बहू नहीं, लक्ष्मी आई है मेरे घर।

 सुबह के सात बज चुके थे। रसोई में चाय की केतली सीटी दे रही थी और संध्या अपने पति को जगाने के लिए कमरे में आई। “सुनो जी, आज ज़रा जल्दी उठ जाओ, रश्मि आ रही है!” उसने परदे हटाते हुए कहा।

“अरे, वो तो परसों आने वाली थी ना?” रवि ने करवट लेते हुए पूछा।
“हाँ, पर उसका फोन आया था — छुट्टी पहले मिल गई, इसलिए आज ही आ रही है। दो महीने बाद घर लौट रही है, ज़रा कुछ अच्छा बना लूं सोच रही हूँ।”
रवि मुस्कुराया, “हाँ, बना लो। उसे खीर बहुत पसंद है।”

रश्मि, रवि और संध्या की इकलौती बहू थी — नौकरीपेशा, समझदार और बेहद स्नेही। शादी को तीन साल हुए थे। उनके बेटे अमन की पोस्टिंग दिल्ली में थी और रश्मि वहीं एक कंपनी में काम करती थी।

दोपहर तक घर में रौनक बढ़ गई थी। दरवाजे की घंटी बजी, और जैसे ही रश्मि अंदर आई, संध्या ने उसे गले से लगा लिया। “आ गई मेरी बिटिया!” वह बोली, “थक गई होगी, पहले हाथ-मुँह धो ले, फिर तेरी पसंद की खीर तैयार है।”
“वाह मम्मीजी, आपको कैसे पता कि मैं खीर खाने की सोच ही रही थी!” रश्मि हँस दी।

संध्या ने प्यार से उसके सिर पर हाथ फेरा। उसे बहू नहीं, बेटी समझती थी। पूरे मोहल्ले में लोग कहते — “संध्या जी की किस्मत तो सच में चमक गई, बहू नहीं, लक्ष्मी आई है उनके घर।”

शाम को जब सब साथ बैठे तो रवि ने पूछा, “रश्मि बेटा, ऑफिस कैसा चल रहा है? बहुत काम तो नहीं?”
“नहीं पापा, काम तो ठीक है, पर कंपनी में थोड़ा स्ट्रेस रहता है।”
“और अमन?”
“अमन अच्छा है पापा, बस थोड़ा बिजी रहता है। नए प्रोजेक्ट की वजह से रात-दिन काम कर रहा है।”

संध्या ध्यान से रश्मि का चेहरा देख रही थी। वह जानती थी कि कुछ तो है जो रश्मि कह नहीं पा रही। उसकी आंखों में हल्की थकान और उदासी साफ झलक रही थी। लेकिन उसने कुछ नहीं पूछा, सोचा — जब मन होगा, खुद बताएगी।

रात को जब सब सो गए तो रश्मि छत पर बैठी आसमान की तरफ देख रही थी। अचानक संध्या वहाँ आई और बोली, “बिटिया, इतनी रात को जाग क्यों रही है?”
रश्मि चौंकी, “अरे, मम्मीजी आप! नींद नहीं आ रही थी, बस ऐसे ही ठंडी हवा खाने आई थी।”
संध्या पास बैठ गई, “मुझे मत छुपा बेटा, तेरे चेहरे पर लिखा है कि कुछ बात है।”
रश्मि कुछ पल चुप रही, फिर धीरे से बोली, “मम्मीजी, आपसे क्या छुपाऊँ… अमन से झगड़ा हो गया था।”
“क्या बात हुई?” संध्या ने प्यार से पूछा।

रश्मि की आँखें भर आईं। “अमन कहता है कि अब हमें बच्चा प्लान करना चाहिए। लेकिन मैं अभी करियर में कुछ आगे बढ़ना चाहती हूँ। उसने कह दिया कि ‘तुम्हें अपने बच्चे से ज़्यादा नौकरी प्यारी है।’ मम्मीजी, क्या मैं ग़लत हूँ?”

संध्या ने उसका हाथ थाम लिया, “ग़लत या सही का सवाल नहीं बेटा। हर चीज़ का समय होता है, और हर औरत का सपना सिर्फ माँ बनना नहीं होता। पहले खुद को संभालो, फिर किसी और को सँभाल पाओगी।”

रश्मि के आँसू अब रुक नहीं रहे थे। उसने सिर माँ के कंधे पर रख दिया। “मम्मीजी, आपको नहीं पता, ये सब बोलकर उसने मुझसे बात करना बंद कर दिया है।”

संध्या बोली, “अमन अभी बच्चा है, उसे समझने में समय लगेगा। देखना, जब उसे अहसास होगा कि तू उसके लिए क्या मायने रखती है, तो वही तेरे कदमों में होगा।”

रश्मि को माँ का यह स्नेह जैसे सुकून दे गया। वह जानती थी कि संध्या सिर्फ उसकी सास नहीं, उसकी दोस्त भी है।

अगली सुबह संध्या ने रवि से कहा, “सुनिए जी, मुझे दिल्ली जाना है।”
“अरे क्यों?”
“रश्मि और अमन दोनों को कुछ समझाना है। रिश्ता बस शादी के कागज़ से नहीं चलता, समझदारी चाहिए।”

रवि कुछ कह नहीं पाए। दोपहर तक उसने टिकट बुक करा दी।

अगले दिन जब वह दिल्ली पहुँची तो अमन दफ्तर जाने की तैयारी में था। “माँ! आप अचानक?”
“हाँ बेटा, सोचा तुम दोनों से मिल आऊँ।”

रश्मि रसोई से बाहर आई, “मम्मीजी, आप आ गईं!” उसने झट से उनके पैर छुए।

दिनभर माँ ने दोनों को बिना कुछ कहे देखा। अमन काम में डूबा था और रश्मि चुप-चुप सी थी। शाम को खाना खाते वक्त संध्या बोली, “बेटा, एक कहानी सुनाऊँ?”
“हाँ माँ,” अमन बोला।

“एक किसान था जिसके खेत में दो बैल थे — एक मज़बूत और दूसरा थोड़ा कमजोर। किसान हर बार हल उसी कमजोर बैल के साथ जोड़ देता। मज़बूत बैल सोचता — मैं ताकतवर हूँ, फिर भी मुझे आराम नहीं मिलता। एक दिन उसने किसान से कहा — ‘मुझे दूसरे खेत भेज दो।’ किसान ने कहा — ‘बिलकुल, पर ध्यान रखना, वहाँ न कोई तुम्हें संभालने वाला होगा, न कोई साथी।’ कुछ दिन बाद वही बैल अकेलेपन से बीमार पड़ गया।”

संध्या रुकी, फिर बोली, “रिश्ते भी बैलों की जोड़ी की तरह होते हैं बेटा। एक थक जाए तो दूसरा संभालता है। अगर दोनों अपने-अपने मन से चलें तो खेत कभी नहीं जोते जा सकते।”

अमन समझ गया कि माँ किस ओर इशारा कर रही है। उसने धीमे से कहा, “माँ, मैं समझ गया।”

रात में जब रश्मि कमरे में आई तो अमन ने उसका हाथ थाम लिया। “सॉरी रश्मि, मैं बहुत सेल्फिश हो गया था। तुम्हें सपने देखने से रोकना मेरा हक़ नहीं था।”
रश्मि की आँखों में नमी थी। उसने कहा, “नहीं अमन, गलती मेरी भी थी। शायद मैं तुम्हें ठीक से समझा नहीं पाई।”

दोनों के बीच की खामोशी अब पिघल चुकी थी। अगले दिन जब संध्या लौटने लगी तो अमन बोला, “माँ, आपने जो किया, वो शायद हम दोनों कभी नहीं कर पाते।”

संध्या मुस्कुराई, “अरे बेटा, मैंने कुछ नहीं किया, बस तुम्हें एक-दूसरे का चेहरा दिखाया है। याद रखना, शादी में ‘मैं’ नहीं, ‘हम’ टिकता है।”

जब ट्रेन चली, तो रश्मि प्लेटफॉर्म पर खड़ी होकर हाथ हिला रही थी। उसकी आँखों में वही चमक थी जो एक बेटी की होती है जब माँ उसे समझकर उसके पक्ष में खड़ी होती है।

घर लौटकर रवि ने पूछा, “मामला सुलझ गया?”
संध्या बोली, “हाँ, अब दोनों ठीक हैं। मैंने कहा था ना, थोड़ा प्यार और समझदारी बहुत बड़ा चमत्कार कर देती है।”

रवि मुस्कुराए, “सच कहा तुमने — रिश्ते मकानों की तरह नहीं होते जो बन जाएँ और खत्म हो जाएँ। रिश्ते तो पेड़ की तरह होते हैं — रोज़ पानी चाहिए, रोज़ संभाल चाहिए।”

संध्या ने खिड़की से बाहर झाँका — सूरज ढल रहा था, लेकिन उसके दिल में सुकून था। उसने मन ही मन भगवान से कहा, “धन्य हूँ मैं, जो बहू नहीं, बेटी पाई।”

और दूर दिल्ली में, रश्मि और अमन पहली बार अपने साथ के लिए चाय बना रहे थे — जैसे नया रिश्ता, नई शुरुआत ले रहा हो।


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