हैलो..... मम्मी ....मैं मायके आ रही हूं कल सुबह .....रीमा को जैसे उसके पति रमेश ने बताया कि वो दस दिनों के लिए आँफिस टूर पर दूसरे शहर जा रहा है उसने तुरंत मां को फोन करते हुए बता दिया.....
दूसरी ओर मां ने उसकी बातचीत सुनने के बाद फोन रखा और तुरंत अपने बेटे मोहन और बहु सुधा को बुलाया .... मोहन तुम कल सुबह सुबह ही सुधा को उसके मायके छोड आओ ....क्या ....मगर क्यों माँ .....मोहन कुछ नाराजगी जताते हुए बोला
देख मोहन अभी रीमा का फोन आया था दस दिनों के लिए दामाद जी दूसरे शहर टूर को जा रहे है तो वो अपना बोरिया बिस्तर बांधे यहां आ रही है ....
तो आने दीजिए ना मम्मी जी ....रीमा दीदी इस घर की बेटी हैं .....
बेटी तो तू भी है हमारे घर की सुधा .....बेटा ये तुम्हारा स्नेह बोल रहा है मगर तुम नही समझती वो यहां आकर महारानी बनकर केवल हुक्म चलाना शुरू कर देती है ....भाभी अदरक वाली चाय ....सुधा भाभी कटहल की सब्जी पूरी .....सोनू के लिए दूध गर्म कर दो ....कभी ये कभी वो ....बैठे बैठे सब चाहिए उसे.....
तो क्या हुआ मम्मी जी .....मुझे कोई बुरा नहीं लगता बल्कि वो तो मुझसे भी छोटी है जब ये उसे बेटियों जैसा स्नेह करते हैं तो वो मेरी भी तो बेटी हुई ना ....और बेटियां मायके में ही आराम करेगी .....
और नही तो क्या ....और मां रीमा के यहां आने से सुधा के मायके जाने का क्या मतलब ....अरे ननद है तो भाभी को सेवा करने दो मोहन बोला
नही मोहन ....ये गलत है एक बेटी सारा काम करें और दूसरी सारा दिन या तो टीवी या मोबाइल में घुसी रहे ......ये अच्छी बात नही है बेटा....
पर मां .....मोहन सुधा एकसाथ बोले ही थे
की....
अच्छा ....तो तुम दोनो अब मुझसे बड़े हो गए हो ...
तो ठीक है जैसे तुम्हें अच्छा लगे....मेरी क्या जरूरत है तुम्हें फिर ....छोड़ आओ कही हरिद्वार आश्रम वगैरह मे....
मम्मी ....आप इस घर की बड़ी है हमारी मार्गदर्शक ....ऐसे नाराज मत होइए ना ....
मां...तुम भी ...
हम कैसे बड़े हो सकते है आपसे ....टहनियां कभी पेड़ से अधिक मजबूत या बडी हो सकती है ....कभी नहीं ....मां प्लीज नाराज मत हो ...और ये छोड़कर जानेवाली बात फिर कभी मत कहना .....
अरे मैं कहा जाऊंगी तुम्हें छोड़कर मेरे बच्चों ....अभी तो मुझे तुम्हारे बच्चों के बच्चे भी खिलाने है .....
मां.....सुधा मोहन से शर्मा कर लिपट गई.....
हूं.... हू.....मे बैठी हुई हूं यहां.....
दोनो जल्दी से एकदूसरे से अलग हो गए....
अच्छा तो फिर मेरी बात मानकर सवेरे सवेरे सुधा को मायके छोड़ आना ....
पर....मोहन कुछ बोलता इससे पहले मां बोली... मोहन मां बाप का फर्ज होता है अपने बच्चों को गलतियां करने से रोकने का उन्हें वक्त वक्त पर समझाने का और जरूरत पड़ने पर कुछ दंड देकर एक सुधारने की पहल करने का … तू भी तो रीमा को बहन कम बेटी अधिक मानता है ना तो समझ बेटा ये सीख उसके लिए बेहद जरूरी है वरना वो ऐसे ही हर महीने दर महीने यहां आकर सुधा पर हुक्म चलाती रहेगी.... बेटा ये सीख उसके भले के लिए ही है ....अब जो कहा वो मानो और तैयारियां करो जाने की ....हां काम पूरा होते ही मैं अपनी इस बेटी को बुला लूंगी .....
जी मां ....जैसा आप कहे ....कहकर दोनो अगले दिन जाने की तैयारियों में जुट गए...
अगले दिन.... टैक्सी घर के बाहर आकर रुकी ....भाभी ....सुधा भाभी ....बहुत थक गई ...एक अदरक वाली चाय बना देना अच्छा दूध डालकर....
तू ही बना ले रीमा ....सुधा तो मायके गई हुई है....क्या ..... कब ...और क्यूँ ....तुमने उन्हें जाने क्यूँ दिया ...बताया तो था मैं आ रही हूं तो फिर.....
अरे उसका कोई खास रिश्तेदार बहुत बीमार है इसलिए... उन्होंने बहाना बनाया और चली गई ....कामचोर भाभी .....रीमा मुंह बनाते हुए बोली
अच्छा अच्छा ....अब ये मुंह बाद मे बनाइयो पहले चाय बना ले .....मां हंसते हुए बोली
अभी तो आई हूं ....बना लूंगी ....आधे घंटे बाद.....
चाय बनाई जैसे तैसे ब्रैड वगैरह खाकर काम चलाया वरना भाभी आलू के पंराठे ....गोभी के ...आज पोहा बनाओ तो आज छोले भटूरे....
दोपहर को ....मां ....आलू की सब्जी बना लो वहीं है घर मे ....
अरे मेरी कमर ....उई मां..... रीमा बेटा तुम्हें ही बनाना पडेगा ये कमर दर्द .....पता नहीं कैसे .....
उफ्फ..... कहकर गुस्से में किचन में चली गई ....दोपहर को जैसे तैसे खाना खाया .....शाम को मोहन आ गया आँफिस से .....
मोहन भैया ....ये भाभी को वापस बुलाओ .....देखो कामचोर कहीं की भाग गई मेरा आने का सुनकर...
रीमा.... सुधा तुमसे उम्र मे बडी है ....तमीज से बेटा ....और वो कहीं भागी नही है ...हां ये सच कहा वो कामचोर है कामचोर ....चल आज तू ही बना ले कटहल की सब्जी और पूरियां....देख लेकर आया हूं
क्या ....ना बाबा ना ....मेरे बस का नही है ....आज तो बाहर से मंगवा लो ....मेरी तो कमर टूट गई अकेले काम करते करते......
अच्छा ....चल ठीक है ....कल पक्का बना लियो ओके....मैं बाहर से मंगवा लेता हूं फिलहाल....
ऐसे ही अगले दिन सुबह नाश्ता बनाते दोपहर को कटहल की सब्जी पूरियां बनाते रीमा परेशान हो गई .....आखिर शाम को बोली.... मां ..मैं सुबह वापस जा रही हूं....
क्यों ....रमेश बाबू तो दस दिनों के लिए टूर पर ....
नही.... वो वापस आ रहे है फोन आया था अभी थोड़ी देर पहले ...टूर केंसिल हो गया तो मैं भी कल वापस चली जाऊंगी ....
फिर आऊंगी ना जब सुधा भाभी आ जाएगी मायके से ...कामचोरी करके भागी है ना अगली बार बताऊंगी उन्हें देखना तुम....
अरे तू क्या बताऐगी ...मैं बताऊंगी उसे ....देख तेरे बिना कितना बढिया खाना बनाया मेरी रीमा ने नाश्ता अदरक वाली चाय और कटहल की मजेदार सब्जी .....अबकी बार आने दे उसे ....इसबार तेरे ही घर लेकर आऊंगी और तू उसे बना बनाकर खिलाइयो और दिखाइयो कैसे बनाते है सब्जी रोटी अदरक वाली चाय ....हम दोनो सास बहु की सेवा करके दस पंद्रह दिनों तक उसे समझाइयो......
बडी अकडकर काम करती थी ना ....अरे मेरी बेटी अकेले सब काम .....यू....यू ...चुटकी बजाते हुए कर लेती है....
क्या .... आप भाभी दस पंद्रह दिन.... ना मम्मी ना ....
मेरा घर छोटा सा है वहां सब ....और मोहन भैया ....वो यहां अकेले ....नही ....नही ....आप को आना हो तो मिलने के लिए आना वहां रहने की कहाँ व्यवस्था है भला...
पर रमेशबाबू तो हमेशा कहते रहते है जगह घरों में नही दिलों में होनी चाहिए ......
मां ....वो कल सुबह जल्दी निकलना है तो मुझे सामान की पैकिंग करना है .....कहते हुए रीमा अंदर चली गई....
वहीं मोहन और मां बेटी को सही सीख देकर मुस्कुरा रहे थे …
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