घर को घर ही रहने दो !

 शर्मिला अपनी अलमारी की सफाई कर रही थी अचानक एक एलबम आकर गिरी। एल्बम में बच्चों की तस्वीरें थी बच्चे तो अब बड़े होकर दूर हो गए थे घर में रह गए शर्मिला जी और उनके पति।एल्बम को खोलते ही शर्मिला पुरानी यादों में खो गई।

"ये क्या है टिया अपना कमरा कैसे फैला के रखती हो तुम!" शर्मिला एक दिन अपनी बारह साल की बेटी से बोली।

" अरे मम्मा चिल मैं खुद ही कर दूंगी थोड़ी देर में!" टिया बोली।

"नहीं पहले सही करो इसे!" शर्मिला सख्ती से बोल चली गई।

" तुषार ये क्या तुमने तौलिया बेड पर डाल रखा है और कमरा भी कितना बिखरा है!" शर्मिला अपने पंद्रह वर्ष के बेटे के कमरे में आ बोली।

" बस मम्मा दो मिनट रुको!" तुषार लैपटॉप में लगे हुए बोला।

" कोई दो मिनट नहीं जल्दी से पहले कमरा सही करो!" शर्मिला गुस्से में बोली और बड़बड़ाते हुए बाहर निकल आईं।

" सारा घर फैला कर रखते हैं इतने बड़े हो गए जाने कब समझ आएगी। कोई सहूर नहीं है इन्हे समझाते समझाते थक गई मैं!"

" क्या हुआ अब आज किस बात पर मूड खराब है सुबह सुबह!" उन्हें बड़बड़ाते देख उनके पति शांतनु बोले।

" होगा क्या वही कमरे फैले हैं दोनों के कितनी बार कहा है घर को घर की तरह रखो पर नहीं!" शर्मिला गुस्से में बोली।

"ये चीज तुम समझ जाओ तो बेहतर है घर को घर रहने दो होटल मत बनाओ जो हमेशा सजा संवरा रहे बच्चों को जीने दो खुल के कल को जब बड़े हो जाएंगे तब इन्हीं दिनों को याद करोगी!" शांतनु जी बोले।

शर्मिला जी को सफाई का कीड़ा था उन्होंने बच्चों को शुरू से ही टोका टाकी में रखा। खिलौने नहीं फैलाने, सामान जगह पर रखना है और भी ना जाने क्या क्या। उन्हें घर हर वक़्त चमकता हुआ चाहिए होता था। शांतनु जी कितना समझाते पर उन पर कोई असर नहीं होता था। धीरे धीरे बच्चे बड़े हुए बेटी की शादी हो गई वो आस्ट्रेलिया बस गई और बेटा भी अपने परिवार के साथ रूस में था क्योंकि उसकी जॉब ही वहीं थी।

"अरे ये क्या फैला कर बैठी हो!" अचानक शांतनु जी की आवाज़ सुन शर्मिला जी अतीत से वर्तमान में आईं।

" कितना सही बोलते थे आप शांतनु घर को घर रहने दो घर के लोगों को खुल कर जीने दो पर मैं कहां समझी ये सब , अब देखो यहां हम अकेले हैं और बच्चों के बचपन की यादों के नाम  पर है बस मेरा उनको टोकना और उनका झुंझलाना।" शर्मिला जी आंख में आंसू ला बोली।

" हम्म अब दुखी होने से कोई फायदा नहीं शर्मिला जो पल बीत गए वो वापिस नहीं आएंगे!" शांतनु जी बोले।

" सही कहा वो पल वापिस नहीं आएंगे आते तो मैं अपने बच्चों के साथ उन्हें भरपूर जीती जिससे जब वो दूर होते तो मेरे घर के कोने कोने में उनकी शरारतें ,खिलखिलाहट की सुनहरी यादें बिखरी होती। घर का कोना कोना उन यादों के कारण सजीव होता ना की मेरे गुस्से और चिल्लाने की आवाज़ों के शोर से भरा होता!" शर्मिला जी बोली।

"देखो तुम बच्चों को याद कर रही थी और तुषार का फोन आ गया!" अचानक फोन की बेल बजने पर शांतनु जी बोले।

" हां बेटा कैसा है कब आएगा भारत जल्दी आजा तेरे बच्चों की शरारतों बिना ये घर सूना है मैं उनके बिखरे खिलौने संवारना चाहती हूं। उनके बारिश में भीगे पैरों की छाप देख खुश होना चाहती हूं।" शर्मिला जी दुखी स्वर में बोली।

"अरे मम्मा दादी बनते ही इतना बदल गए आप तो ..वैसे मैने यही बताने को फोन किया है अगले महीने आ रहे हैं हम एक महीने को टिया से भी बात हो गई है वो भी आ जाएगी। अब आप और पापा तो यहां आना नहीं चाहते!" तुषार खुश होते हुए बोला।

" सच बेटा तू आ रहा है मैं अभी से तैयारी शुरू करती हूं!" शर्मिला जी खुश हो बोली।

फोन रखते ही वो खुशी खुशी तैयारी में जुट गई। जो समय वो अपने बच्चों से छीन बैठी थी उसे अपने बच्चों के बच्चों साथ जीने के लिए।

दोस्तों घर साफ रखना गलत नहीं पर सफाई के चक्कर में बच्चों से उनका खेलने का हक छीनना उन्हें बेफिक्री से जीने देने का हक छीनना गलत है। घर का क्या साफ हो जाएगा पर जो सुनहरा वक़्त बीत गया वो लौट कर नहीं आएगा। बच्चों के बड़े होने पर वो सुनहरी यादें ही घर को खुशहाल रखती हैं।

- संगीता अग्रवाल


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