ज़िंदगी फिर लौट आई

 “नीलम, ये दूध का बिल इतना ज़्यादा कैसे आ गया इस बार?”

सुबह-सुबह अखबार पढ़ते हुए अरविंद ने ऊँची आवाज़ में कहा।
नीलम, जो रसोई में पराठे बेल रही थी, बोली —
“अरे सुनो जी, पहले पैसे दे दो दूध वाले को, नहीं तो कल फिर नाराज़ होकर नहीं आएगा, फिर बताती हूँ।”

अरविंद ने बटुआ निकालते हुए कहा, “ठीक है, लो… लेकिन समझाओ तो सही, रोज़ का खर्चा अब सिर चढ़ने लगा है।”

दूधवाले को पैसे देकर नीलम धीरे से बोली —
“क्या बताऊँ, पिताजी को दांत में दर्द है, ठोस चीज़ नहीं खा सकते, तो उनके लिए रोज़ दो गिलास दूध और चाहिए। अब बताओ, मैं कैसे मना करूँ?”

अरविंद ने भौंहें सिकोड़ लीं —
“देखो नीलम, मैं ये सब समझता हूँ, लेकिन हर चीज़ की एक सीमा होती है। खर्चे तो दिन-ब-दिन बढ़ते जा रहे हैं। तुम मम्मी को समझाओ — जैसे पहले चलता था, वैसे ही चलने दो। दूध, फल, दवा — सब कुछ लिमिट में होना चाहिए।”

नीलम ने धीरे से कहा —
“आप खुद जाकर समझा दीजिए, मैं क्या कहूँ उनसे?”


कुछ देर बाद अरविंद अपने पिता के कमरे की ओर चला गया।
कमरा हमेशा की तरह साफ-सुथरा था। दीवार पर एक पुरानी घड़ी टिकी थी, जिसकी टिक-टिक पूरे कमरे में गूंज रही थी।
पापा खिड़की के पास बैठे अखबार पढ़ रहे थे, पास में उबलते दूध का प्याला रखा था।

“पापा, मैं कुछ कहना चाहता हूँ।”
“हाँ बेटा, कहो।”

“वो… ये दूध का खर्च बहुत बढ़ गया है, मम्मी ने बताया कि आप रोज़ दो गिलास दूध ले रहे हैं। दांत में दर्द है तो दवा भी लेनी चाहिए, पर दूध इतना ज़्यादा लेना सही नहीं है। घर का बजट पहले ही बिगड़ा हुआ है।”

पापा ने अखबार नीचे रखा, थोड़ी देर बेटे की ओर देखा और फिर बोले —
“ठीक है बेटा, अब से एक गिलास ही लूँगा।”

अरविंद ने राहत की सांस ली —
“बस, समझने के लिए शुक्रिया पापा।”
और वो कमरे से निकल गया।

पापा कुछ देर तक दरवाज़े की तरफ देखते रहे।
फिर उन्होंने खिड़की से बाहर झाँका — मोहल्ले के बच्चे स्कूल जा रहे थे, कोई साइकिल पर, कोई बस से। उनकी नज़र अनायास ही एक दूधवाले पर पड़ी जो साइकिल से दूध के कनस्तर लेकर जा रहा था।
और उसी पल, उनका मन चालीस साल पीछे चला गया।


वो ज़माना और था।
शंकरलाल नाम था उनका, पर सब प्यार से ‘शंकर जी’ कहते थे।
हर सुबह 4 बजे उठते, दो किलोमीटर दूर खेतों में जाते, अपनी गाय का दूध दुहते, और फिर बाल्टी लेकर घर लौटते।
पत्नी कमला तब रसोई में रोटियाँ सेंक रही होतीं, और उनका बेटा — छोटा सा अरविंद — स्कूल की यूनिफ़ॉर्म पहने नाश्ते का इंतज़ार कर रहा होता।

“पापा, आज दूध में मलाई ज़्यादा डालना, मुझे स्कूल में ताक़त चाहिए।”
शंकरलाल हँसते हुए कहते — “बिलकुल बेटा, तुम्हारे लिए तो पूरी मलाई भी दे दूँ।”

वो ज़माना कितना सादा था — दो वक्त की रोटी, थोड़ी सी दाल, और घर में मुस्कानें।
वो अपने बेटे की हर ज़रूरत पूरी करते। खुद पुराने कपड़े पहन लेते, लेकिन उसे नई किताबें दिलवाते।

कमला जब कभी कहती — “इतना भाग-दौड़ करते हो, थोड़ा आराम कर लिया करो।”
तो वो मुस्कुरा देते — “जब बेटा पढ़-लिखकर बड़ा आदमी बनेगा, तभी आराम मिलेगा।”

समय बीतता गया।
अरविंद बड़ा हुआ, शहर में पढ़ाई की, फिर नौकरी मिली और शादी हो गई।
शंकरलाल और कमला को लगा — अब तो बुढ़ापा भी सुख से कटेगा।

लेकिन नियति को कुछ और मंजूर था।
कमला को दिल का दौरा पड़ा और वो एक दिन चली गईं।
शंकरलाल का संसार जैसे आधा रह गया।

कुछ महीनों बाद बेटे ने कहा —
“पापा, अब आप अकेले गाँव में क्यों रहेंगे? मेरे साथ शहर चलिए। वहाँ आपके लिए सब आराम रहेगा।”

शंकरलाल को लगा, बेटा सच में उनका सहारा बन गया है।
वो सबकुछ छोड़ शहर आ गए।


शहर में शुरुआती दिन ठीक थे। पोती उनके पास आकर कहानियाँ सुनती, बहू सम्मान से बात करती।
लेकिन धीरे-धीरे हालात बदलने लगे।

अब बहू के चेहरे पर मुस्कुराहट कम और झुंझलाहट ज़्यादा थी।
हर चीज़ का हिसाब होने लगा — बिजली का बिल, गैस का खर्च, दवा का पैसा।
पिता का प्यार अब “बोझ” लगने लगा था।

शंकरलाल चुप रहते, कभी शिकायत नहीं करते।
हर रात पत्नी की तस्वीर से बातें करते —
“कमला, देखो न, अब हमारे बच्चे कितने बड़े हो गए हैं… पर दिल कितना छोटा हो गया है।”


अगले दिन जब दूधवाला आया, तो बहू ने कहा —
“भैया, आधा लीटर कम कर दो, अब से सिर्फ डेढ़ लीटर ही देना।”

शंकरलाल ने सुन लिया, मगर कुछ नहीं बोले।
बस मुस्कुराते हुए खिड़की के बाहर देखते रहे।

शाम को जब अरविंद ऑफिस से लौटा, तो पापा ने कहा —
“बेटा, मैंने सोचा है अब गाँव वापस चला जाऊँ।”

अरविंद चौक गया —
“गाँव? वो भी इस ठंड में? वहाँ कौन है आपका?”

“कोई नहीं बेटा, पर अपने लोग तो वही हैं न — वो घर, वो आँगन, वो नीम का पेड़, सब हैं वहाँ। अब शहर की हवा भारी लगती है। तुम सब यहीं रहो, मैं आराम से रह लूँगा।”

अरविंद ने कुछ कहना चाहा, पर शब्द नहीं निकले।
नीलम ने चुपचाप सिर झुका लिया।

अगले ही दिन शंकरलाल गाँव के लिए निकल गए।
साथ में बस एक छोटा ट्रंक, दो जोड़ी कपड़े, और कमला की तस्वीर।


गाँव पहुँचकर उन्हें लगा जैसे ज़िंदगी फिर लौट आई हो।
पुराने घर की दीवारें टूटी थीं, पर वहाँ अपनापन था।
पड़ोसी रोज़ हालचाल पूछने आते, कोई दूध दे जाता, कोई रोटी।

गाँव के बच्चे कहते —
“दादाजी, हमें वही पुरानी कहानी सुनाओ — जब आप शहर गए थे।”
और वो मुस्कुराते हुए कहते — “हाँ बेटा, वो कहानी ही तो अब ज़िंदगी बन गई।”

धीरे-धीरे उनका स्वास्थ्य गिरने लगा।
पर चेहरे पर वही संतोष था जो कभी कमला की आँखों में देखा था।

एक दिन गाँव के ही डाकिये ने अरविंद के घर पर एक पत्र पहुँचाया —
“प्रिय अरविंद,
मुझे अब यह समझ में आ गया है कि बुढ़ापा किसी के सहारे नहीं कटता, आत्म-सम्मान के सहारे कटता है।
तुम्हारे लिए मैंने जीवन भरा परिश्रम किया, बस यही सोचकर कि बुढ़ापे में तुम्हारा कंधा मेरा सहारा बनेगा।
पर बेटा, शायद हर रिश्ते का वज़न उम्र के साथ हल्का हो जाता है।
तुम सदा खुश रहो।
मैं अब अपने घर, अपनी मिट्टी में हूँ — जहाँ मैं खुद को बोझ नहीं, ज़िंदा महसूस करता हूँ।
तुम्हारा पिता,
शंकरलाल।”

पत्र पढ़कर अरविंद बहुत देर तक निःशब्द बैठा रहा।
आँखों से आँसू गिरते रहे, और यादें उमड़ आईं —
वो साइकिल पर दूध लाने वाला पिता, जो हर सर्दी में अपने बेटे के लिए काँपता था ताकि वो गर्म दूध पी सके।

अब वही पिता सर्दी में अकेला था, लेकिन आत्म-सम्मान से भरा हुआ।

अरविंद ने पहली बार महसूस किया कि इंसान की उम्र नहीं, उसका सम्मान बूढ़ा होता है।
और एक बार खोया हुआ सम्मान फिर कभी नहीं लौटता…

उस रात अरविंद ने पहली बार बहुत देर तक अपने पापा की तस्वीर के सामने सिर झुका कर कहा —
“पापा, माफ़ कर दीजिए… दूध की कीमत तो मैं चुका सकता हूँ, लेकिन आपकी ममता का हिसाब कभी नहीं।”


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