"मां, मुझे कॉलेज से वजीफा मिल गया! अब मेरे सपने पूरे होंगे... मैं विदेश जाऊंगा पढ़ने के लिए!"
बाइस वर्षीय वंश कॉलेज से आते ही उल्लास से झूमते हुए बोला। उसके चेहरे पर जो चमक थी, वह किसी सूरज की पहली किरण जैसी थी — नई शुरुआत की, नए भविष्य की।
"क्या... मतलब तू विदेश चला जाएगा?"
साधना के हाथ से परात गिर गई। आटे की धूल उसके हाथों में लगकर वहीं ठहर गई, जैसे समय रुक गया हो। वह बेटे को देखती रह गई — अपने जीवन की पूरी जमा पूंजी, सारी मेहनत, सारे सपने उसी चेहरे में तो बसते थे।
"मां, बस दो साल की तो बात है... फिर तो आपके पास ही आऊंगा ना!"
वंश ने मुस्कुराते हुए मां को गले लगा लिया। साधना ने बेटे के सिर पर हाथ फेरा, मगर आंखों में भर आए आंसू छिपा न सकी।
"सही कह रहा है वंश..."
पीछे से आवाज आई — वंश के पिता, वीरेन की।
"साधना, बेटे को इतनी बड़ी खुशी मिली है। तुम भी खुश हो जाओ भई! दो साल तो यूं ही गुजर जाएंगे।"
फिर हल्के से मुस्कुराते हुए बोले, "मैं मिठाई लेकर आता हूं... तुम बढ़िया सी चाय और पकोड़े बनाओ — आज पार्टी होगी!"
इतना कहकर वीरेन बाहर निकल गए। मगर जब उन्होंने बरामदे में कदम रखा, तो आंखों के कोनों पर उभर आए आंसू खुद-ब-खुद ढलक गए। उन्होंने जल्दी से रुमाल निकाला, पोंछा और तेज़ी से मिठाई की दुकान की ओर बढ़ गए — शायद इसलिए कि कोई उन भावनाओं को न पढ़ ले, जो उनके दिल में उमड़ रही थीं।
वंश हमेशा से कुछ अलग करना चाहता था। बचपन से ही उसकी आंखों में बड़े सपने थे — विज्ञान, अनुसंधान, और दुनिया के सबसे बड़े विश्वविद्यालय में पढ़ने का। पिता वीरेन सरकारी दफ्तर में क्लर्क थे, और मां साधना गृहिणी। सीमित आय, लेकिन अनंत स्नेह। साधना ने बेटे के हर छोटे-बड़े सपने को अपनी इच्छाओं के ऊपर रखा था।
"मां, याद है ना आपने कहा था कि मेहनत करने वाला कभी खाली हाथ नहीं लौटता?"
वंश ने मां का हाथ पकड़ते हुए कहा, "आपका वो वाक्य मेरे दिल में हमेशा रहा, मां... इसी ने मुझे यहां तक पहुंचाया।"
साधना मुस्कुराई, पर आंखों में अजीब सी नमी थी — खुशी और दर्द का मिला-जुला भाव।
"पर बेटा, इतनी दूर कैसे रहूँगी मैं तेरे बिना?"
वंश ने उनकी गोद में सिर रख दिया, "आप तो मेरे दिल में रहोगी मां... फिर दूरी कैसी?"
दिन धीरे-धीरे बीतने लगे। पासपोर्ट, वीज़ा, कागज़ी काम, और सबसे कठिन — विदाई की तैयारी। साधना हर दिन कुछ न कुछ सहेजती रहती — “यह कंबल ले जा बेटा, वहां ठंड बहुत होगी।”
“यह मसाले, ताकि तू अपने स्वाद का खाना बना सके।”
हर चीज़ में ममता की खुशबू थी।
रविवार की सुबह वंश के जाने का दिन आ गया।
घर में एक अजीब सी चुप्पी थी। रसोई में पकौड़े तले जा रहे थे, पर खुशबू में मिठास नहीं थी।
वीरेन ने बेटे के बैग में दस्तावेज़, रुपये, और एक छोटी सी डायरी रखी।
"यह तुम्हारी मां ने लिखी है... जब मन उदास हो, तो इसे पढ़ लेना," उन्होंने धीमे से कहा।
वंश ने डायरी को अपने सीने से लगा लिया।
एयरपोर्ट पर पहुंचते समय साधना के कदम भारी थे।
"मां, अब रोओ मत... मैं जल्दी आ जाऊंगा।"
साधना कुछ नहीं बोली, बस बेटे का चेहरा अपने दोनों हाथों में लेकर माथा चूमा।
"जितनी मेहनत की है न तूने, उतनी ही दुआएं मेरी तेरे साथ हैं। बस, खुद को कभी अकेला मत समझना।"
विदेश पहुंचकर वंश की दुनिया बदल गई। नई जगह, नए लोग, नई भाषा — सब कुछ अनजाना। पर उसकी मेहनत रंग लाई। उसने रिसर्च प्रोजेक्ट्स में नाम कमाया, प्रोफेसर उसे “इंडियन प्रॉडिजी” कहकर पुकारते थे।
हर रात वह मां से वीडियो कॉल करता।
"मां, आज मैंने खुद खाना बनाया!"
"क्या?" साधना हंस पड़ी, "तो अब मेरी जगह तू रसोइया भी बन गया?"
"हां मां, लेकिन आपके हाथों का स्वाद तो यहां मिल ही नहीं सकता।"
वीरेन चुपचाप बैठे मुस्कुराते रहते। उन्होंने कभी खुलकर नहीं कहा, पर भीतर ही भीतर वंश पर उन्हें गर्व था।
हर महीने वंश पैसे भेजता — “मां, इससे घर के बाहर की दीवार पेंट करा लेना।”
“बेटा, तू अपनी पढ़ाई पर ध्यान दे, हमें कुछ नहीं चाहिए,” साधना कहती, पर अगले ही दिन उस पैसे से किसी गरीब के बच्चे की फीस भर देती।
एक शाम वीरेन ने फोन उठाया।
"हैलो वंश, मां की तबीयत थोड़ी ठीक नहीं है। बस थोड़ा बुखार है, चिंता मत करना।"
"पापा, आप डॉक्टर को दिखा दीजिए... मैं कॉल करता हूं।"
वंश के चेहरे पर चिंता की लकीरें उभर आईं।
कुछ हफ्ते बीते, पर साधना की तबीयत बिगड़ती गई। डॉक्टर ने बताया कि उन्हें हार्ट की समस्या है।
वीरेन ने बेटे को बताया तो वह परेशान हो उठा।
"पापा, मैं आ जाऊं क्या?"
"नहीं बेटा, अब बस कुछ ही महीने बाकी हैं तुम्हारे कोर्स के... तुम्हारी मां चाहती हैं कि तुम अपनी पढ़ाई पूरी करो।"
वंश बेचैन था। उसने हर रोज मां से वीडियो कॉल पर बातें कीं।
साधना हमेशा मुस्कुराती, कहती —
"मैं ठीक हूं बेटा, तुझे कमजोर नहीं देख सकती। तू बस मन लगाकर पढ़।"
एक रात वंश के पास पार्सल आया। उसके भीतर वही डायरी थी — जो वह ले गया था। पर उसमें अब एक नया पन्ना जुड़ा था — मां की लिखावट में।
"मेरे लाल,
अगर यह पत्र तू पढ़ रहा है, तो शायद मैं अब तुझसे दूर हूं।
पर मां कहीं जाती नहीं बेटा, बस तेरे आसपास हवा बनकर, दुआ बनकर रहती है।
तू जहां भी रहेगा, मेरी दुआएं तेरे साथ होंगी।
तेरा हर सपना मेरा आशीर्वाद है।
याद रख, बेटा — मां का प्यार कभी खत्म नहीं होता।
— तेरी मां, साधना।"
वंश के हाथ कांप गए। आंखों से आंसू झर-झर गिरने लगे।
वह घुटनों पर बैठ गया, मां की तस्वीर सीने से लगा ली।
फोन उठाया — पापा की आवाज आई, भारी और टूटी हुई।
"बेटा... तेरी मां अब चैन से सो गई है।"
वंश तुरंत भारत लौटा।
घर वैसा ही था — पर अब हर चीज़ में खालीपन था। मां की चूड़ियों की खनक गायब, उनकी हंसी की गूंज कहीं खो गई थी।
उसने मां के कमरे में जाकर वही पुराना तकिया उठाया, जिसमें अब भी उनकी खुशबू थी।
वीरेन उसके पास आए, बोले —
"बेटा, तेरी मां तुझसे बहुत खुश थी। उसने आख़िरी सांस तक तेरा नाम लिया।"
वंश ने आंखें बंद कीं और कहा,
"पापा, अब मैं यहीं रहूंगा। जो मां ने छोड़ा है, उसे मैं आगे बढ़ाऊंगा। हमारे गांव के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलूंगा — ‘साधना एजुकेशन सेंटर’।"
कुछ महीने बाद स्कूल की नींव रखी गई। गांव के बच्चे, जो कभी सपने देखने से डरते थे, अब कहते —
“हम भी वंश भैया जैसे बनेंगे।”
वंश ने आकाश की ओर देखा —
“मां, अब मैं विदेश नहीं, अपने गांव के बच्चों के सपने पूरे करूंगा। जैसे आपने मेरे किए थे।”
हवा में एक हल्की सी सिहरन हुई — जैसे कोई अदृश्य हाथ उसके सिर पर आशीर्वाद दे गया हो।
सूरज ढल रहा था, पर वंश के जीवन में नई सुबह उग आई थी।
समाप्त।
मूल लेखिका
संगीता अग्रवाल
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