जब मीना जी के बेटे राहुल की शादी हुई तो पूरे मोहल्ले में चर्चे थे — “देखो, कैसी पढ़ी-लिखी बहू लाई है मीना! आज के ज़माने की लड़की है, बैंक में नौकरी करती है, बहुत स्मार्ट है।”
राहुल का स्वभाव शांत था, और मीना जी अपने बेटे पर जान छिड़कती थीं। पति के निधन के बाद उन्होंने अकेले ही राहुल को पाला, पढ़ाया और उसे इस काबिल बनाया कि अब उसका अपना परिवार था। उनके लिए यह शादी उनके जीवन की सबसे बड़ी खुशी थी।
नई बहू ने घर में कदम रखा — पूजा, स्वागत, मिठाइयाँ, हंसी-खुशी। कुछ दिनों तक सब कुछ बहुत अच्छा चला। लेकिन धीरे-धीरे मीना जी को एहसास हुआ कि चीज़ें बदलने लगी हैं।
स्निग्धा — राहुल की पत्नी — ऑफिस से लौटने के बाद सीधे अपने कमरे में चली जाती। न सास से ढंग से बात करती, न घर के किसी काम में हाथ बँटाती। मोबाइल में डूबी रहती या अपनी माँ से वीडियो कॉल पर बातें करती रहती।
शुरू-शुरू में मीना जी ने सोचा, “नई जगह है, नई ज़िंदगी है, थोड़ा वक्त लगेगा।”
लेकिन वक्त बीतता गया और दूरी बढ़ती गई।
मीना जी हर सुबह उसके लिए चाय बनातीं, लेकिन स्निग्धा बिना देखे बोल देती — “मम्मी जी, मैं डाइट पर हूँ, चीनी नहीं लेती।”
कभी नाश्ते में कुछ पसंद नहीं आता, तो कभी सब्ज़ी फीकी लगती।
राहुल बीच में समझाने की कोशिश करता — “माँ, स्निग्धा को थोड़ा टाइम दो, धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा।”
पर मीना जी सब सहकर भी मुस्कुराती रहीं।
उन्हें अपना घर टूटने से ज़्यादा डर अपने बेटे के मन के टूटने का था।
इधर स्निग्धा की माँ, रेखा जी, रोज़ फोन पर बहू को हिदायतें देतीं —
“देखो, बहुत ज़्यादा सास का कहना मत मानना। आजकल बहुएँ झुकती नहीं। ससुराल वाले तो बस दबाने की फिराक में रहते हैं।”
रेखा जी के ऐसे विचार स्निग्धा के मन में ज़हर की तरह उतरते जा रहे थे।
एक दिन मीना जी ने प्यार से कहा, “बेटा, आज तेरी पसंद का पास्ता बनाया है, चलो साथ में खाते हैं।”
स्निग्धा ने नज़र उठाए बिना कहा — “मम्मी जी, मैं ऑफिस के काम में व्यस्त हूँ, आप खा लीजिए।”
मीना जी ने हल्की मुस्कान से थाली वापस रख दी, लेकिन उनके भीतर कुछ चटक गया।
शाम को राहुल आया तो मीना जी के चेहरे पर थकान थी।
“माँ, क्या हुआ? तबीयत ठीक नहीं है?”
“नहीं बेटा, बस थोड़ा सिर दर्द है।”
राहुल ने माथे पर हाथ रखा — माँ का बुखार तेज़ था। डॉक्टर ने कहा कि उन्हें आराम की ज़रूरत है, और कुछ दिन घर का काम कम करना होगा।
राहुल ने स्निग्धा से कहा, “माँ बीमार हैं, कुछ दिन तुम ऑफिस से छुट्टी लेकर घर संभाल लो।”
स्निग्धा झुँझलाकर बोली — “क्या? मेरी प्रोजेक्ट रिपोर्ट सबमिट करनी है, मैं छुट्टी नहीं ले सकती। मेड है ना, वही सब देख लेगी।”
मीना जी कमरे में यह सब सुन रही थीं। उनकी आंखों में आंसू आ गए, लेकिन उन्होंने अपनी आवाज़ को दृढ़ किया।
“राहुल, तुम ऑफिस जाओ बेटा। मैं ठीक हूँ। बहू की नौकरी ज़रूरी है, मैं सब संभाल लूँगी।”
अगले ही दिन राहुल ऑफिस चला गया।
मीना जी अपने दर्द को छुपाकर रसोई में लगीं रहीं। पर थकान इतनी बढ़ी कि बेहोश होकर गिर पड़ीं। मेड ने भागकर स्निग्धा को आवाज़ दी।
स्निग्धा ने मीना जी को फ़र्श पर पड़ा देखा तो घबरा गई। वह दौड़कर उनके पास गई, पानी छींटे मारे और पड़ोसियों की मदद से उन्हें अस्पताल पहुंचाया।
डॉक्टर ने कहा — “शुगर बहुत बढ़ गई है, साथ ही कमजोरी भी है। अगर थोड़ी देर और हो जाती तो खतरा बढ़ जाता।”
राहुल को जब यह खबर मिली तो वह भागते हुए अस्पताल पहुंचा।
मीना जी होश में आईं तो उनके होंठों पर वही मुस्कान थी — “मैं ठीक हूँ बेटा, डर मत।”
राहुल ने स्निग्धा की ओर देखा — “तुमने माँ को संभाला, शुक्रिया।”
स्निग्धा चुप थी। उसके दिल में अपराधबोध की लहर उठी।
अगले कई दिनों तक मीना जी अस्पताल में रहीं। स्निग्धा रोज़ जाती, उनके लिए ताजे फूल ले जाती, और धीरे-धीरे उनकी सेवा करने लगी।
वो पहली बार सास की झुर्रियों के पीछे छिपे उस दर्द को महसूस कर रही थी जो एक माँ को अपने बेटे के लिए होता है।
एक रात मीना जी सो रही थीं, तो स्निग्धा ने धीरे से उनका हाथ थाम लिया।
“मम्मी जी… मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपको बहुत गलत समझा। मेरी मम्मी कहती थीं कि सास हमेशा बुरी होती है, लेकिन आप तो माँ से भी ज़्यादा प्यार करने वाली निकलीं।”
मीना जी ने आंखें खोलीं और मुस्कुराते हुए कहा —
“बेटा, हर रिश्ता समझ और विश्वास से बनता है। मैंने हमेशा तुम्हें बेटी समझा, बस कभी तुमने वो एहसास नहीं होने दिया। लेकिन अब जब तुमने दिल से बात की, तो मुझे लगा भगवान ने मेरी तपस्या सुन ली।”
स्निग्धा के आंसू थम नहीं रहे थे।
“अब मैं आपकी बेटी बनकर रहूंगी, मम्मी जी।”
अस्पताल से घर लौटने के बाद घर का माहौल बदल गया।
स्निग्धा सुबह मीना जी की चाय बनाती, उनके साथ बैठकर बातें करती। अब वह न तो फोन पर घंटों अपनी माँ से शिकायत करती, न सास से दूरी रखती।
राहुल की आंखों में भी सुकून था। उसने एक शाम कहा — “माँ, मुझे लगता है अब मेरा घर पूरा हो गया है।”
मीना जी मुस्कुराईं — “घर तो पहले भी पूरा था, बस दीवारों के बीच थोड़ी दूरियाँ थीं। अब दिल मिल गए हैं, तो घर फिर से घर लगने लगा है।”
उसी रात जब तीनों साथ बैठकर खाना खा रहे थे, तो मीना जी ने स्निग्धा की ओर देखा —
“बेटा, आज तूने जो दाल बनाई है ना, उसमें वही स्वाद है जो मेरी मां बनाती थीं।”
स्निग्धा मुस्कुराई — “क्योंकि आज मैंने उसमें थोड़ा सा प्यार भी मिलाया है, मम्मी जी।”
मीना जी ने स्नेह से उसका सिर सहलाया — “अब तू सिर्फ मेरी बहू नहीं, मेरी बेटी है।”
रात गहरी थी, पर घर के भीतर रोशनी थी — स्नेह, समझ और रिश्तों की गर्माहट की रोशनी।
जिस घर में पहले दीवारें चुप रहती थीं, अब वहाँ हंसी गूंज रही थी।
"सास बहू का रिश्ता अगर प्यार से निभाया जाए, तो वह भी माँ-बेटी के रिश्ते से कम नहीं होता।”
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