आज सुबह से ही कादम्बिनी जी के घर में खूब चहल पहल थी। हर साल की तरह, इस साल भी नवरात्रि के दिनों में ,घर पर देवी पाठ रखा गया था। कादम्बिनी जी देवी की परम भक्त थीं। उनका मानना था कि उनकी ये शानो शौकत और खुशहाल जिंदगी सब माता रानी की ही देन हैं। पति एक जाने माने उद्योगपति हैं और दो जुड़वा बेटे हैं ,जो विदेश में रह कर शिक्षा ग्रहण कर रहे हैं। अत्यंत खुशहाल व समृद्ध परिवार है कादिम्बिनी जी का।
शरद नवरात्रि , श्रद्धा के साथ साथ लेकर आती है उमंग और उल्लास। एक तो सुहावना मौसम और आने वाले त्योहारों के उत्साह से ही मन बड़ा प्रफुल्लित सा रहता है ।
लाल सिल्क की साड़ी , लाल चूड़ियां, बालों में गजरा, डायमंड नेकलेस, और नवरात्रि लुक को कंप्लीट करती बड़ी सी लाल बिंदी लगाए, अपने परफेक्ट नवरात्रि लुक को शीशे में सराहते हुए कादम्बिनी जी बाहर हॉल में आ गईं, जहां बड़ी सी देवी प्रतिमा को स्थापित किया गया था। आलीशान से बंगले के , फूलों से सजे ,बड़े से हॉल में देवी की सुंदर सौम्य प्रतिमा विराज रही थी। प्रतिमा के समीप ही पूजा सामग्री रखी थी। सामग्री के समीप ही बैठी थी झुमरी , पांच साल की नन्ही सी बच्ची, जो आज बड़े से बंगले की चकाचौंध को देख कर चकित थी। देवी की सुन्दर प्रतिमा तो मानो उसे मोहित कर रही थी। वो एक टक देवी की प्रतिमा को निहार रही थी। तभी किचन से आती हुई पकवानों की खुशबू ने उसका ध्यान खींचा। वो भाग कर किचन की ओर गई किन्तु किचन की देहली पर आकर ठिठक गई। उसने बाहर से ही किचन में झांका और देखा कि उसकी मां संतो मिठाइयां बनाने में व्यस्त है।
अभी कुछ ही दिन हुए थे संतो को कादिम्बिनि जी के घर पर, खाना बनाने का काम करते हुए। पति की असमय मृत्यु के बाद संतो ऐसे ही कुछ घरों में खाना बनाने का काम करके अपने परिवार का भरण पोषण करती थी। यूं तो संतो कभी भी अपनी बेटी झुमरी को अपने साथ काम पर नहीं लाती थी किंतु आज झुमरी ने रो रो कर आसमान सिर पर उठा लिया था। उसे तो हर हाल में आज अपनी मां के साथ बड़े बंगले में जाना था, वो भी अपना लाल लहंगा पहन कर जो उसकी मां ने बड़े प्यार से उसके लिए सिला था। बेटी की ज़िद के आगे मां की एक ना चली और वो झुमरी को अपने साथ कादिम्बिनी जी के घर ले आई।
कादिम्बिनी जी को ,झुमरी का यूं घर पर आना बिलकुल पसन्द नहीं आया। उन्होंने संतो को साफ़ साफ़ कह दिया कि झुमरी घर में कोई छेड़खानी न करे , चुप चाप एक कोने में बैठी रहे। संतो ने भी झुमरी को हॉल के एक कोने में बिठा दिया और उसे जगह से न हिलने की हिदायत देकर खुद किचन में पकवान बनाने चली गई।
"क्या बना रही हो मां ,बड़ी मीठी मीठी खुशबू आ रही है।" किचन के बाहर खड़ी झुमरी ने संतो से पूछा।
झुमरी की आवाज़ सुन संतो हड़बड़ा गई। और खीजते हुए बोली,
" अरे झुमरी !,तुझे मना किया था ना जगह से हिलने को, यहां क्यूं आ गई? मालकिन ने देख लिया ना तो खूब डांट पड़ेगी। चल भाग यहां से, चुप चाप वहीं, कोने में जा कर बैठ जा। और अब वहां से हिली ना तो चार चपत मैं भी लगा दूंगी तुझे समझी, चल भागे यहां से !"
मां की डांट सुन कर झुमरी का चेहरा उतर गया।
वो वापस हॉल में आकर चुप चाप देवी की प्रतिमा के सामने बैठ गई। तभी उसकी नज़र पूजा सामग्री में रखी लाल चुनरी पर पड़ी। सुन्दर मोतियों, जड़ाऊ सितारों, ज़रीदार बॉर्डर से सजी चटक लाल चुनरी। इतनी सुन्दर चुनरी झुमरी ने पहले कभी नहीं देखी थी। दरअसल हर साल की ही तरह इस साल भी, कादिम्बिन जी ने स्पेशल ऑर्डर देकर ये चुनरी बनवाई थी जो आज माता की प्रतिमा पर ,पूजा के समय चढ़ाई जानी थी।
यूं तो झुमरी को किसी भी चीज़ को ना छूने की हिदायत दी गई थी परन्तु बच्चों का भोला मन ललचा ही जाता है , ख़ास कर उन चीज़ों को देख कर ,जिनका अभाव हो उनके जीवन में। इतनी सुन्दर चुनरी देख कर झुमरी रह नहीं पाई
उसने झट से चुनरी को उठाया और जैसे ही ओढ़ने लगी, किसी ने उसका हाथ खींचा। झुमरी घबरा गई उसने देखा कादिम्बिनी जी ने उसका हाथ ज़ोर से पकड़ा हुआ है और गुस्से से उनका चेहरा तमतमा रहा है। इससे पहले झुमरी कुछ समझ पाती , कादिम्बिनी जी ने झुमरी के गाल पर एक ज़ोरदार चांटा जड़ दिया। अचानक हुए इस अघात से झुमरी सन् रह गई, उसकी नन्ही नन्ही आंखों से अश्रु धारा फूट पड़ी । वो ज़ोर ज़ोर से रोने लगी और मां मां पुकारने लगी। बेटी का क्रंदन सुन संतो भी किचन से निकल कर बाहर हॉल में आ गई।
" क्या हुआ मेम साहब?"
घबराते हुए संतो ने पूछा।
" क्या हुआ? तेरी ये छोकरी आज पूजा में माता को चढ़ाई जाने वाली चुनरी ओढ़ने जा रही थी। वो तो अच्छा हुआ मैंने देख लिया वरना क्या ओढ़ी हुई चुनरी चढ़ाती मैं देवी प्रतिमा पर? पता है स्पेशल ऑर्डर देकर बनवाई है मैंने ये चुनरी।"
कादिम्बिनि जी संतो पर भी बरस पड़ी।
" माफ कर दीजिए मेम साहब, बच्ची है गलती हो गई। बस आज थोड़ी देर इसे यहां रहने दीजिए , मैं वादा करती हूं फिर कभी नहीं लाऊंगी इसे यहां।" संतो हाथ जोड़ते हुए बोली।
"सुन संतो , समझा दे इसे ,अब इसने कोई छेड़खानी की ना तो और भी ज्यादा पिट जाएगी ये मुझसे। बताए दे रहीं हूं मैं। " कादिम्बिनी जी कहते हुए हॉल से बाहर चली गईं।
कादम्बिनी के जाते ही झुमरी अपनी मां से लिपट कर और भी ज़ोर से रोने लगी। अपनी बेटी को यूं रोता देख संतो का मन भी रो रहा था। उसे कादिम्बिनी जी का उसकी बेटी पर यूं हाथ उठाना बिलकुल अच्छा नहीं लगा किंतु गरीबी अकसर विद्रोह नहीं करने देती।
" अब क्या रोती है री? कहा था ना तुझे कुछ छेड़खानी मत करना। देख मुझे भी डांट खिला दी ना तूने। रुक! घर चल कर अच्छे से खबर लूंगी मैं आज तेरी।"
संतो ने भी झुमरी को झटक दिया और वापस किचन में आकर काम में लग गई। बाकी सभी लोग भी अपने अपने काम में व्यस्त हो गए।
इस घटना से झुमरी के कोमल मन को बहुत ठेस पहुंची थी। वो छिप जाना चाहती थी सबसे या यूं कहलो , थप्पड़ से लाल हुआ अपना चेहरा सबसे छुपाना चाहती थी। झुमरी भाग कर देवी प्रतिमा के पीछे छुप गई। करीब पांच फ़ीट ऊंची प्रतिमा और दीवार के बीच की ज़रा सी जगह में झुमरी सिकुड़ कर बैठ गई। रोते रोते ना जाने कब उसकी आंख लग गई।
थोड़ी ही देर में सभी घर वाले और आमंत्रित अतिथि गण हॉल में पूजा के लिए एकत्रित हो गए। पंडित जी ने मंत्रोच्चारण के साथ माता का श्रृंगार किया और देवी प्रतिमा पर लाल चुनरी चढ़ाई । देवी की भव्य आरती हुई। आरती की आवाज़ से नन्ही झुमरी की नींद खुल गई।वो घबरा कर देवी प्रतिमा के पीछे ,चुप चाप खड़ी हो गई। आरती पूर्ण होते होते देवी प्रतिमा पर चढ़ाई हुई चुनरी ना जाने कैसे सरक कर, प्रतिमा के पीछे छुप कर खड़ी झुमरी पर आ गिरी। ऐसा प्रतीत हुआ जैसे स्वयं देवी मां ने उसे वो चुनरी भेंट की हो। चुनरी मिलते ही झुमरी अपना सारा डर भूल कर चुनरी ओढ़े प्रतिमा के पीछे से निकलकर सबके सामने आ गई। उसका चेहरा खुशी से दमक रहा था। उसका भोला मन थोड़ी देर पहले मिले अघात को मानो बिलकुल भूल सा गया था। अब उसे किसी का कोई भय नहीं था। वो खूब चहकने लगी। झुमरी का अचानक प्रतिमा के पीछे से निकल कर आना ,वहां उपस्थित लोगों को ऐसा प्रतीत हुआ मानो प्रतिमा से निकलकर साक्षात देवी मां नन्हे रूप में प्रकट हुईं हो। झुमरी चुनरी पा कर खिलखिला कर हंस रही थी। आवाज़ सुन संतो रसोई घर से दौड़ते हुए हॉल में आ गई। उसने देखा ,लाल लहंगे में लाल चुनरी ओढ़े उसकी झुमरी, चहक रही थी । सभी लोग हाथ जोड़े, साक्षात् देवी सी प्रतीत होती झुमरी को नमन कर रहे थे और उन सभी जुड़े हुए हाथों में दो श्रद्धा से जुड़े हुए हाथ ,कादिम्बिनी जी के भी थे । जो हाथ थोड़ी देर पहले झुमरी पर उठे थे वही हाथ अब उसके दिव्य रूप को नमन कर रहे थे।
भगवान तो इंसानों में भी बसते है। हैं ना?
-ऋचा उनियाल
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