सही फैसले वही होते हैं, जिनमें तर्क के साथ भावनाओं का भी सम्मान हो।

 “आर्या, तुम समझ क्यों नहीं रही हो? मुझे यह मौका हाथ से जाने नहीं देना चाहिए,” समीर ने लगभग गुस्से में कहा।

आर्या ने गहरी साँस ली। वह शांत लहजे में बोली —
“समीर, मैं तुम्हारे खिलाफ नहीं हूँ। मैं सिर्फ चाहती हूँ कि तुम जल्दबाजी में कोई ऐसा कदम न उठाओ, जिसका बाद में पछतावा हो। तुम अपनी जॉब छोड़ दोगे तो हमारा आने वाला भविष्य अनिश्चित हो जाएगा।”

“तुम समझ नहीं रही, आर्या। अगर मैं यह स्टार्टअप अभी शुरू नहीं करूँगा तो बाद में मौका नहीं मिलेगा। ये मेरे सपनों का प्रोजेक्ट है,” समीर ने ज़ोर देकर कहा।

आर्या ने उसकी आँखों में देखा — “सपने सबके होते हैं, समीर। लेकिन सपनों को पूरा करने से पहले ज़मीन मजबूत होनी चाहिए। मैं सिर्फ यही कह रही हूँ कि तुम अपनी जॉब के साथ-साथ इसे शुरू करो। अगर सफल हो गया तो जॉब छोड़ देना, नहीं तो कोई नुकसान नहीं होगा।”

“नहीं, मैं दोनों काम एक साथ नहीं कर पाऊँगा। मुझे इस स्टार्टअप को अपना सौ प्रतिशत देना है,” समीर ने दृढ़ता से कहा।

आर्या का चेहरा उतर गया।
वो जानती थी कि समीर ज़िद्दी है, लेकिन उसे ये नहीं पता था कि वो इस बार उसकी बात इतनी अनसुनी कर देगा।


आर्या और समीर की कहानी बारह साल पुरानी थी।
स्कूल की बेंच पर शुरू हुई दोस्ती कॉलेज तक पहुँच गई थी। दोनों साथ पढ़े, साथ हँसे, साथ झगड़े — और फिर एक-दूसरे के बिना रहने की कल्पना भी नहीं कर सकते थे।

कॉलेज खत्म होते ही दोनों को एक ही कंपनी में नौकरी मिल गई।
जीवन की गाड़ी सहजता से चलने लगी।
आर्या चाहती थी कि अब वे अपने रिश्ते को एक नया नाम दें — शादी।

समीर को भी इस बात से कोई ऐतराज़ नहीं था, मगर उस समय उसका ध्यान कहीं और था।
वह अपनी नौकरी से असंतुष्ट था।
हर रोज़ की रुटीन लाइफ़, बॉस के आदेश, और सीमित सैलरी उसे घुटन देती थी।
उसका सपना था — अपना कुछ करने का, अपना नाम बनाने का

वो महीनों से एक नए स्टार्टअप आइडिया पर काम कर रहा था — “ग्रीनस्फीयर”, एक पर्यावरण-आधारित टेक्नोलॉजी स्टार्टअप जो शहरों में पेड़ लगाने और उनकी देखभाल के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म बनाता।

विचार शानदार था, पर जोखिम भरा भी।
आर्या ने हर तरह से उसे समझाया —
“समीर, आइडिया अच्छा है, लेकिन मार्केट में ऐसे बहुत से स्टार्टअप्स फेल हो चुके हैं। हमें थोड़ा संभलकर चलना चाहिए। जॉब मत छोड़ो।”

“आर्या, डरोगी तो आगे कैसे बढ़ोगी?” समीर हँसते हुए कहता, “ज़िंदगी में रिस्क न लो तो फिर क्या जिए?”

“रिस्क लेना गलत नहीं, लेकिन आँख बंद करके छलांग लगाना मूर्खता है,” आर्या ने तर्क दिया।

पर समीर पर तो जैसे जिद का भूत सवार था।


उस दिन ऑफिस में सब सामान्य था, लेकिन शाम को आर्या के पास अचानक समीर का मैसेज आया —
“मैंने आज रिजाइन दे दिया।”

आर्या ने जैसे बिजली का झटका खाया।
वह सीधे समीर के केबिन में पहुँची।
“क्या किया तुमने?”

“जो करना था, वही किया,” समीर ने मुस्कुराते हुए कहा।
“अब मैं अपने सपने को सच करूँगा।”

“तुमने मुझसे एक बार बात तक नहीं की?”
“आर्या, ये मेरा फैसला था।”

आर्या की आँखों में निराशा थी।
“समीर, तुम सिर्फ अपने बारे में सोचते हो। तुम्हारे फैसले का असर सिर्फ तुम पर नहीं पड़ेगा। हम शादी करने वाले हैं। हमें मिलकर निर्णय लेने चाहिए। अगर अभी तुम मेरी राय को नज़रअंदाज़ कर रहे हो, तो आगे क्या करोगे? क्या सारी ज़िंदगी मुझे तुम्हारे फैसले मानने होंगे?”

समीर कुछ बोल नहीं पाया।
आर्या ने अपना बैग उठाया और कहा —
“जिस तरह तुमने अपना फैसला ले लिया, मैंने भी ले लिया है। अब मुझे भी सोचना होगा कि क्या मैं तुम्हारे साथ यह रिश्ता आगे बढ़ाना चाहती हूँ या नहीं।”

वह तेज़ कदमों से बाहर निकल गई।

समीर के हाथ में resignation letter था, लेकिन अब वो सिर्फ एक कागज़ नहीं, उसके जीवन की सबसे बड़ी गलती बन चुका था।


दिन बीतते गए।
आर्या ने उससे बात करना बंद कर दिया।
समीर अपने स्टार्टअप में डूब गया, मगर भीतर से टूटा हुआ था।
वो सोचता — “मैंने सब कुछ तो सही किया, फिर भी सब गलत क्यों हो गया?”

उसने कई जगह जाकर investors से मुलाकात की, प्रोजेक्ट दिखाया, पर किसी ने दिलचस्पी नहीं दिखाई।
कभी कोई कहता, “मार्केट बहुत saturated है,”
तो कोई कहता, “ऐसे आइडिया पर पैसा लगाना बेकार है।”

छह महीने बाद उसका बैंक बैलेंस लगभग खत्म हो गया।
किराया, बिजली, इंटरनेट — सब चुकाना मुश्किल हो गया था।

उस रात वह अपने कमरे में बैठा सोच रहा था —
“अगर आर्या होती, तो शायद ये हाल न होता। वो सही कहती थी… मुझे इतना जल्दबाज़ी में निर्णय नहीं लेना चाहिए था।”

उसी वक्त मोबाइल पर एक मैसेज आया —
“Hope you’re doing fine. — आर्या”

समीर की आँखों से आँसू निकल आए।
वह तुरंत जवाब लिखने लगा —
“मैं ठीक नहीं हूँ। तुम सही थीं। मैंने सबकुछ खो दिया — नौकरी भी, तुम्हें भी। अगर संभव हो, तो एक बार मिलो।”


अगले दिन दोनों उसी कैफे में मिले जहाँ कभी साथ बैठकर सपनों की बातें करते थे।
आर्या पहले से वहाँ बैठी थी।
समीर अंदर आया — चेहरा थका हुआ, आँखों के नीचे काले घेरे, पर उसमें अब अहंकार नहीं था, सिर्फ पछतावा था।

“कैसी हो, आर्या?”
“ठीक हूँ, और तुम?”
“अब ठीक नहीं। मैंने सब बिगाड़ दिया।”

आर्या ने शांत स्वर में कहा —
“समीर, मैंने कभी तुम्हारे सपनों का विरोध नहीं किया था। मैं बस ये चाहती थी कि तुम अपने कदम सोच-समझकर उठाओ। रिश्तों में साझेदारी होती है, एकतरफा फैसले नहीं।”

समीर ने सिर झुका लिया।
“तुम सही थी, आर्या। मैंने सोचा कि मैं अकेला सब संभाल लूँगा, लेकिन… मैंने तुम्हें भी खो दिया। अब समझ आया कि सपने तभी पूरे होते हैं, जब साथ चलने वाले का विश्वास भी साथ हो।”

आर्या ने हल्की मुस्कान दी —
“समीर, असफलता कोई अपराध नहीं है, लेकिन उससे सीख न लेना बहुत बड़ी गलती है। अगर तुम सच में अपनी गलती समझ गए हो, तो फिर से शुरू करो — पर इस बार किसी को पीछे छोड़कर नहीं, बल्कि साथ लेकर।”

समीर ने कहा —
“क्या तुम… फिर से मेरा साथ दोगी?”

आर्या ने थोड़ी देर सोचा, फिर बोली —
“साथ तभी जब तुम अपने फैसले में मुझे जगह दोगे। सपने हम दोनों के होंगे — तुम्हारे भी, मेरे भी।”


छह महीने बाद, समीर ने एक नई शुरुआत की — इस बार आर्या उसके साथ थी।
दोनों ने मिलकर “ग्रीनस्फीयर” को न सिर्फ नया रूप दिया, बल्कि एक सफल प्रोजेक्ट बना दिया।

आज कंपनी चल रही थी, और साथ ही उनकी ज़िंदगी भी।

समीर अक्सर कहता —
“उस दिन अगर तुम मुझे छोड़कर न गई होती, तो मैं अपनी गलती कभी नहीं समझ पाता।”

और आर्या मुस्कुराकर जवाब देती —
“कभी-कभी दूर जाना भी ज़रूरी होता है, ताकि दूसरा समझ सके कि साथ कितना कीमती है।”


जीवन में निर्णय लेना ज़रूरी है,
मगर जल्दबाजी में नहीं।
क्योंकि हर फैसला सिर्फ हमारा नहीं होता —
वो हमारे अपने लोगों का भविष्य भी तय करता है।

सही फैसले वही होते हैं, जिनमें तर्क के साथ भावनाओं का भी सम्मान हो।


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