“कैसी हो कमला चाची… घूम आईं न बेटा-बहू के साथ विदेश? सुना था बड़ी ठाठ-बाट से गई थीं। फिर ये मुँह इतना उतरा हुआ क्यों है? कुछ हुआ क्या वहाँ?”
पास ही रहने वाली पड़ोसन राधा ने जब कमला चाची को यूँ उदास चेहरा लिए आँगन में बैठे देखा तो मज़ाक में पूछ लिया।
कमला चाची हल्की मुस्कान लाई, मगर वो मुस्कान भी दर्द से भीगी हुई थी।
“अरे राधा… क्या देश, क्या विदेश — सब जगह की एक ही कहानी है। कहावत है ना — ‘घाट-घाट का पानी पी लिया तब पता चला कौन सा मीठा है कौन सा कड़वा।’ अब तो बस यही निश्चय किया है कि जब तक साँस है, यहीं रहूँगी, अपनी मिट्टी में।”
राधा कुछ समझी नहीं — “अरे, क्या बात कर रही हैं चाची? सुना था छोटा बेटा निखिल तो बहुत लाड़ करता है आपका। कहता था, ‘माँ को दुनिया दिखाऊँगा’। वो तो विदेश में नौकरी करता है, बड़ी बहू-सीता भी बहुत समझदार है, फिर आपको क्या दुख मिल गया वहाँ?”
कमला चाची ने आह भरी, उनकी आँखें जैसे अतीत में डूब गईं।
चार महीने पहले की बात है।
निखिल का फोन आया था —
“माँ, आपको अपने पास बुलाना चाहता हूँ। अब तो मेरी भी इच्छा है कि आप आराम करें, थोड़ा बाहर की दुनिया देखें।”
कमला चाची की खुशी का ठिकाना नहीं था।
उन्होंने कभी अपने गाँव से आगे शहर तक का सफर नहीं किया था, और अब बेटा उन्हें विदेश बुला रहा था।
“लोगों की तो ज़िंदगी में सपना रह जाता है, और मेरी जैसी औरत के नसीब में इतनी बड़ी खुशकिस्मती!” वो सबको बताती फिरतीं।
बड़ी बहू आरती ने भी मुस्कुराकर कहा था —
“माँजी, अब आप कुछ दिन आराम से रहिए, बाकी की चिंता हम देख लेंगे।”
आरती की बातों में सम्मान था, सच्चाई थी।
कमला चाची ने जाते-जाते उसके सिर पर हाथ रखा —
“बेटी, तू मेरी बिटिया जैसी है। तेरे बिना मन नहीं लगेगा, पर अब निखिल की बात मानना ही पड़ेगा।”
फिर वो चली गईं — बड़े उत्साह के साथ, सजे-सँवरे सूटकेस, और आँखों में विदेशी शहर देखने का सपना लिए।
पहले कुछ दिन सच में अच्छे बीते।
निखिल रोज़ उन्हें बाहर घुमाने ले जाता — पार्क, मॉल, मंदिर।
“देखा माँ, यहाँ सब कितनी सफाई रखते हैं,” वो गर्व से कहता।
कमला चाची हँस पड़तीं — “सफाई तो है बेटा, पर अपनापन कहाँ?”
धीरे-धीरे निखिल का ऑफिस का काम बढ़ने लगा।
सुबह जल्दी निकलता और रात को देर से आता।
अब घर में ज़्यादातर वक्त वो और उसकी पत्नी सीता ही होतीं।
सीता शुरू-शुरू में तो बहुत प्यार से पेश आई, पर कुछ ही दिनों में उसका व्यवहार बदलने लगा।
“माँजी, यहाँ सब काम मशीन से होता है, बार-बार चाय, दाल, पराठे माँगने की आदत छोड़िए।”
कमला चाची मुस्कुरा देतीं — “अरे बेटा, मैं तो बस पूछ रही थी, भूख नहीं थी।”
लेकिन बात धीरे-धीरे तानों में बदलने लगी।
कभी कहती — “यहाँ के लोग टाइम से खाते हैं, आप तो पूरे दिन कुछ न कुछ चाहती रहती हैं।”
कभी कहती — “इतनी दवाइयाँ, इतना ध्यान — कोई बूढ़ी औरत संभाल ले तो भी कम है।”
कमला चाची के दिल में चोट लगने लगी।
वे सोचतीं — “क्या मैं सच में बोझ बन गई हूँ?”
एक रात हल्का बुखार था। उन्होंने सीता को आवाज़ दी —
“बेटा, ज़रा पानी दे दो।”
सीता ने जवाब दिया — “अभी तो रख दिया था, बार-बार क्यों बुलाती हैं?”
वो शब्द उनके दिल में तीर की तरह चुभे।
उस रात उन्होंने तकिया भिगो दिया, मगर किसी से कुछ नहीं कहा।
अगली सुबह निखिल ने देखा, माँ चुपचाप रसोई में खड़ी हैं, वहीँ सिर झुकाए।
“माँ, आप ठीक तो हैं?”
“हाँ बेटा, सब ठीक है। बस थोड़ी थकान है।”
दिन गुज़रते गए।
कमला चाची ने खुद को कमरे तक सीमित कर लिया।
सीता अब उनसे कम ही बात करती।
कभी-कभी दोपहर में चुपके से फोन उठाकर वो आरती को कॉल कर लेतीं —
“बेटी, कैसी हो?”
आरती खुश होकर कहती — “माँजी, यहाँ सब ठीक है, आप वहाँ का मज़ा ले रही होंगी न?”
कमला चाची कहतीं — “हाँ बेटा, बहुत अच्छा है यहाँ,” पर उनकी आवाज़ में घुटन साफ़ झलकती।
एक दिन वो बाथरूम जाते वक्त फिसल गईं।
हल्की सी चोट आई थी।
सीता दौड़कर आई, पर घबराहट में नहीं, झुंझलाहट में।
“माँजी, आपने कहा क्यों नहीं? अब फर्श गीला हो गया, निखिल के आने से पहले साफ़ करना पड़ेगा।”
कमला चाची ने दर्द से कराहते हुए सिर्फ इतना कहा —
“माफ़ कर देना बेटा, गलती हो गई।”
वो पहली बार समझ गईं कि रिश्तों में प्यार जब सुविधा बन जाए, तो सम्मान धीरे-धीरे मर जाता है।
चार महीने बाद जब वो भारत लौटीं, तो आरती ने दरवाजे पर आरती की थाली से उनका स्वागत किया।
“माँजी, अब आप कहीं नहीं जाएँगी। ये घर आपका है, और आपकी सेवा मेरा सौभाग्य है।”
वो शब्द कमला चाची के दिल में जैसे मरहम बनकर उतरे।
आरती ने उनके पैर धोए, गर्म खाना बनाया, और जब उन्हें करवट में दिक्कत हुई तो बिना सिकुड़न के बिस्तर ठीक किया।
वो सोचने लगीं —
“कहते हैं, सगी औलाद ही अपना होती है, पर कभी-कभी बहू ही वह रिश्ता निभा जाती है, जो कोई और नहीं निभा पाता।”
अब जब पड़ोसी राधा ने पूछा — “तो चाची, क्या हुआ वहाँ?”
कमला चाची ने गहरी साँस ली, और बोलीं —
“राधा, चारों बेटों के घर रह चुकी हूँ — बड़े ने मुझे पूजा की तरह माना, दूसरे ने मेहमान की तरह, तीसरे ने जिम्मेदारी की तरह और चौथे ने… बोझ की तरह। लेकिन अब समझ आया कि किसका दिल कितना बड़ा है।
यहाँ मेरी बड़ी बहू आरती, जो खुद नौकरी करती है, फिर भी मेरे लिए सुबह की चाय बनाती है, दवा देती है, बात करती है। और वहाँ विदेश में, जहाँ सबकुछ था — सुख, पैसा, सुविधा — वहाँ अपनापन नहीं था।
आखिर इंसान को मशीन नहीं, दिल चाहिए।”
राधा ने कहा — “चाची, आपने सच कहा। बहू-बेटे अच्छे बुरे नहीं होते, बस इरादे अलग-अलग होते हैं।”
कमला चाची मुस्कुराईं — “हाँ बेटा, यही सीखा है। बेटा चाहे लाख कमाए, अगर उसका घर प्यार से खाली है, तो वो सबसे गरीब है। और बहू चाहे साधारण क्यों न हो, अगर उसका दिल बड़ा है, तो वही इस घर की असली लक्ष्मी है।”
इतना कहकर वो धीरे से उठीं, बगल में रखी छड़ी थामी और आँगन में बैठ गईं।
सूरज की किरणें उनके चेहरे पर पड़ीं, और चेहरे पर पहली बार फिर वही पुरानी चमक लौट आई।
उन्होंने आसमान की ओर देखा और बुदबुदाईं —
“अब कहीं नहीं जाऊँगी… यही मेरा घर है, यही मेरा सुकून।”
पास ही खड़ी आरती ने मुस्कुराते हुए कहा —
“और हम भी कहीं नहीं जाने देंगे, माँजी। आपने अब तक सबका घर सँवारा, अब हमारी बारी है।”
कमला चाची ने उसके सिर पर हाथ रखा और बोलीं —
“तू सच में मेरी बेटी है, आरती… तूने मुझे सिखाया कि सेवा खून से नहीं, दिल से होती है।”
और उस दिन के बाद से वो घर सिर्फ घर नहीं रहा —
वो एक माँ और बहू के रिश्ते का मंदिर बन गया,
जहाँ ईंटों से ज़्यादा प्यार की नींव थी, और जहाँ किसी को किसी से कोई शिकायत नहीं थी —
बस एक एहसास था कि “सम्मान ही सबसे बड़ी सेवा है।”
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