इसमें कोई शक नहीं कि बेटी का रिश्ता तय करते वक्त मायके वाले इस बात पर ज़्यादा गौर करते हैं कि कहीं लड़के की बड़ी बहन अविवाहित तो नहीं। वजह भी साफ़ है—घर में चलती उसी की होती है। इसलिए उसे “डेढ़ सास” की उपाधि दे दी जाती है। वह छोटा भाई को बेटा भी मानती है और दोस्त भी। ऐसे में बेटी शादी के बाद तालमेल बिठा पाएगी या नहीं, इसका हर माँ-बाप को शक रहता है।
भोपाल के 32 वर्षीय बैंक अधिकारी विवेक की बड़ी बहन प्रेरणा की शादी कुछ वजहों से नहीं हो पाई थी। माँ की इच्छा और मर्जी के चलते तीनों ने तय किया कि पहले विवेक की शादी कर दी जाए। पिता नहीं थे, इसलिए विवेक की तरफ़ से सारे फैसले प्रेरणा ने ही लिए।
सूची (विवेक की पत्नी) के मायके वालों को भी थोड़ा खटका था, लेकिन शादी हो गई। शुरू में प्रेरणा का रवैया गंभीर और परिपक्व लगा। उसने पूरे उत्साह और जिम्मेदारी से शादी संपन्न कराई। सूची को वह भाभी की बजाय छोटी बहन मानती थी।
दो-चार महीने ठीक-ठाक गुज़रे। सूची भी बैंक कर्मी थी। हनीमून से लौटने के बाद वह नौकरी में लग गई। लेकिन उसने नोटिस किया कि पूरे हनीमून में विवेक दीदी की बातें ज़्यादा करता रहा। असल में, पापा के असामयिक निधन के बाद मम्मी टूट गई थीं और बिस्तर पर पड़ गई थीं। उनकी देखभाल के लिए प्रेरणा ने शादी नहीं की थी, ताकि विवेक की पढ़ाई बाधित न हो। विवेक की नज़र में यह त्याग अतुलनीय था।
सूची यह भाव समझ रही थी, लेकिन उसे खटक रहा था कि हनीमून में वह पति-पत्नी एक-दूसरे को समझने आए हैं, या दीदी के त्याग का पुराण सुनने।
भोपाल लौटते ही दिनचर्या शुरू हो गई। बहू, बेटा और बेटी साथ खाने बैठते तो माँ खुश हो जातीं और बार-बार सूची की तारीफ़ करतीं। उल्टा, विवेक का ध्यान प्रेरणा पर ज़्यादा रहता। उसे लगता कि दीदी को कोई बात बुरी न लगे। वह जो भी सूची के लिए खरीदता, वैसा ही प्रेरणा के लिए भी खरीदता।
सूची को इस पर एतराज तो नहीं था, लेकिन कभी-कभी बुरा लगता। फिर भी माँ की सीख उसे याद आती—“ऐसा शुरू-शुरू में हो सकता है, धैर्य रखना चाहिए।” उसे उम्मीद थी कि धीरे-धीरे सब ठीक हो जाएगा, शायद प्रेरणा की शादी भी हो जाए।
लेकिन ऐसा हुआ नहीं। उल्टा मुश्किलें बढ़ने लगीं। दिन भर घर में खाली बैठी प्रेरणा धीरे-धीरे सूची को टोकने लगी। विवेक भी दीदी के लिहाज़ में चुप रहता।
यहाँ तक कि आज घर में क्या सब्ज़ी बनेगी, यह फैसला भी प्रेरणा ही करती।
शुरुआत में जब सूची बैंक से आती थी, तो प्रेरणा उसे चाय बना कर देती थी, यह कहकर—
“मेरी भाभी कम, बहन ज़्यादा है, थक गई होगी।”
लेकिन धीरे-धीरे बदलाव आ गया। अब सूची या तो खुद चाय बना कर पी लेती, या बिना पिए ही रह जाती।
ननद का व्यवहार और घर में उसकी हर छोटी-बड़ी दखलंदाज़ी अब सूची को अखरने लगी। रिश्तेदारी निभाने से लेकर बाज़ार की खरीददारी तक हर फैसला प्रेरणा ही करती।
धीरे-धीरे बात इतनी बढ़ गई कि प्रेरणा ने सूची को “महारानी” कहकर ताना देना शुरू कर दिया। आखिरकार एक दिन उसने ऐलान कर दिया कि वे अलग रहेंगे।
यह सुनकर सब भौंचक्क रह गए—खासकर विवेक, जिसने कभी ऐसी स्थिति की उम्मीद नहीं की थी।
अब घर में सन्नाटा पसर गया। सूची का मन खुलकर सामने आ गया।
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