“नेहा! तुम हमेशा किताबों में ही क्यों गुम रहती हो? घर में भी कुछ कामकाज कर लिया करो कभी-कभी। दिन भर कॉलेज में रहो, और जब घर लौटो तो किताब लेकर बैठ जाओ — जैसे घर के सारे काम तुम्हारी बड़ी बहन और मैं ही करें!”
सुनीता देवी की आवाज़ रसोई से गूंज उठी।
नेहा, जो अपने कमरे में टेबल लैंप की हल्की रोशनी में पढ़ाई में डूबी थी, चौंक पड़ी।
“हाँ माँ, बस पाँच मिनट... एक नोट पूरा कर लूँ, फिर आती हूँ।”
“अरे रहने दो! तुम्हारे पाँच मिनट तो घंटों में बदल जाते हैं।”
सुनीता देवी ने झल्लाकर कहा और बेलन को आटे में पटक दिया।
इतने में बड़ी बहन किरण भी वहीं आ गई, होंठों पर हल्की सी मुस्कान और आवाज़ में व्यंग्य —
“माँ, इसे कुछ कहने से फायदा नहीं। ये तो बड़ी हो गई है अब, बड़े सपने जो देख रही है — कलेक्टर बनने के! घर का काम इसके लिए नहीं बना। पापा ने इसे सिर पर चढ़ा रखा है, तभी तो न तुमसे डरती है, न किसी की सुनती है।”
किरण के व्यंग्य ने सुनीता के गुस्से को और भड़का दिया।
“सही कह रही है तू, किरण। आजकल की लड़कियाँ बस पढ़-लिखकर आसमान में उड़ना चाहती हैं, घर की ज़मीन पर रहना भूल जाती हैं।”
नेहा ने किताब बंद की, गहरी साँस ली और कमरे से बाहर आकर बोली —
“माँ, मैं आ गई हूँ। क्या काम है?”
“काम नहीं, बस इतना कि तुम्हें भी कुछ जिम्मेदारी उठानी चाहिए।”
माँ का लहजा अब ठंडा था, पर शब्दों में चुभन थी।
किरण फिर बोली —
“माँ, इससे क्या कहना? इसको तो लगता है घर के काम करना नीच काम है। इसे तो बस कलेक्टर बनने के सपने देखने हैं।”
नेहा अब तक चुप थी, पर किरण की बातों ने उसकी आँखों में आग भर दी।
“दीदी, आप हमेशा ऐसी बातें क्यों करती हैं? हर बार माँ को भड़काने की क्या ज़रूरत है? आप चाहें तो खुद कुछ अच्छा कर सकती हैं, लेकिन दूसरों को रोककर आपको क्या मिलता है?”
“वाह! अब तू मुझे सिखाएगी? तू भूल गई कि जब कॉलेज जाने की बात आई थी तो मैंने ही कहा था कि माँ, नेहा को आगे भेज दो?”
“भेज दो?” नेहा की आवाज़ काँप उठी।
“आपने माँ को रोका था! आपने ही कहा था कि कॉलेज गाँव से बहुत दूर है, माहौल ठीक नहीं है, लड़की अकेली जाएगी तो लोग क्या कहेंगे! और माँ ने आपकी बात मान ली। उस दिन आपने मेरी जिंदगी की दिशा ही बदल दी।”
किरण की मुस्कुराहट अब फीकी पड़ गई।
“तो क्या मैंने गलत कहा था? और फिर, हमने तेरी शादी तो बहुत अच्छे घर में की। अमीर, प्रतिष्ठित परिवार। तू वहाँ रानी की तरह रहती थी। फिर क्यों लौट आई?”
नेहा की आँखें भर आईं।
“क्योंकि वहाँ भी आपने झूठ बोला था दीदी। आपने कहा था कि मैं एम.ए. और बी.एड. हूँ, जबकि मैंने तो इंटर भी पूरी नहीं की थी। वो लोग मुझे अपने स्कूल की प्रिंसिपल बनाना चाहते थे। जब मैंने सच बताया, तो उन्होंने कहा कि हमने झूठ बोला। मेरे पति और ससुराल वालों को शर्मिंदा होना पड़ा। आपने अपने झूठ से मेरी इज़्ज़त मिट्टी में मिला दी।”
माँ सुनीता ने बात काटी —
“इतना बड़ा घर मिला था तुझे! तेरे भाग्य में तो था नहीं, हमने तुझे बना दिया रानी।”
“रानी?” नेहा की आवाज़ अब फट चुकी थी।
“माँ, रानी वो होती है जो सम्मान से जी सके। आपने मुझे उस घर में झूठ के सहारे भेजा, और आज मैं हर किसी की नज़रों में गिर गई। जब सच सामने आया, तो उन्होंने मुझसे कहा — ‘तुम्हारी बहन ने हमें धोखा दिया।’ और तब मुझे अपने ही घर से निकलना पड़ा। अपने झूठ से आपने मुझे आज तक का सबसे बड़ा ज़ख्म दिया है।”
किरण फिर तमतमाई —
“अब अपने गुनाहों की जिम्मेदारी हम पर मत डालो! अगर तू काबिल होती, तो संभाल लेती सब कुछ। तेरी कामचोरी और अकड़ ने तुझे वहाँ से निकाला है।”
“बस बहुत हुआ!”
ये आवाज़ आई नेहा के पिता मोहनलाल की, जो अब तक चुपचाप सब सुन रहे थे।
“किरण!” उन्होंने गुस्से में कहा, “अपनी ज़बान संभालो। जब तुम्हारी शादी हुई थी, तब भी तुमने अपनी ससुराल वालों से झूठ बोला था — वही झूठ आज नेहा भुगत रही है। तुम्हारे कहने पर ही हमने लोगों से कहा था कि नेहा एम.ए. पास है। क्या ज़रूरत थी झूठ बोलने की?”
किरण कुछ बोल न सकी।
मोहनलाल अब अपनी पत्नी की ओर मुड़े —
“और तुम, सुनीता! माँ होकर तूने भी ये झूठ छुपाया? सिर्फ इसलिए कि तेरे हिस्से का काम कोई और कर दे? तुम दोनों ने अपनी सुविधा के लिए मेरी बेटी की ज़िंदगी बरबाद कर दी। लेकिन अब और नहीं।”
नेहा की आँखों से आँसू टपक रहे थे।
मोहनलाल आगे बोले —
“नेहा की ससुराल वालों ने मुझसे साफ कहा है — अगर नेहा अपनी पढ़ाई पूरी कर ले, तो वे उसे स्वीकार करेंगे, उसे अपने स्कूल की जिम्मेदारी भी देंगे। और मैंने उन्हें वचन दिया है कि मेरी बेटी अब अपनी पढ़ाई पूरी करेगी। अब से इस घर में कोई भी नेहा से घर का काम नहीं कहेगा, जब तक उसकी परीक्षाएँ खत्म नहीं हो जातीं।”
किरण भौंचक खड़ी थी।
“पापा, लेकिन…”
“किरण, अगर एक शब्द और बोली तो मैं तुम्हारा मायके आना बंद कर दूँगा। तुम्हारा व्यवहार अब और बर्दाश्त नहीं कर सकता। और सुनीता, तुम भी याद रखो — नेहा अब अपनी जिंदगी खुद बनाएगी। उसे पढ़ने दो, उसे उड़ने दो।”
इतना कहकर मोहनलाल बाहर चले गए।
कमरे में अब सन्नाटा था।
सुनीता ने बुरा सा मुँह बनाया और चुपचाप रसोई में चली गई।
किरण बिना कुछ बोले अपने कमरे में जाकर दरवाजा बंद कर ली।
नेहा कुछ देर तक खड़ी रही, फिर धीरे-धीरे पापा के कमरे की ओर गई।
वो मेज पर बैठकर पुरानी फाइलें देख रहे थे।
“पापा…” नेहा की आवाज़ कांपी।
मोहनलाल ने सिर उठाया — “क्या हुआ, बेटा?”
नेहा ने उन्हें गले से लगा लिया।
“पापा, आपने जो कहा, उसके लिए धन्यवाद। आपने जो विश्वास मुझ पर किया है, मैं उसे टूटने नहीं दूँगी। मैं पढ़ाई पूरी करूँगी, और उस स्कूल की प्रिंसिपल बनकर दिखाऊँगी। अब मैं सिर्फ आपकी नहीं, अपने आत्म-सम्मान की भी लड़ाई लड़ूँगी।”
मोहनलाल की आँखों में गर्व चमक उठा।
“यही तो चाहता था मैं, मेरी बच्ची। जब बेटियाँ अपने पैरों पर खड़ी होती हैं, तब माता-पिता का सिर गर्व से ऊँचा हो जाता है।”
नेहा मुस्कुराई —
“थैंक यू, पापा… मेरा मतलब, धन्यवाद पिता जी।”
मोहनलाल हँस पड़े।
“अच्छा है, अब अपनी हिंदी भी मजबूत कर रही हो।”
उस रात नेहा फिर किताबों में खो गई।
लेकिन इस बार उसके पन्नों में सिर्फ अक्षर नहीं थे — उसके सपनों की शुरुआत थी।
बाहर आँगन में हवा धीरे-धीरे बह रही थी।
घर में पहली बार एक ऐसी शांति थी, जो किसी जीत की तरह महसूस हो रही थी।
दीवार पर लटके मोहनलाल के पुराने कैलेंडर पर लिखा था —
“सपनों को सच करने के लिए दूसरों की नहीं, खुद की हिम्मत चाहिए।”
“अब मेरी बारी है।”
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