सुबह की हल्की धूप खिड़की से छनकर कमरे में आ रही थी। सुनीता देवी अलमारी से पुराने कपड़े निकाल रही थीं। कुछ फटे थे, कुछ ढीले हो चुके थे। उन्हें देखते हुए वह खुद से बुदबुदाईं, “इन कपड़ों की भी उम्र हो गई... ठीक मेरी तरह।” उन्होंने अलमारी बंद की और कुर्सी पर बैठ गईं। यह वही कुर्सी थी, जिस पर उनके पति शरद बाबू रोज़ अख़बार पढ़ा करते थे। अब वो कुर्सी और वो अख़बार दोनों ही धूल में डूब चुके थे।
तीन साल पहले ही शरद बाबू का देहांत हो गया था। उनके जाने के बाद सुनीता का संसार जैसे सिमट गया। दो बेटे थे — बड़ा बेटा रवि, जो दिल्ली में एक प्राइवेट कंपनी में काम करता था, और छोटा सचिन, जो शादी के बाद अपने ससुराल वालों के साथ नोएडा में बस गया था। शुरुआत में दोनों बेटे हर हफ्ते फोन करते, हाल-चाल पूछते। पर धीरे-धीरे कॉल का अंतराल बढ़ता गया। अब महीनों बीत जाते, कोई हाल नहीं लेता।
सुनीता ने कभी किसी से कुछ मांगा नहीं। बस चाहती थीं कि कोई उनसे दो बातें कर ले, उनके अकेलेपन को थोड़ा बाँट ले। लेकिन आज के बच्चे समय से ज़्यादा महत्व काम और सुविधा को देते हैं। रवि की पत्नी रीमा नौकरी करती थी, दोनों सुबह निकल जाते और रात को लौटते। वहीं सचिन की पत्नी पूजा हमेशा अपनी मम्मी के घर में ही रहना पसंद करती। ऐसे में सुनीता का अकेलापन उनकी दिनचर्या बन गया था।
सुबह उठकर मंदिर की सफाई करना, तुलसी में जल देना, चाय बनाना और फिर बरामदे में बैठकर लोगों को आते-जाते देखना — यही अब उनका जीवन था। पड़ोस की नीलम चाची कभी-कभी मिलने आ जाती थीं, पर उनकी बातें भी ज़्यादातर शिकायतों से भरी होतीं।
एक दिन, जब सुनीता दूध लेने के लिए बाहर निकलीं, तो देखा कि गली के नुक्कड़ पर एक बच्चा बैठा रो रहा है। उसके कपड़े मैले थे और हाथ में एक पुराना टिफिन था। सुनीता पास गईं, “क्या हुआ बेटा, क्यों रो रहे हो?” बच्चे ने सुबकते हुए कहा, “आंटी, भूख लगी है। कल रात से कुछ नहीं खाया।”
सुनीता ने बिना कुछ सोचे उसे अपने घर ले आईं। उसे नहाने को कहा, फिर रोटी और आलू की सब्जी परोसी। बच्चा भूख से इतना बेहाल था कि मिनटों में सब खा गया। सुनीता मुस्कुरा उठीं, “नाम क्या है तुम्हारा?”
“राजू,” उसने धीरे से कहा।
“कहां रहते हो?”
“कोई घर नहीं है आंटी... माँ-पापा नहीं हैं।”
सुनीता का दिल पिघल गया। उन्होंने सोचा, “ईश्वर ने अगर मेरे जीवन से सब ले लिया, तो शायद किसी और को देने के लिए ही।” उन्होंने राजू को अपने पास रख लिया। वह दिनभर घर में छोटे-मोटे काम कर देता, और सुनीता उसे पढ़ाई करवाने की सोचने लगीं।
धीरे-धीरे राजू ने उनका दिल जीत लिया। वह सुबह अख़बार लाता, चाय बनवाने में मदद करता, और शाम को सुनीता के साथ मंदिर जाता। वह कमरे में हंसी भर देता — जो आवाज़ कई महीनों से गायब थी।
लेकिन हर सुख की तरह, यह सुख भी ज्यादा दिन नहीं टिक पाया। एक दिन पड़ोसी वर्मा जी ने रवि को फोन कर दिया, “अरे बेटा, तुम्हारी मां के घर में कोई लड़का रहने लगा है, उम्र तो 10-12 साल की होगी।”
रवि तुरंत घर आया। “मां, यह सब क्या है? आप किसी अजनबी बच्चे को घर में कैसे रख सकती हैं?”
सुनीता बोलीं, “वह अजनबी नहीं है बेटा। भूखा था, अनाथ है। मैंने बस एक इंसान की तरह उसे खाना दिया।”
रवि ने कठोर आवाज़ में कहा, “मां, आजकल ज़माना बहुत खराब है। कोई मुसीबत हो गई तो कौन जिम्मेदार होगा? मैं उसे यहाँ नहीं रहने दूँगा।”
सुनीता ने बहुत समझाया, “बेटा, ईश्वर ने दिया है तो बांटने में क्या हर्ज़ है?”
पर रवि ने राजू को उसी शाम अनाथालय पहुंचा दिया।
सुनीता ने उस रात खाना नहीं खाया। उनकी आंखों से आंसू चुपचाप बहते रहे। उस दिन के बाद घर में फिर वही सन्नाटा लौट आया। दीवारें फिर से बोलना भूल गईं।
कुछ दिन बीते ही थे कि रवि की कंपनी में छंटनी हो गई और उसकी नौकरी चली गई। रीमा ने कहा, “अब क्या करेंगे? इतने सालों की नौकरी में कुछ बचाया नहीं।”
रवि बेचैन होकर बोला, “मां के पास थोड़े पैसे हैं, शायद पापा की पेंशन से कुछ बचा हो।”
वह अगले ही दिन मां के घर पहुंचा। घर का दरवाजा खुला था, पर भीतर सन्नाटा था। वह अंदर गया, मां पूजा कर रही थीं। “मां, मैं…” उसने कहा ही था कि सुनीता ने शांत स्वर में कहा, “तू बैठ बेटा, चाय बना देती हूं।”
रवि को अपनी मां की आवाज़ में ठंडापन महसूस हुआ। उसने सोचा, “शायद मां अभी भी नाराज़ हैं।”
चाय पीते हुए उसने मां से कहा, “मां, मेरी नौकरी चली गई है… कुछ दिन यहां रह जाऊं?”
सुनीता बोलीं, “यह घर तुम्हारा ही है बेटा, जब चाहो आ सकते हो। लेकिन एक बात कहूं? रिश्ते वही रहते हैं, जो विश्वास और सम्मान से जुड़े हों। जहां स्वार्थ आता है, वहां अपनापन धीरे-धीरे खत्म हो जाता है।”
रवि चुप हो गया। कुछ कहने की हिम्मत नहीं जुटा पाया। अगले दिन जब वह बाहर निकला तो गेट पर देखा — वही राजू खड़ा था, हाथ में एक पुराना बैग लिए।
“मां आंटी हैं क्या?” उसने पूछा।
रवि अवाक रह गया। “तू फिर यहां?”
राजू बोला, “मैं भागकर नहीं आया। अनाथालय में मुझे पढ़ने की सुविधा मिली, पर मन नहीं लगा। मैं बस आंटी को देखना चाहता था।”
सुनीता बाहर आईं, उसे देखते ही आंखें छलक गईं। उन्होंने राजू को गले लगा लिया। “बेटा, अब तू कहीं नहीं जाएगा। तू अब यहीं रहेगा — मेरे साथ, मेरे घर में।”
राजू मुस्कुरा उठा, “सच में आंटी?”
“हां बेटा, अब मैं तेरा साथ कभी नहीं छोड़ूंगी।”
रवि यह सब देखता रहा। उस पल उसे एहसास हुआ कि उसकी मां ने हमेशा दूसरों के लिए जिया है — और वह खुद अपने स्वार्थ में कितना अंधा हो गया था।
उसने मां के पैर छुए, “मां, माफ कर दो। शायद आपने सही कहा था — जहां दिल में अपनापन हो, वही असली घर होता है।”
सुनीता ने उसके सिर पर हाथ फेरा, “कोई बात नहीं बेटा, अब समझ गया, वही काफी है।”
दिन बीतते गए। राजू अब स्कूल जाने लगा था, और शाम को सुनीता की मदद करता। रवि ने भी पास में नौकरी ढूंढ ली थी और हर हफ्ते मां से मिलने आने लगा था।
एक दिन राजू ने अपनी कॉपी में कुछ लिखा —
“मां, अगर किसी को भगवान नहीं मिले, तो वो मां जैसी किसी इंसान से मिल ले, वही काफी है।”
सुनीता ने पढ़ा और आंखों से आंसू बह निकले।
उन्होंने ऊपर आसमान की ओर देखा, मानो शरद बाबू से कह रही हों —
“देखिए जी, मैंने फिर से अपना घर बसा लिया।”
अब उनके जीवन में फिर से रौनक थी।
रवि, राजू और सुनीता — तीनों मिलकर हर शाम हंसते-बोलते खाना खाते।
और उस घर की दीवारों में अब एक नई कहानी गूंजती थी —
जहां “खून का रिश्ता” नहीं, बल्कि “दिल का रिश्ता” जीत गया था।
0 टिप्पणियाँ