सुबह के सात बज रहे थे। मनीषा अपने घर की बालकनी में खड़ी थी, हाथ में चाय का कप और आँखों में असंतोष की परत। सामने वाले बंगले में रहने वाली अर्चना मैडम हर सुबह अपनी चमचमाती कार में बैठकर ऑफिस निकल जाती थीं — प्रेस किया हुआ साड़ी, परफेक्ट हेयरस्टाइल और चेहरे पर आत्मविश्वास का साया।
मनीषा हर दिन उन्हें देखती और मन ही मन सोचती — “कितनी खुशकिस्मत है ये औरत! कितना अच्छा जीवन है इसका। न बच्चों की टेंशन, न सास-ससुर का बखेडा, बस नौकरी, पैसा और ऐश।”
उधर वही अर्चना, अपनी कार में बैठते हुए सड़क पार मनीषा के घर को देखती थी — उस खुले आँगन में बैठे मनीषा के दो बच्चे, उनके साथ बैठा बूढ़ा पिता, और चाय की महकते प्याले।
वो सोचती — “कितना सुकून भरा जीवन है मनीषा का। परिवार, बच्चों की हँसी, घर का अपनापन। मेरा तो पूरा दिन मशीन की तरह बीत जाता है, हँसने की फुर्सत नहीं।”
दोनों औरतें एक-दूसरे को देखतीं और सोचतीं कि दूसरी के पास वो सब है जो उनके पास नहीं।
पर असल में दोनों के पास वो था जो दूसरी चाहती थी।
मनीषा एक मध्यमवर्गीय गृहिणी थी। पति राजीव बैंक में क्लर्क थे। सुबह सात बजे दफ्तर निकलते और शाम को थके-मांदे लौटते। दो बच्चे थे — एक बेटा अभि, जो नौवीं में पढ़ता था, और छोटी बेटी नैना, जो अभी स्कूल में थी।
घर, बच्चों और सास-ससुर की जिम्मेदारी मनीषा के कंधों पर थी।
सुबह से लेकर रात तक वह एक मशीन की तरह काम करती — नाश्ता, लंच, टिफिन, सफाई, बच्चों की पढ़ाई, फिर रात का खाना।
कभी-कभी आईने में खुद को देखती और मुस्कुरा देती —
“कब की मनीषा खो गई, अब तो बस राजीव की पत्नी और बच्चों की माँ रह गई हूँ।”
उसका मन अक्सर चाहता कि कुछ अलग करे, बाहर निकले, खुद के लिए जिए।
पर हर बार जिम्मेदारियाँ उसे पीछे खींच लेतीं।
एक दिन दोपहर को वह अपनी सास के कमरे में गई तो देखा कि टीवी पर वही अर्चना मैडम थीं — एक न्यूज़ चैनल पर इंटरव्यू दे रही थीं।
“सोशल सर्विस में उनके योगदान के लिए उन्हें सम्मानित किया गया है,” एंकर कह रही थी।
मनीषा ने गहरी साँस ली —
“वाह! इतना काम, इतनी शोहरत, और मैं यहाँ बर्तनों की खनक में खोई हूँ…”
सास ने जैसे उसके मन की बात पढ़ ली —
“बिटिया, हर ज़िंदगी की अपनी धूप और छांव होती है। हमें बस ये तय करना होता है कि हमें धूप में चलना है या छांव में बैठकर ठहर जाना है।”
मनीषा ने कुछ नहीं कहा, पर ये वाक्य उसके मन में कहीं बैठ गया।
उसी शाम जब अर्चना अपने घर लौटी, तो माँ की तबियत अचानक बिगड़ गई।
वो डॉक्टर के पास भागी, दवा लाई, माँ को खाना खिलाया।
माँ ने कांपते हाथों से उसका चेहरा सहलाया —
“बेटी, सबको लगता होगा तू बहुत सुखी है, पर तू तो दिन-रात अकेली इस घर की दीवारों से लड़ती है।”
अर्चना की आँखें नम हो गईं।
“माँ, कभी-कभी लगता है सारी सफलता का क्या मतलब, जब बाँटने वाला कोई नहीं?”
माँ मुस्कुरा दी —
“बेटी, सुख हमेशा बाहर नहीं होता। सुख वो है जब तू अपने भीतर चैन महसूस करे। तेरे पास जो है, वही तेरा आशीर्वाद है।”
अगले दिन दोनों की दुनिया एक साथ जुड़ गई —
अर्चना के NGO ने मोहल्ले की औरतों के लिए “स्वरोजगार प्रशिक्षण शिविर” शुरू किया।
पोस्टर देखकर मनीषा का मन कुछ करने को मचल उठा।
“जाऊँ? क्या मुझे जाने देंगे?” उसने सोचा।
शाम को हिम्मत करके राजीव से कहा,
“वो… एक महिला शिविर लगा है। सिलाई-बुनाई सिखाते हैं, मैं सोचा सीख लूँ।”
राजीव ने हँसते हुए कहा,
“अरे भई, सीख लो, अच्छा ही है। बाहर निकलोगी तो मन भी बदल जाएगा।”
मनीषा खुश हो गई। अगले दिन वह पहली बार उस शिविर में पहुँची।
वहाँ दर्जनों औरतें थीं — कोई विधवा, कोई अकेली, कोई नौकरी छोड़ चुकी।
अर्चना मंच पर खड़ी थी, अपने आत्मविश्वास से भरी आवाज़ में बोल रही थी —
“हर औरत के पास कुछ न कुछ हुनर होता है। बस उसे पहचानने की देर होती है।”
मनीषा ध्यान से सुन रही थी। उसके भीतर कुछ जाग रहा था — जैसे बरसों से बुझी कोई चिंगारी फिर से जल उठी हो।
शिविर के बाद जब सब जा रहे थे, मनीषा झिझकते हुए अर्चना के पास आई।
“मैडम, आप बहुत अच्छा बोलती हैं। आपको देखकर लगता है कि मैं भी कुछ कर सकती हूँ।”
अर्चना मुस्कुरा दी, “कर सकती हैं नहीं, करिए। बस शुरुआत कीजिए। दुनिया का सबसे कठिन कदम पहला होता है।”
उस दिन दोनों के बीच जो बातचीत शुरू हुई, वो धीरे-धीरे दोस्ती में बदल गई।
मनीषा ने घर से सिलाई शुरू की।
अर्चना ने उसके काम को अपने NGO के ज़रिए प्रचारित किया।
धीरे-धीरे ऑर्डर बढ़े और मनीषा की पहचान भी।
एक दिन अर्चना ने कहा,
“देखा मनीषा, कभी-कभी धूप में चलना ज़रूरी होता है। अगर हमेशा छांव में बैठे रहोगी, तो सफ़र आगे नहीं बढ़ेगा।”
मनीषा मुस्कुरा दी —
“आप सही कहती हैं, धूप में चलने से डरती थी, पर अब महसूस होता है कि यही धूप मेरे लिए सबसे बड़ी ताकत बनी।”
कुछ महीने बाद, मोहल्ले में महिलाओं का एक कार्यक्रम रखा गया, जिसमें मनीषा को भी सम्मानित किया गया —
“स्वावलंबी महिला पुरस्कार।”
पुरस्कार लेने के बाद उसने मंच से कहा,
“कभी मुझे लगता था कि दूसरों का जीवन ही अच्छा है। पर आज समझ आई हूँ कि हर किसी की ज़िंदगी में धूप और छांव दोनों हैं। फर्क बस इतना है कि कुछ लोग धूप में चलना सीख लेते हैं।”
नीचे बैठी अर्चना ताली बजा रही थी — उसकी आँखों में खुशी थी।
वो जानती थी कि आज मनीषा ने सिर्फ सिलाई नहीं सीखी, उसने ज़िंदगी को बुनना भी सीख लिया है।
शाम को दोनों पार्क में साथ बैठी थीं।
मनीषा बोली,
“आपको देखकर मुझे लगता था कि आपकी ज़िंदगी में कोई परेशानी नहीं होगी।”
अर्चना हँसी —
“और मुझे तुम्हें देखकर लगता था कि तुम्हारे पास सच्चा सुकून है। देखो, दोनों गलत थे।”
मनीषा ने कहा,
“अब समझ आया कि श्रेष्ठता ऊँचे आसन से नहीं, ऊँची सोच से आती है। और सुख का मतलब दूसरों जैसा बनना नहीं, खुद को स्वीकार करना है।”
अर्चना ने आसमान की ओर देखा — सूरज ढल रहा था, पर उसकी किरणें अब भी चमक रही थीं।
“सफर में धूप बड़ी काम आई, मनीषा,” उसने कहा,
“छांव अगर होती तो शायद हम दोनों यहीं रुक गए होते।”
दोनों हँस पड़ीं।
उनकी हँसी में आत्मविश्वास था, जीवन की चमक थी —
और सबसे बढ़कर, धूप में चलने का साहस था।
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