आंखों का काजल

 सीढ़ियों से उतरती सुलेखा को देखकर सब अवाक रह गई।

सभी इधर उधर नज़रें चुराने लगी । मिलाए भी तो कैसे मिलाएं,कुछ ही देर पहले की ही तो बात है सुषमा से तैयारी कराते हुए उसके बारे में आना शनाप बक रही थी।

वो इसलिए कि उसने तैयारी में हाथ नहीं लगाया था।

अरे भाई लगाती भी कैसे आफिस से छुट्टी जो नहीं मिली।जिसका अर्थ का अनर्थ सांस से ज्यादा घर आए रिश्तेदार और पड़ोसिनो ने लगा लिया।

आखिर उनको इतनी सी बात समझ में क्यों नहीं आई कि हाथ न बंटाने का मतलब ये थोड़े कि वो परम्परा संस्कार और अपना दायित्व भूल गई।

भाई व्रत तो वो भी थी।

बस सांस और बहू के बीच समझौता ये हुआ कि तैयारी मैं कर दूंगी जैसे मार्केटिंग का काम और रख रखाव में ये हाथ बटा देखें।फिर मैं पूजा के वक्त आ जाऊंगी।

इससे आफिस का काम भी हो जाएगा और उपवास भी सफर जाएगा।

पर घर आए लोगों को तो नमक मिर्च लगाकर बोलने की आदत है भला इसके बिना खाना कहां पर है।

जिसे दबी जुबां से सिर्फ हुकाई भर रहे थे मां बेटे और कभी कभी अंखियों से देखकर एक दूसरे को मुस्कुरा रहे थे।

कि देखो अगर किसी के घर में शांति है तो कैसे अपने और पास पड़ोस के लोग अशांति मचाते हैं।

और जैसे ही चार बजा घाट जाने की तैयारी हुई।

तो पूरे पारम्परिक ड्रेस में ज़ेवर पहने ,पैर में महावर लगाए आई।

और बोली चलूं मां।तो राकेश ने कहां ठहरो ठहरो ओपन तो बना लो ।वो मां ने तुम्हारे लिए छोड़ दिया है।

फिर वो रसोई में गई।

और सिल बट्टे पर बांह भर खनकते हाथों से ओपन पीस लाई।  तो सासू मां ने बलैया लेते हुए आंखों से कांजली निकाल सुलेखा के कान के पीछे लगा दिया और बोली चलो बहू। फिर क्या था गाजे बाजे के साथ छठ मां की पूजा करने चली गई।

जिसे देख लोगों को एक सीख जरूर मिली ।

कि कभी किसी के घर के बीच में नहीं बोलना चाहिए।

जाने क्या दोनों कै बीच अंडरस्टैंडिंग है।

ऐसे में बोलने वाला बुरा बनता है और वो लोग एक हो जाते हैं।

- कंचन आरजू


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