“इतना मोटा आलू डाल दिया सब्ज़ी में! घर में कौन खाएगा ये बेस्वाद खाना? तुम्हें तो बस काम की जल्दी रहती है।”
शकुंतला ने झल्लाते हुए अपने नौकरानी कमला पर चिल्लाया।
कमला चुपचाप सिर झुकाए खड़ी थी। उसकी आंखों में हल्की नमी थी, लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। हर दिन की तरह आज भी उसने वही सुना जो पिछले तीन सालों से सुनती आ रही थी — ताने, डांट, अपमान।
शकुंतला जी के घर में कमला सुबह-सुबह ही आ जाती — झाड़ू, बर्तन, कपड़े और फिर किचन का काम। दिन भर पसीने से लथपथ रहकर भी उसके चेहरे पर मुस्कान रहती। वजह सिर्फ एक — उसे अपनी बेटी रानी की पढ़ाई का खर्च उठाना था। उसका पति मजदूर था और शराब पीने की आदत ने उसकी कमाई को कभी स्थिर नहीं रहने दिया। ऐसे में घर का बोझ कमला के कंधों पर ही था।
रानी दस साल की थी — नाजुक सी, बड़ी-बड़ी आंखों वाली लड़की, जिसके चेहरे पर हमेशा मासूम हंसी खेलती रहती थी। स्कूल में वह हमेशा फर्स्ट आती। गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हुईं तो कमला ने उसे घर पर अकेला छोड़ने के बजाय अपने साथ लाना शुरू किया।
रानी दिनभर कोने में बैठी कॉपी-किताब लेकर पढ़ती रहती या कभी-कभी घर के आंगन में खेलती। लेकिन शकुंतला को ये भी पसंद नहीं था।
“कमला, ये तेरी लड़की हमेशा यहीं क्यों बैठी रहती है? घर कोई खेलने की जगह है क्या?”
“मालकिन, घर पर अकेली रह जाएगी तो डरती है, इसलिए साथ ले आती हूँ। कोई नुकसान नहीं करेगी,” कमला ने धीमे स्वर में कहा।
“देखो, मेरी चीज़ों से दूर रहे बस। बच्चे तो बच्चे, पता नहीं कब क्या उठा लें।”
कमला ने बस सिर हिला दिया।
एक दिन दोपहर में जब सब सो रहे थे, रानी किचन के पास से गुजरी तो मेज़ पर रखे प्लेट में एक रसगुल्ला दिखा। उसके मन में इच्छा हुई — “काश, एक मिल जाए।” लेकिन डर के मारे उसने बस प्लेट को देखा और आगे बढ़ गई।
उसी वक्त शकुंतला कमरे से निकली और देखा कि रानी प्लेट के पास खड़ी थी।
“अरे! हाथ मत लगाना! चोरी करेगी तू भी?” उसने तेज़ आवाज़ में कहा।
रानी डर से काँप गई, “नहीं अम्मा जी, मैंने तो कुछ नहीं किया।”
“झूठ बोलती है! अभी तेरी माँ से बात करती हूँ।”
कमला दौड़कर आई, “क्या हुआ मालकिन?”
“तेरी बेटी मिठाई चुराने आई थी! अब तो बच्चों में भी संस्कार नहीं रहे।”
कमला की आंखें भर आईं, “नहीं मालकिन, मेरी रानी ऐसा कभी नहीं करेगी।”
“बस, बहस मत कर! इसे कल से साथ मत लाना।”
रानी रोती रही, और कमला ने उसका हाथ पकड़कर घर से बाहर निकल गई।
अगले दिन कमला अकेले आई। आँखें सूजी हुईं थीं। उसने चुपचाप काम किया, कुछ नहीं बोली। लेकिन मन में एक आग थी — बेबसी और अपमान की।
कुछ दिनों बाद शकुंतला का बेटा, सौरभ, जो दिल्ली में पढ़ता था, गर्मी की छुट्टियों में घर लौटा। वह अपने साथ एक महँगा ब्लूटूथ स्पीकर और कुछ गिफ्ट्स लाया था।
घर में रौनक लौट आई थी।
एक दिन सौरभ अपने दोस्तों के साथ बाहर गया और जब लौटा तो बोला — “माँ, मेरा ब्लूटूथ स्पीकर नहीं मिल रहा। कहीं दिखा क्या?”
शकुंतला ने माथे पर हाथ रख लिया — “हे भगवान! कहीं कमला ने तो नहीं उठा लिया?”
“क्या माँ, हर चीज़ में शक क्यों करती हो?” सौरभ ने कहा, लेकिन शकुंतला तो पहले ही गुस्से में भर चुकी थी।
“कमला! इधर आ!”
कमला दौड़कर आई।
“कहाँ है मेरा बेटे का स्पीकर?”
“कौन स्पीकर मालकिन?”
“जिसे तूने चुराया है!”
कमला हतप्रभ रह गई, “मालकिन, मैंने कुछ नहीं लिया।”
“झूठ बोलती है! तेरी औकात नहीं कि ऐसा सामान खरीद सके। तेरी नीयत पहले से ही ठीक नहीं लगती थी।”
शकुंतला ने नौकर को बुलाया और बोला, “इसका सामान चेक करो!”
कमला का चेहरा शर्म और गुस्से से लाल हो गया। उसके झोले में सिर्फ एक फटा हुआ रुमाल, दो रोटियाँ और एक पुरानी पानी की बोतल निकली।
“देख लिया, मालकिन?” उसकी आँखों में आँसू थे।
“हट यहाँ से, अब तेरी सूरत नहीं देखनी,” शकुंतला ने चिल्लाकर कहा।
कमला बिना कुछ बोले चली गई।
शाम को सौरभ की दोस्त ने कॉल की, “अरे सौरभ, तेरा स्पीकर मेरे बैग में रह गया था, सॉरी!”
सौरभ ने फोन काटा तो शकुंतला का चेहरा उतर गया। उसे सब समझ आ गया था।
रात भर उसे नींद नहीं आई। सुबह जब कमला रोज़ की तरह नहीं आई तो उसे कुछ बेचैनी सी महसूस हुई। वह सोचने लगी — “शायद मैंने ज़्यादा कह दिया… लेकिन ग़लती से ही सही, मैंने एक निर्दोष औरत का दिल तोड़ा।”
तीन दिन बाद किसी ने बताया कि कमला अब पास की कॉलोनी में काम करने लगी है।
शकुंतला ने ठान लिया कि वह जाकर माफ़ी मांगेगी।
वह अगले ही दिन उस कॉलोनी पहुँची। वहां कमला एक बंगले के आंगन में झाड़ू लगा रही थी।
शकुंतला ने आवाज़ दी — “कमला…”
कमला ने पलटकर देखा, उसकी आँखों में हैरानी थी।
“मालकिन, आप यहाँ?”
शकुंतला ने संकोच भरे स्वर में कहा — “कमला, मुझसे ग़लती हो गई थी। सौरभ का स्पीकर मेरी गलतफ़हमी थी… मुझे माफ़ कर दो।”
कमला कुछ पल चुप रही। फिर बोली —
“मालकिन, माफ़ी तो मैं आपको दे दूँगी, पर जो दर्द आपने मुझे दिया, उसका निशान शायद कभी ना मिटे। आप लोग हमें हमेशा नीचा समझते हैं। हमारी गरीबी को हमारी ईमानदारी से बड़ा मान लेते हैं।”
शकुंतला की आँखों में पानी भर आया।
“सच कह रही हो, कमला। उस दिन मैंने तुम्हारे बेटे को भी बहुत बुरा कहा था। शायद अब समझ पाई हूँ कि इंसान की कीमत उसके कपड़ों से नहीं, उसके कर्मों से होती है।”
कमला ने धीरे से कहा —
“अब कोई बात नहीं, मालकिन। ज़िंदगी में हर गलती एक सबक होती है। आपने अपना सबक पा लिया, बस इतना ही बहुत है।”
शकुंतला ने उसके हाथ पकड़ लिए, “तुम वापस आ जाओ, कमला। तुम्हारे बिना घर सूना लगता है।”
कमला मुस्कुराई —
“अब मैं जिस घर में काम करती हूँ, वहाँ मुझे इज़्ज़त मिलती है, मालकिन। और शायद यही सबसे बड़ी दौलत होती है।”
शकुंतला ने सिर झुका लिया। लौटते वक्त उसके मन में अजीब-सी शांति थी — दर्द भरी लेकिन सच्ची।
घर पहुँचकर उसने अपनी बहू और बेटी को बुलाया और बोली —
“अगर कभी कोई ग़रीब तुम्हारे घर काम करने आए, तो उसे इंसान समझना, नौकर नहीं।”
उसकी आवाज़ में वह पछतावा था जो सिर्फ तब आता है जब इंसान सचमुच बदल जाता है।
उसी शाम उसने चाय बनाई, ट्रे उठाई और धीरे से कहा —
“काश, कमला आज होती तो मेरे हाथ की चाय पीकर मुस्कुराती।”
शकुंतला की आंखों से दो बूंद आँसू गिरे — शायद अब उनका दिल अमीरी से नहीं, इंसानियत से भर गया था।
0 टिप्पणियाँ