वृंदावन मोहल्ले के पुराने मकान में आज अजीब सी खामोशी थी।
बरामदे के कोने में बैठी कुसुम देवी सिसक रही थीं, और सामने लकड़ी की कुर्सी पर हरिनारायण जी चुपचाप सिर झुकाए बैठे थे।
उनके चारों बेटे — मोहन, सुरेश, राकेश, और महेन्द्र — सब एक–एक फाइल लिए हुए थे। फाइलों में संपत्ति के कागज़, नक्शे, और घर की दीवारों के माप थे।
आज घर का बंटवारा होने वाला था।
संपत्ति का नहीं, बल्कि माता–पिता का भी।
हरिनारायण जी ने अपनी पूरी ज़िंदगी नौकरी करते हुए बिताई थी।
पचास साल पुराने इस घर को उन्होंने अपनी मेहनत की कमाई से बनाया था।
सिर्फ घर नहीं, एक सपना बनाया था — कि उनके चारों बेटे यहीं रहेंगे, एक छत के नीचे, एक दूसरे का सहारा बनेंगे।
कुसुम देवी ने अपना जीवन घर–परिवार में खपा दिया था।
चारों बेटों की परवरिश, पढ़ाई, शादी—सब कुछ उन्होंने अपने हाथों से सँभाला था।
वे हमेशा कहा करतीं,
“मेरे बेटे चार दिशाओं की तरह हैं, चाहे अलग-अलग चलें, पर सूरज तो एक ही होता है — अपने माता-पिता का।”
पर वक्त की धूप ने इन दिशाओं को अलग कर दिया।
सब कुछ ठीक चल रहा था, जब तक सबसे बड़ा बेटा मोहन ने अपनी पत्नी के कहने पर हिस्सा माँगना शुरू नहीं किया।
“पापा, अब हम सबकी जिम्मेदारियाँ बढ़ गई हैं। क्यों न घर का हिस्सा बाँट दिया जाए?”
हरिनारायण जी ने पहले तो बात टाल दी,
“बेटा, यह घर सबका है, किस बात का हिस्सा?”
पर बात बढ़ती चली गई।
दूसरे बेटे सुरेश ने कहा, “भैया ठीक कहते हैं, अब हर किसी को अपनी आज़ादी चाहिए।”
तीसरे और चौथे बेटे ने भी हामी भर दी।
और फिर वही हुआ, जो हर मध्यमवर्गीय परिवार में होता है —
‘घर’ मकान बन गया।
सुबह से ही घर में हलचल थी।
वकील आया, समाज के दो–तीन बड़े बुज़ुर्ग भी बैठे थे, ताकि मामला “शांति से” निपट जाए।
हरिनारायण जी की आँखों में नींद नहीं थी, और कुसुम देवी का चेहरा पीला पड़ा था।
वकील ने दस्तावेज़ों पर कलम चलाई,
“चार हिस्से बराबर के... सामने का हिस्सा मोहन को, बायाँ हिस्सा सुरेश को, पिछला भाग राकेश को, और ऊपरी मंज़िल महेन्द्र को।”
सबने दस्तखत किए।
काग़ज़ों की खड़खड़ाहट के बीच कोई आवाज़ नहीं थी, बस दीवारों का दर्द सुनाई दे रहा था।
कुसुम देवी ने धीरे से कहा,
“बेटा, घर का हिस्सा बाँट लिया, अब हम दोनों का क्या होगा?”
कमरे में सन्नाटा छा गया।
मोहन बोला, “माँ, आप लोग चिंता मत करो, हम सब सोच चुके हैं।”
मोहन ने कागज़ की एक और पर्ची निकाली —
“माँ, हम चारों भाइयों ने तय किया है कि आप और पापा हमारे पास बारी-बारी से रहेंगे।”
कुसुम देवी मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोलीं,
“मतलब तीन-तीन महीने?”
राकेश बोला, “हाँ, मगर… एक साथ नहीं।”
कुसुम देवी चौंकी, “अलग-अलग? मतलब?”
सुरेश ने धीमे स्वर में कहा,
“माँ, महँगाई बहुत बढ़ गई है। एक साथ दो लोगों को रखना थोड़ा मुश्किल है, इसलिए हमने सोचा कि पापा तीन महीने मेरे पास रहेंगे और आप मोहन भैया के पास।”
कुसुम देवी के होंठ कांप गए।
हरिनारायण जी की आँखों में आँसू थे — मगर उन्होंने कुछ नहीं कहा।
शायद उन्हें डर था कि कुछ कहने पर बेटे नाराज़ न हो जाएँ।
वकील ने सबकी बात सुनी और दस्तावेज़ पर नोट कर लिया —
“माता–पिता दोनों को बारी-बारी से अलग-अलग बेटों के पास रखा जाएगा।”
कोई नहीं समझ सका कि यह सिर्फ कानूनी नहीं, मानवीय बंटवारा था — ममता का, सम्मान का, और अस्तित्व का।
पहले तीन महीने कुसुम देवी मोहन के घर रहीं।
बहू पूजा उनके आने से खुश नहीं थी।
“माँ जी, दूध बचा लें, दाम बढ़ गए हैं,” वह रोज़ कहती।
मोहन दफ्तर चला जाता, बच्चे स्कूल, और कुसुम देवी दिन भर अकेली बैठी रहतीं।
हरिनारायण जी उन दिनों सुरेश के घर थे।
वहाँ बहू सीमा ने उन्हें खाना अलग दे दिया था — “पिताजी नमक कम खाइए, गैस की कीमत बढ़ गई है।”
दोनों पति-पत्नी एक-दूसरे से फोन पर बात करते।
“तुम ठीक हो न, हरि?”
“हाँ कुसुम, सब ठीक है... बस तुमसे बात नहीं होती, तो दिन अधूरा लगता है।”
कुसुम देवी चुप रह जातीं, क्योंकि फोन पर भी आँसू दिखाई नहीं देते।
तीन महीने बाद कुसुम देवी पहुँचीं राकेश के घर।
यहाँ थोड़ी देखभाल मिली, पर वहाँ जगह की कमी थी।
राकेश की बेटी ने कहा, “दादी, मेरा कमरा खाली कर दो न।”
दादी ने मुस्कुराते हुए अपना बिस्तर बरामदे में लगा लिया।
हरिनारायण जी अब महेन्द्र के घर थे।
महेन्द्र नया-नया नौकरी पर था, घर छोटा था।
“पिताजी, आप टीवी कम देखें, बिजली का बिल बहुत आता है,” उसने कहा।
हरिनारायण जी ने सिर हिलाया, “ठीक है बेटा, मैं अब रेडियो सुन लिया करूँगा।”
धीरे-धीरे दोनों बूढ़े शरीर और भी झुक गए।
ममता बाँटी जा सकती है, लेकिन अकेलापन नहीं।
वे अब अपने बच्चों से मिलने नहीं, मिलाने के लिए आते थे।
एक दिन पड़ोसी शर्मा जी आए और बोले,
“हरिनारायण जी, आप दोनों बहुत भाग्यशाली हैं। आजकल तो बच्चे माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देते हैं, कम से कम आपके बच्चे आपको अपने घरों में रखते हैं।”
हरिनारायण जी ने फीकी मुस्कान दी,
“हाँ शर्मा जी, हम तो अब ‘घूमंतू संत’ हो गए हैं। तीन महीने इधर, तीन महीने उधर।”
शर्मा जी ने मज़ाक में कहा, “कम से कम ट्रैवलिंग तो फ्री है!”
पर उस मज़ाक के पीछे जो सच्चाई थी, वह किसी ने महसूस नहीं की।
सर्दियों की एक रात थी।
कुसुम देवी की तबीयत अचानक बिगड़ गई।
राकेश शहर से बाहर था, बहू बच्चों के साथ शादी में गई थी।
कुसुम अकेली थी। उसने फोन पर सुरेश को कॉल किया, पर नेटवर्क नहीं मिला।
दूसरे दिन जब मोहल्ले वालों ने दरवाज़ा खटखटाया, तो पाया कि कुसुम देवी ठंड से काँप रही थीं।
उन्हें अस्पताल पहुँचाया गया, पर देर हो चुकी थी।
जब खबर चारों बेटों तक पहुँची, तो सब दौड़े आए।
हरिनारायण जी को जैसे दुनिया रुक गई हो।
उन्होंने बस इतना कहा,
“तुम सबने घर बाँटा था, अब आओ... माँ की चिता का भी हिस्सा बाँट लो।”
पूरा समाज स्तब्ध था।
जिस बंटवारे को सबने सामान्य माना था, उसी ने आज एक मां की जान ले ली थी।
कुसुम देवी के जाने के बाद बेटों ने पहली बार एक साथ बैठकर बात की।
मोहन ने रोते हुए कहा, “हमसे गलती हो गई पापा।”
हरिनारायण जी ने शांत स्वर में कहा,
“गलती नहीं, पाप हुआ है बेटा। घर का बंटवारा समझ में आता है, लेकिन माँ-बाप का नहीं। ये परंपरा मत बनाना।”
कुछ दिन बाद उन्होंने घर के सारे कागज़ फाड़ दिए।
“अब यह घर न मेरा है, न तुम्हारा। जो चाहे इसे बेच दे। मैं अब किसी का बोझ नहीं रहूँगा।”
और वे चले गए — वृद्धाश्रम नहीं, एक सेवा केंद्र में जहाँ बुज़ुर्ग एक-दूसरे के साथ रहते थे।
समय बीता।
सालों बाद जब मोहन के बेटे ने कहा,
“पापा, अब आपको और मम्मी को अलग-अलग रहना होगा, खर्च ज़्यादा हो रहा है,”
मोहन की आँखें भर आईं।
उसे याद आया — यही फैसला उसने कभी अपने माता-पिता के लिए लिया था।
वह देर रात रो पड़ा।
समय का चक्र पूरा घूम चुका था।
घर का बंटवारा दर्द देता है, पर माता-पिता का बंटवारा समाज की आत्मा को चीर देता है।
जो आज अपने माँ-बाप को बाँटते हैं, कल वही खुद बँट जाते हैं।
रिश्तों की कीमत रुपये में नहीं, सम्मान और संवेदना में आँकी जाती है।
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