“देखिए शर्मा जी,” गोपाल जी ने मुस्कुराते हुए कहा, “हमें आपकी बेटी स्नेहा बहुत पसंद है। बस एक बार उससे पूछ लीजिए कि उसे भी हमारा बेटा आर्यन पसंद है या नहीं?”
गोपाल जी के शब्दों में विनम्रता और सच्चाई झलक रही थी।
सामने बैठे रमेश शर्मा को लगा मानो उनकी बेटी के लिए इससे अच्छा रिश्ता भगवान ने खुद चुना हो।
दोनों परिवारों की सहमति से स्नेहा और आर्यन की शादी पक्की हो गई।
कुछ ही दिनों बाद तारीख भी तय हो गई।
शादी की तैयारियों के बीच एक दिन रमेश शर्मा ने थोड़ी झिझक के साथ कहा,
“गोपाल जी, आपकी कोई विशेष इच्छा या डिमांड तो नहीं है? ताकि बाद में कोई बात रह न जाए।”
गोपाल जी ने तुरंत शर्मा जी का हाथ पकड़ लिया और मुस्कुराकर बोले,
“अरे शर्मा जी, कैसी बातें कर रहे हैं? अब हम एक परिवार हैं। हमें कुछ नहीं चाहिए — ना दहेज, ना गाड़ी, ना गहने। बस आपकी बेटी हमें सौंप दीजिए, वही सबसे बड़ा उपहार होगा।”
रमेश शर्मा के चेहरे पर संतोष की लहर दौड़ गई। उन्होंने मन ही मन कहा,
“वाह री किस्मत, आज भी ऐसे सज्जन लोग हैं इस दुनिया में।”
शादी धूमधाम से हुई।
स्नेहा ने नए परिवार में प्रवेश किया — ससुर गोपाल जी, सास मीना देवी और पति आर्यन से भरा पूरा परिवार था।
पहले कुछ दिन सब ठीक चला, मगर धीरे-धीरे स्नेहा ने महसूस किया कि घर का माहौल कुछ बदला हुआ है।
सास जी का व्यवहार ठंडा-सा हो गया था।
छोटी-छोटी बातों पर ताने सुनने को मिलने लगे —
“हमने तो सोचा था बिटिया साथ में कुछ सामान भी लाएगी, पर शायद उसके मायके में ये रिवाज नहीं होगा।”
स्नेहा को पहले लगा कि वो ज़्यादा सोच रही है। लेकिन धीरे-धीरे ताने बढ़ते गए।
एक शाम जब आर्यन ऑफिस से लौटा, स्नेहा ने हल्के स्वर में पूछा —
“आर्यन, क्या माँ-पापा मुझसे नाराज़ हैं?”
आर्यन ने फोन से नज़र नहीं हटाई —
“नहीं तो, तुम बेवजह सोच रही हो। माँ का स्वभाव ही ऐसा है, जल्दी घुलती नहीं हैं।”
स्नेहा चुप रह गई, मगर दिल में सवालों का सैलाब उमड़ आया।
अगले दिन पग-फेरे का दिन था।
रमेश शर्मा बेटी को लेने आए।
घर के बाहर खड़े होकर उन्होंने अंदर कदम रखा, पर गोपाल जी का चेहरा कुछ अलग ही दिखा — जैसे कोई शिकायत हो।
औपचारिक बातें खत्म होते ही गोपाल जी का चेहरा लाल पड़ गया।
उन्होंने तीखे स्वर में कहा —
“शर्मा जी, एक बात कहूँ, बुरा मत मानिएगा।”
रमेश शर्मा ने सहजता से कहा,
“कहिए, समधी जी, क्या बात है?”
गोपाल जी ने कहा,
“हमने जब रिश्ता तय किया था, तब साफ कहा था कि हमें कुछ नहीं चाहिए। लेकिन इसका ये मतलब तो नहीं था कि आप हमें ठगा हुआ महसूस कराएँगे। हमारे बेटे की शादी में आपने कुछ भी नहीं दिया — न फर्नीचर, न फ्रिज, न एसी, न गाड़ी। कोई छोटा-मोटा गिफ्ट तक नहीं! लोगों में क्या इज़्ज़त रह जाएगी हमारी? मेरे पड़ोसी के बेटे की शादी हुई थी, वहाँ तो दो गाड़ियाँ मिलीं, और यहाँ…”
उनकी आवाज़ तेज़ और कड़वी होती चली गई।
“हमने भलमनसाहत दिखाई, पर आपने उसका फायदा उठाया। सस्ते में बेटी निपटा दी आपने।”
ये सुनते ही रमेश शर्मा के चेहरे का रंग उड़ गया।
उनके हाथ काँप उठे।
“समधी जी… ये क्या कह रहे हैं आप? आपने ही तो कहा था कि आपको कुछ नहीं चाहिए।”
गोपाल जी हँस पड़े,
“हाँ कहा था, लेकिन इसका मतलब ये थोड़े था कि आप एक तकिया लेकर बेटी भेज देंगे! समाज में अब हमें ही शर्मिंदा होना पड़ेगा।”
रमेश शर्मा के दिल पर जैसे किसी ने चोट की।
उन्हें विश्वास नहीं हो रहा था कि जिस व्यक्ति ने “दहेज का विरोधी” बनकर बात की थी, वही आज लालच से अंधा हो चुका था।
उनकी आँखें भर आईं।
“गोपाल जी, बेटी दी है, दौलत नहीं छुपाई। जो हमारे पास था, वो पूरे दिल से दिया है। आपकी बातों से बहुत दुख पहुँचा है।”
इतना कहकर वो वहाँ से उठ खड़े हुए।
स्नेहा दरवाज़े पर खड़ी सब सुन रही थी।
उसके आँसू रुक नहीं रहे थे।
पिता का सिर झुकना उससे देखा नहीं गया।
उस दिन के बाद से स्नेहा ने घर का माहौल बदलने की ठान ली।
उसने कोशिश की कि सास-ससुर से अच्छे संबंध बनाए, पर हर बार ताने सुनने को मिलते।
“कहाँ से आई है ये लड़की? कुछ सलीका नहीं।”
“देखो, शादी में कुछ नहीं लायी, अब नखरे दिखा रही है।”
आर्यन भी धीरे-धीरे चुपचाप रहने लगा।
कभी पत्नी के पक्ष में नहीं बोला।
कभी-कभी तो वो खुद कह देता —
“थोड़ा बहुत तो मायके से आ ही सकता था न स्नेहा, माँ को भी तो कुछ कहना ही था लोगों में।”
स्नेहा का मन टूट गया।
लेकिन उसने न मायके फोन किया, न रोई, बस सोचती रही — क्या एक लड़की की इज़्ज़त उसके लाए हुए दहेज से मापी जाती है?
एक दिन अचानक गोपाल जी की तबीयत बिगड़ गई।
स्नेहा ने बिना देर किए डॉक्टर को बुलाया, पूरी रात उनके पास बैठी रही।
सुबह जब गोपाल जी की आँख खुली, उन्होंने देखा कि स्नेहा ने उनके सिर पर ठंडी पट्टी रखी हुई है।
“बहू… तू पूरी रात नहीं सोई?”
“पापा जी, आपकी तबीयत ठीक नहीं थी। मुझे नींद कैसे आती?”
गोपाल जी का गला भर आया।
जिस बहू को अब तक उन्होंने बोझ समझा था, वही अब उनके सामने ममता की मूर्ति बन गई थी।
कुछ दिन बाद जब वो ठीक हुए, उन्होंने शर्मा जी को फोन किया।
“समधी जी, अगर आप बुरा न मानें तो मैं एक बात कहना चाहता हूँ।”
“कहिए गोपाल जी।”
“मैंने बहुत गलती की। दहेज का नाम लेकर जो अपमान किया, वो मेरे लालच का परिणाम था। स्नेहा ने साबित कर दिया कि बेटी दहेज से नहीं, संस्कार से घर रोशन करती है। आप भाग्यशाली हैं कि ऐसी बेटी की परवरिश की।”
शर्मा जी की आँखें नम हो गईं।
“कोई बात नहीं, गोपाल जी। जब दिल साफ़ हो, तो देर से आई समझ भी मूल्यवान होती है।”
उस शाम जब स्नेहा पूजा का दीया जला रही थी, गोपाल जी ने उसे आवाज़ दी —
“बहू, ज़रा सुनो।”
“जी पापा जी?”
“जब लोग हमसे पूछेंगे कि हमारे घर में कौन सी बहू आई है, तो मैं कहूँगा — ‘वो जो दहेज नहीं, प्यार लाई है।’ तू हमारे लिए लक्ष्मी से कम नहीं।”
स्नेहा की आँखों में आँसू चमक उठे —
“पापा जी, बस यही तो चाहती थी — थोड़ी-सी इज़्ज़त।”
आर्यन पास खड़ा सब सुन रहा था।
उसे एहसास हुआ कि स्नेहा को समझने में उसने भी गलती की।
वो आगे बढ़ा, और स्नेहा का हाथ पकड़कर बोला —
“माफ़ करना स्नेहा… मैं समझ नहीं पाया। अब ये घर सच में तुम्हारा है।”
दीये की लौ हिल रही थी, पर बुझ नहीं रही थी —
जैसे स्नेहा के भीतर का आत्म-सम्मान फिर से जग उठा हो।
उस दिन के बाद से उस घर में एक नियम बन गया —
“घर का मान सम्मान दहेज से नहीं, बेटी के संस्कार से बढ़ता है।”
और गोपाल जी अक्सर कहा करते थे —
“जिसने बेटियों को दहेज में तौला, उसने जीवन में प्यार का असली मूल्य कभी समझा ही नहीं।”
अब वो घर सच में घर बन गया था —
जहाँ रिश्ते पैसों से नहीं, दिल से निभाए जाते थे।
0 टिप्पणियाँ