मेरा शुक्रिया अदा करना चाहिए कि मैं पूरे दिन घर संभालती हूँ और आप लोग बेफिक्र होकर रहते हैं। गृहिणी की कीमत बहुत अनमोल है और इसका पता आप लोगों को जल्द ही चल जाएगा।”

“ज्यादा बड़बड़ करने की जरूरत नहीं है छोटी बहू। बड़ी बहू रागिनी तो कमेटी है, तुम तो घर पर ही रहती हो, फिर घर के काम भी तुम ही करोगी न!” शारदा जी चिल्लाईं।

“मम्मी जी, भाभी मेरे लिए नहीं, अपनी गृहस्थी के लिए कमेटी हैं। मुझे अपनी तनख्वाह थोड़े ही देती हैं। इसलिए यह सब मुझसे न ही कहो तो अच्छा है।” प्रियंका ने दृढ़ता से जवाब दिया।

जेठानी जी भी प्रियंका की बातें सुनकर हक्की-सी रह गईं और बोलने के लिए उन्हें शब्द ही नहीं मिले। प्रियंका को अपने फैसले पर गर्व था क्योंकि अब वह घर के काम का सारा बोझ अपने सर नहीं लेती।

घर के कामों का बंटवारा हो गया था — सुबह का खाना प्रियंका और शाम का खाना रागिनी बनाने लगी। अब तो रागिनी खाना बनाने में ही उलझती और गड़बड़ करती रहती।

प्रियंका ने आज उनको एहसास दिला दिया था कि गृहिणी का सम्मान करना कितना जरूरी है। क्योंकि घर की नींव होती है एक कुशल गृहिणी।


लेखक : अज्ञात


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