धोखेबाज

 "मैडम, कोई आपसे मिलना चाहता है..."

रिसेप्शनिस्ट की आवाज़ सुनकर आर्या ने अपना सिर उठाया।
"कौन?" उसने पूछा।
"खुद को आपके पुराने जानने वाले बता रहे हैं... नाम है—रवि।"

आर्या का हाथ एक पल को थम गया। वह नाम जैसे हवा में तैरता हुआ उसकी यादों में जा टकराया।
"रवि..." उसने धीमे से दोहराया, "कहिए, अंदर भेज दीजिए।"

रवि—वही, जो कभी उसके पति अनिरुद्ध का सबसे घनिष्ठ मित्र हुआ करता था। कॉलेज के दिनों से ही दोनों की गहरी दोस्ती थी। हर शाम का साथ, हर फैसला साझा। अनिरुद्ध ने जब शादी के बाद अपना खुद का इवेंट मैनेजमेंट बिज़नेस शुरू किया था, तो रवि उसका पहला पार्टनर था। आर्या तब तक अपने स्कूल में पढ़ाने लगी थी।
उन दिनों सबकुछ कितना सुंदर लगता था—एक प्यारा सा घर, छोटा सा ऑफिस, और ढेरों सपने।

लेकिन जैसे-जैसे काम बढ़ा, रवि और अनिरुद्ध के बीच की दूरियाँ भी बढ़ने लगीं। रवि को हमेशा लगता कि अनिरुद्ध उससे ज़्यादा लोकप्रिय हो रहा है, और क्लाइंट्स भी उसी पर भरोसा करते हैं।
वो जलन धीरे-धीरे जहर बन गई।

एक दिन, ऑफिस में अचानक आयकर विभाग की छापा मारी हुई। सारे कागज़ जब्त कर लिए गए। अनिरुद्ध पर टैक्स चोरी और फर्जी बिल बनाने का आरोप लगा। उसने सफाई देने की कोशिश की, लेकिन सबूतों के अभाव में मामला बिगड़ गया।
आर्या ने हर जगह पैरवी की, पर कोई नतीजा नहीं निकला।
कई महीने की बदनामी और कर्ज के बोझ ने आखिरकार अनिरुद्ध को तोड़ दिया।
वो रात जब उसने खुद को फांसी लगा ली, आर्या की ज़िंदगी वहीं ठहर गई।

सालों बाद पता चला कि वह पूरा खेल रवि ने रचा था। वही फर्जी दस्तावेज़ जमा करवाने वाला था, ताकि बिज़नेस पर कब्ज़ा मिल जाए।

आर्या ने उस दिन के बाद खुद को टूटने नहीं दिया।
एक छोटे से स्कूल में नौकरी फिर से शुरू की। हर महीने की सैलरी से अपने बेटे आरव की पढ़ाई का खर्च चलाती रही।
शुरुआत में उसने बहुत अपमान झेला — रिश्तेदारों के ताने, पड़ोसियों की दया, और समाज की ठंडी निगाहें। लेकिन धीरे-धीरे उसने अपने सपनों को फिर से सीना सीखा।
अनिरुद्ध का पुराना बिज़नेस भले बर्बाद हो गया था, लेकिन उसके पुराने क्लाइंट्स आर्या से संपर्क करने लगे।
"आप अनिरुद्ध सर की पत्नी हैं न? उनके काम में जो ईमानदारी थी, वही हम चाहते हैं।"

बस, वही उसकी नई शुरुआत थी।
स्कूल की नौकरी के साथ उसने घर से छोटे इवेंट्स की बुकिंग लेना शुरू किया। धीरे-धीरे काम बढ़ा।
दो कारीगर, फिर चार। घर के कमरे से निकलकर अब उसका अपना ऑफिस था—“Aarav Creations”।

आज वही आर्या शहर के सबसे प्रतिष्ठित आयोजनों की आयोजक थी।
अनिरुद्ध की तस्वीर ऑफिस की दीवार पर सजी थी—हर क्लाइंट के साथ मुस्कुराते हुए वह तस्वीर उसे हिम्मत देती थी।

और आज… वही रवि उसके ऑफिस के दरवाज़े पर था।

दरवाज़ा खुला, और अंदर एक अधेड़, थका हुआ आदमी दाखिल हुआ।
वो कभी का चमकदार रवि नहीं था—चेहरे पर शिकनें, बाल बिखरे, कपड़े सस्ते।
"आर्या..." उसने धीमे से कहा, "पहचाना?"

"कैसे भूल सकती हूँ?" उसने शांत स्वर में कहा।
"मैं... मैं बहुत गिर चुका हूँ आर्या... सब खो दिया... बिज़नेस, घर, इज्जत... कुछ भी नहीं बचा।"
वो कुर्सी के पास खड़ा था, सिर झुकाए हुए।
"अब कोई मुझ पर भरोसा नहीं करता। मैं सोच रहा था... अगर तुम्हारे साथ... यानि... अगर मैं तुम्हारी कंपनी में काम कर लूँ तो..."

आर्या ने उसे ध्यान से देखा।
वही आदमी जिसने उसकी ज़िंदगी बर्बाद की थी, आज उसके पैरों में खड़ा था।
"तुम्हें याद है, रवि?" उसने धीमे से पूछा, "जब अनिरुद्ध मुसीबत में था, तब तुम कहाँ थे?"
"मैं... मैं डर गया था आर्या..."
"डर गए थे?" आर्या की आवाज़ काँपी, पर भीतर आग थी।
"तुमने तो हमें डुबोया था रवि। हमारी मेहनत, हमारा विश्वास, सब बेच दिया था लालच के लिए।"

रवि की आँखें भर आईं।
"मुझे अपनी गलती का एहसास है, आर्या... मुझे एक मौका दे दो, सिर्फ एक..."

आर्या ने गहरी साँस ली, फिर खिड़की की तरफ चली गई।
बाहर उसकी टीम सजावट का काम कर रही थी। लड़कियाँ हँसते हुए रंगीन फूल बाँध रही थीं, और उसकी कंपनी का बोर्ड चमक रहा था—
“Aarav Creations – Where Trust Creates Magic.”

वो मुड़ी।
"रवि, इस कंपनी में काम सिर्फ हुनर से नहीं, ईमानदारी से मिलता है। और वो तुम्हारे पास कभी थी ही नहीं।"

"पर आर्या..."
"कृपया," उसने हाथ उठाया, "मेरे पति की मौत का तमाशा तुमने पहले ही बना दिया था। अब उनकी याद का अपमान मत करो।"

रवि के पास कोई जवाब नहीं था। वो कुछ कहे बिना धीरे-धीरे बाहर निकल गया।

आर्या कुर्सी पर बैठ गई। दिल में एक सन्नाटा उतर आया था, पर अजीब सी शांति भी थी।
उसने ऊपर देखा—दीवार पर अनिरुद्ध की मुस्कुराती तस्वीर।
"तुम्हें याद है न," उसने जैसे उससे कहा, "तुम हमेशा कहते थे—‘आर्या, लोग हमें गिरा सकते हैं, पर उठने से रोक नहीं सकते।’
देखो अनिरुद्ध, मैं उठ गई हूँ।"

उसकी आँखों में चमक लौट आई थी।

शाम ढल चुकी थी। ऑफिस की खिड़कियों से आती धूप की आखिरी किरण उसके चेहरे पर पड़ी।
आर्या ने अपनी डायरी खोली, और उसमें लिखा—
"कभी किसी को इतना महत्व मत दो कि वो तुम्हारी ज़िंदगी की दिशा तय कर सके। भरोसा रखो, दुनिया बदल सकती है… बस एक सच्ची नीयत चाहिए।"

वो मुस्कुराई।
बाहर बोर्ड की लाइटें जल चुकी थीं, और दीवार पर टंगी तस्वीर जैसे कह रही थी—
"आर्या... तुमने सही किया… आई एम प्राउड ऑफ यू।"


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