बीवी का गुलाम

 रात के नौ बज रहे थे। राजीव ऑफिस से लौटा ही था। पूरे दिन की थकान के बाद वो जैसे ही सोफे पर बैठा, माँ ने पास रखे पानी का गिलास उसकी तरफ बढ़ाया।

“ले बेटा, पहले पानी पी ले, फिर खाना खा लेना। तेरा चेहरा देखो, कितना थक गया है,” माँ बोलीं।

राजीव ने मुस्कुराते हुए कहा, “हाँ माँ, आज ऑफिस में बहुत काम था। थोड़ा बैठ जाता हूँ फिर खा लूँगा।”
माँ उसके पास बैठ गईं, “बेटा, तुझसे एक बात कहनी थी। सुबह से बाथरूम का नल टपक रहा है, दो दिन हो गए, बहू से कहा था लेकिन वो बोली कि 'प्लंबर को बुला लीजिए, मुझे टाइम नहीं है'। क्या बहुओं के ऐसे जवाब होते हैं?”

राजीव कुछ कहता, उससे पहले ही कमरे के अंदर से स्नेहा की आवाज़ आई —
“राजीव, प्लीज़ जल्दी अंदर आओ ना, मैं डिनर सर्व कर रही हूँ और ये देखो, तुम्हारा फोन बार-बार बज रहा है।”

राजीव उठा ही था कि माँ बोल पड़ीं, “बस, ये ही तो रह गया था। अभी आया और बहू ने काम पर लगा दिया। बेटा अब माँ का नहीं रहा, बस बीवी का गुलाम बन गया।”

राजीव चुप रहा। उसने कुछ नहीं कहा और भीतर चला गया। अंदर स्नेहा ने प्लेटें लगाईं हुई थीं।
“सुनो, मैंने सोचा था साथ में खाना खाएँगे, लेकिन तुम फिर वहीं अम्मा के पास बैठ गए। उनको हर बात में शिकायत करनी है,” स्नेहा ने झुँझलाते हुए कहा।
“स्नेहा, तुम भी समझो ना, माँ अकेली रहती हैं दिनभर। मैं तो बस पाँच मिनट ही बैठा था।”

“हाँ हाँ, तुम हमेशा उनकी ही तरफदारी करते हो। उन्होंने जो कहा वो सही, मैं तो हमेशा गलत। पता नहीं क्यों तुम्हारी माँ को मुझसे इतनी नफरत है,” स्नेहा ने तुनकते हुए कहा और थाली सरका दी।

राजीव चुपचाप खाना खाता रहा। उसके दिमाग में वही बात घूमती रही — “आखिर मैं करूँ तो क्या करूँ?”

हर दिन का यही हाल था। सुबह जब वह ऑफिस जाने की तैयारी करता, तो स्नेहा और माँ में किसी ना किसी बात को लेकर झगड़ा हो जाता। कभी टीवी की आवाज़ ज़्यादा, कभी चाय में चीनी कम, तो कभी रसोई का तवा कौन धोएगा — इन छोटी-छोटी बातों से घर का माहौल भारी हो जाता था।

राजीव का दिन ऑफिस में बीतता लेकिन मन घर की चिंता में डूबा रहता। जब वह घर लौटता, तो उसे उम्मीद होती कि दोनों ने अब तक सुलह कर ली होगी, पर हर बार वही ठंडा युद्ध चलता रहता।

एक दिन उसने तय किया कि अब कुछ करना ही होगा।
रविवार का दिन था। राजीव ने दोनों को हॉल में बुलाया।

“माँ, स्नेहा, आप दोनों बैठिए। आज हम तीनों खुलकर बात करेंगे।”

माँ बोलीं, “क्या बात करनी है बेटा? मैं तो वैसे भी कुछ नहीं बोलती अब।”
स्नेहा ने ताने से कहा, “हाँ, आप तो बस सहती हैं ना माँजी, बोलती तो मैं हूँ हमेशा।”

राजीव ने गहरी सांस ली और कहा, “बस, अब बहुत हो गया। आप दोनों मेरी ज़िंदगी के सबसे अहम हिस्से हैं। पर आप दोनों की इस तकरार में मैं खुद खो गया हूँ। मैं समझ नहीं पाता कि किसकी बात सही है, और किसकी गलत।”

माँ का चेहरा थोड़ा नरम पड़ा।
“बेटा, मैं बस इतना चाहती हूँ कि घर में थोड़ा सम्मान रहे। जब बहू बोलती है तो शब्दों में थोड़ा प्यार हो। मैं तो बूढ़ी हो रही हूँ, दिनभर अकेली रहती हूँ, बस किसी से दो बातें कर लूँ तो मन हल्का हो जाता है।”

स्नेहा ने तुरंत जवाब दिया, “और मैं क्या चाहती हूँ माँजी? सुबह से शाम तक ऑफिस, फिर घर, फिर किचन, सब मैं ही देखती हूँ। कभी-कभी अगर थकान में कुछ कह दूँ तो आप बात का बतंगड़ बना देती हैं। मुझे भी इंसान समझिए, रोबोट नहीं।”

राजीव धीरे से बोला, “तो गलती दोनों की है ना? एक सुनती नहीं, दूसरी बोलती ज़्यादा है।”
दोनों ने उसकी तरफ देखा — पहली बार राजीव के लहजे में दृढ़ता थी।

“माँ, आपने मुझे सिखाया था कि घर प्यार से चलता है, ज़िद से नहीं। और स्नेहा, तुमसे मैंने उम्मीद की थी कि तुम इस घर में सुकून लेकर आओगी, झगड़े नहीं।”

थोड़ी देर तक तीनों के बीच सन्नाटा रहा। फिर स्नेहा बोली, “आप ठीक कहते हैं, शायद मैं थोड़ा ज़्यादा रिएक्ट कर जाती हूँ।”
माँ ने भी कहा, “मुझसे भी कुछ गलती हुई होगी, मैं भी ज़रा जल्दी नाराज़ हो जाती हूँ।”

उस दिन पहली बार दोनों ने एक-दूसरे की आंखों में देखा और बिना कुछ बोले मुस्कुरा दीं।

समय बीतता गया। धीरे-धीरे घर का माहौल बदलने लगा। अब स्नेहा सुबह माँ की चाय पहले बनाती, माँ उसे ऑफिस के लिए टिफिन पैक कर देतीं।
राजीव के चेहरे पर अब सुकून लौट आया था।

लेकिन एक दिन ऑफिस में काम के दौरान राजीव को कॉल आया — “साहब, आपकी माँ गिर गई हैं।”

वो दौड़ा-दौड़ा घर पहुँचा। माँ के पैर में चोट थी। डॉक्टर ने कहा कि कुछ दिनों तक आराम करना होगा।
उस रात स्नेहा ने माँ के पैर पर दवा लगाई। माँ ने कहा, “बहू, छोड़ दो, मैं कर लूँगी।”
स्नेहा ने मुस्कुराकर कहा, “माँ, अब आप आराम कीजिए। अब मैं बेटी हूँ आपकी।”

माँ की आँखों में पानी आ गया। उन्होंने स्नेहा का हाथ पकड़ लिया, “तू सच में मेरी बेटी है।”

राजीव यह सब देखकर भावुक हो गया। उसने कहा, “अब मेरा घर सच में घर लगने लगा है।”

दिन बीतते गए, और रिश्ते अब मजबूती से बंध गए। जब कभी बाहर से कोई रिश्तेदार आता, तो आश्चर्य करता कि “इतना प्यार सास-बहू में कहाँ देखने को मिलता है!”

राजीव हँसकर कहता, “बस, थोड़ा सब्र, थोड़ा प्यार, और थोड़ा झुकना — यही है परिवार की नींव।”

रात को जब तीनों साथ बैठकर खाना खाते, तो स्नेहा कहती, “माँ, आज मैंने आपकी पसंद का लौकी का कोफ्ता बनाया है।”
माँ मुस्कुरातीं, “और मैंने तेरे लिए कल आपकी पसंद का पास्ता सीख लिया है।”

राजीव सोचता —
"शुरुआत झगड़े से हुई थी, लेकिन अंत प्यार से हुआ। शायद हर घर में शांति तब ही आती है, जब कोई एक झुकना सीख ले।"

अब घर में न बहस थी, न शिकायत।
बस तीन लोग थे — एक माँ, एक बहू, और उनके बीच सैंडविच बना वो बेटा — जो अब मुस्कुराना सीख चुका था।

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