मैं ससुराल नहीं जाऊँगी

 “माँ, आप प्लीज़ समझिए… मैं अब वहाँ वापस नहीं जाऊँगी,”

नेहा ने कांपती आवाज़ में कहा।

वो पल रजनी के लिए किसी बिजली की तरह गिरा।
एक पल को उन्हें लगा जैसे कानों ने कुछ गलत सुन लिया हो।
“क्या कहा तूने नेहा? वापस नहीं जाएगी? ये क्या कह रही है तू?”

नेहा की आँखें सूजी हुई थीं, चेहरा पीला पड़ा था, और हाथों की उंगलियाँ लगातार साड़ी के किनारे से खेल रही थीं।

“माँ, बस बहुत हो गया। अब मैं और नहीं झेल सकती…”

रजनी की नज़रें बेटी के चेहरे पर टिक गईं। वो समझ चुकी थीं, बात गहरी है, मगर अब पूछना जरूरी था।
“बेटा, हुआ क्या है? तू तो कहती थी कि ससुराल में सब ठीक है।”

नेहा ने सिर झुका लिया, और धीमे स्वर में बोली —
“हाँ माँ, सब ठीक था… या शायद मैं ही खुद को झूठ बोल रही थी।”

नेहा की शादी को तीन साल हुए थे। उस दिन भी जब बारात दरवाजे पर आई थी, रजनी और उसके पति अशोक जी के चेहरे पर गर्व था। “हमारी नेहा कितनी भाग्यशाली है, इतना सुशील लड़का मिला है।” सब यही कहते थे।

राहुल पढ़ा-लिखा था, बैंक में नौकरी करता था। शादी के बाद कुछ महीने तक सब अच्छा चला। लेकिन फिर धीरे-धीरे नेहा को एहसास होने लगा कि उसकी ससुराल की दीवारें मुस्कुराती नहीं, केवल दिखावा करती हैं।

राहुल की माँ सुधा देवी हर समय नेहा में कमी निकालतीं —
“इतनी देर से उठी! मेरी बहू तो सूरज के साथ जागनी चाहिए थी।”
“ये साड़ी ठीक से पहन नहीं सकती।”
“बेटे, बैंक में काम करता है और बीवी को खाना बनाना भी नहीं आता।”

शुरू में नेहा ने चुप रहना सीखा। उसे लगता था, शादीशुदा जिंदगी में थोड़ा-बहुत सब सहते हैं।
पर ये ‘थोड़ा’ कब ‘बहुत’ बन गया, उसे खुद नहीं पता चला।

धीरे-धीरे राहुल भी बदलने लगा।
पहले हंसी-मजाक से शुरू होने वाली बातें अब शिकायतों में बदल गईं।
“माँ ठीक कहती हैं, तुममें घर चलाने की समझ नहीं है।”
“तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें सिर्फ किताबें पकड़ाई हैं, घर चलाना नहीं सिखाया।”

नेहा हर दिन अपने आँसू छुपाकर काम करती रही। उसे उम्मीद थी कि एक दिन सब ठीक हो जाएगा।
लेकिन एक दिन उस उम्मीद की भी मौत हो गई।

वो शाम याद करते हुए नेहा की आँखें भर आईं।
“माँ, उस दिन मैंने सिर्फ इतना कहा था कि मुझे भी अपने मायके जाना है, दो महीने से आपसे बात नहीं हुई थी। बस यही कहना था, और राहुल ने कहा — ‘मेरी माँ को पसंद नहीं कि मेरी बीवी बार-बार मायके जाए। अगर तुमको वहाँ ही रहना है तो यहीं का दरवाजा खुला है।’”

रजनी का दिल बैठ गया।
“उसने ऐसा कहा? उसने तुम्हें मायके जाने से मना किया?”

“हाँ माँ, और फिर जब मैंने चुप नहीं रही, तो उसने मेरे ऊपर हाथ उठा दिया।”

रजनी की सांसें रुक गईं।
अशोक जी, जो अब तक कमरे में खामोश बैठे थे, उठकर बोले —
“कब हुआ ये?”

“तीन दिन पहले, पापा,” नेहा बोली। “मैं तब से ही मन बना चुकी थी कि अब वहाँ नहीं लौटूंगी।”

रजनी ने बेटी को गले से लगा लिया।
“बेटा, तूने पहले क्यों नहीं बताया?”

“बताने की कोशिश की थी माँ, पर उनका फोन मेरे सामने ही बंद करवा दिया गया। कहते थे, अब तुम्हें अपने मायके की ज़रूरत नहीं।”

कमरे में सन्नाटा पसर गया।
कुछ देर बाद अशोक जी ने गहरी सांस ली और कहा —
“नेहा, बेटी, अब तू वहीं रहेगी जहाँ तुझे सम्मान मिले। शादी कोई सौदा नहीं होती। तू किसी की संपत्ति नहीं है।”

रजनी ने पति की तरफ देखा।
“लेकिन समाज क्या कहेगा?”

अशोक जी बोले, “समाज तब कहाँ था जब हमारी बेटी को ताने मिल रहे थे? जब उस पर हाथ उठाया गया? अब समाज के डर से मैं अपनी बेटी को नरक में नहीं भेजूंगा।”

नेहा कुछ नहीं बोली, बस अपनी माँ के आँचल में सिर छिपा लिया।

अगले दिन सुबह सुधा देवी का फोन आया।
“क्या नाटक है ये? नेहा कब लौटेगी? मोहल्ले में लोग बातें कर रहे हैं!”

अशोक जी ने शांत स्वर में कहा —
“समधन जी, अब नेहा वहीं रहेगी जहाँ उसे इज़्ज़त मिले। जब तक आप और आपका बेटा उसके साथ इंसानियत से पेश नहीं आएंगे, मेरी बेटी वहाँ कदम नहीं रखेगी।”

सुधा देवी की आवाज़ ऊँची हो गई —
“अरे, ऐसे थोड़ी न होता है! औरत को ससुराल ही घर होता है।”

“गलत, समधन जी,” अशोक जी ने दृढ़ स्वर में कहा। “घर वो होता है जहाँ एक औरत को डर नहीं, भरोसा महसूस हो।”

फोन कट गया।

कई दिन बीते। राहुल के कोई कॉल नहीं आए।
नेहा धीरे-धीरे संभलने लगी थी। उसने पास के स्कूल में नौकरी करना शुरू कर दिया।
रजनी रोज सुबह उसे देखकर गर्व महसूस करती — वही नेहा, जो कुछ महीने पहले डरी-सहमी थी, अब आत्मविश्वास से बच्चों को पढ़ाती थी।

एक शाम राहुल खुद दरवाजे पर आ गया।
“नेहा, मैं माफी मांगने आया हूं।”

रजनी और अशोक जी दोनों चौंक गए।
राहुल ने सिर झुका लिया।
“मैंने गलती की है। मम्मी का दबाव था, लेकिन मैंने भी बहुत गलत किया। मैं चाहता हूं कि तुम मेरे साथ वापस चलो।”

नेहा ने कुछ पल उसकी आँखों में देखा।
“राहुल, मैं तुम्हारी गलती माफ करती हूं, लेकिन वापस नहीं जाऊंगी।”

“क्यों नेहा? क्या तुम्हें मुझसे अब प्यार नहीं?”

“प्यार तब तक रहता है जब तक सम्मान जीवित रहता है। तुमने मुझे खुद से दूर कर दिया था। अब मैं अपने पैरों पर खड़ी हूँ। मैं अब किसी के भरोसे नहीं रहना चाहती।”

राहुल की आँखें भर आईं।
अशोक जी ने आगे बढ़कर कहा, “बेटा, अब तुम्हें समझना होगा कि रिश्ते मजबूरी से नहीं, समानता से चलते हैं।”

राहुल बिना कुछ बोले लौट गया।

कई महीने बाद, नेहा ने स्कूल में स्थायी पद हासिल किया। अब वो खुद अपने माता-पिता का सहारा बन चुकी थी।

रजनी हर सुबह उसकी मुस्कान देखती और सोचती —
कभी-कभी बेटी का मायका लौटना हार नहीं होता, वो उसकी नई शुरुआत होती है।

उस दिन नेहा ने धीरे से कहा,
“माँ, अगर उस दिन मैं आपकी गोद में सिर नहीं रखती, तो शायद आज मैं फिर से सिर उठाकर खड़ी नहीं हो पाती।”

रजनी ने मुस्कुराते हुए कहा,
“बेटी, औरत तब नहीं गिरती जब उसे कोई ठोकर मारता है,
वो तब गिरती है जब खुद पर विश्वास छोड़ देती है।”

नेहा ने माँ के हाथ थामे, और खिड़की के पार झाँका।
सूरज ढल रहा था, लेकिन उसकी किरणें अब भी चमक रही थीं —
ठीक वैसे ही, जैसे नेहा की ज़िंदगी में एक नई रोशनी ने जगह बना ली थी।

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