आज वो घर पर है इसलिए

 सुबह नींद खुलने के बाद महसूस हुआ कि पिछले कई दिनों से मन बहुत बेचैन और अशांत लग रहा है।।

मेरा जो मन करता है,वह करता हूं। जहां मन करता है, जाता हूं।

अपनी मर्जी का बनाना और खाना।

कोई रोकने-टोकने वाला नहीं। बिल्कुल अकेला, स्वछन्द और आजाद।।।बेफिक्र और बेपरवाह।।

किसी को मेरी फिक्र नहीं तो मैं किसी की परवाह क्यों करूं?

लेकिन बेफिक्र रहने के बाद भी, कहीं कुछ खाली-खाली सा है।

जैसे कुछ खो गया हो।।

वह क्या है और क्यों है,ये समझ नहीं पा रहा हूं। 

फिर मेरी अना आड़े आ गई और सारी बातों को मन से झटककर, तैयार होकर ऑफिस के लिए निकल गया।।

दिन भर आफिस में जी तोड़ मेहनत के बाद शाम को थका हारा घर जाने के लिए निकला। अशांत और विचलित मन लिए सब्जी मंडी पहुँचा और कुछ सब्जियाँ खरीदीं।

आज कुछ देर हो गई थी तो और कुछ नहीं लिया।

घर पहुँचकर जल्दी से खिचड़ी अथवा मैगी बना लेने का विचार चल रहा था। सुबह भी ब्रेड-बटर ही खाकर निकलना पड़ा था।मुझसे सुबह नाश्ता बनाया ही नहीं जाता।

कैंटिन के खाने से भी उब होने लगी है।। इसलिए कच्चा-पक्का जो भी बने, बनाकर खाने का मन था, हालांकि थकावट से शरीर चुर हो रहा था।।

पिछले सप्ताह के एक भी कपड़े धुले नहीं थे ।।

अतः पाँच-छ दिन से एक ही जीन्स को रगड़ रहा था।

एक हाथ से कँधे पर लटके बैग को सम्हालता और दूसरे हाथ में दूध की थैली पकड़े पसीने से तरबतर चेहरा लिए जल्दी-जल्दी घर पहुँचा।

जेब से चाबी लेकर द्वार का ताला खोलना चाहा तो यह क्या? देखा, बस पल्ले भर भिड़के हुए थे, ताला तो पहले ही खुला हुआ था।

मैं कुछ चिंतित हुआ।

कहीं चोर तो नहीं हाथ साफ कर गये।

लेकिन बोझिल कदमों से जैसे ही घर में प्रवेश किया, तो यूँ लगा मानो स्वर्ग में आ गया हूँ।

शंका हुई कि, किसी दूसरे के घर में तो नहीं आ गया ?

घर तो मेरा ही था लेकिन पुरे घर का नजारा बदला हुआ था।खामोशी से अंदर के कमरे में गया। बैग सोफे पर पटका।

बाजार से लाई सब्जियाँ रखने के लिए फ्रीज खोला तो भीतर की ठंडक चेहरे से टकराई।

मैं चौंक गया।फ्रिज की हालत एकदम से बदल गई थी।

फ्रिज के एक कोने में चटपटा अचार रखा हुआ था।

बारीक और व्यवस्थित कतरी हुई आलू की भाजी और टुकड़ों में कटी हुई गोभी करीने से रखी हुई थी।

मेरी मनपसंद आइसक्रीम का नया पैकेट भी पड़ा था।

सुबह तो फ्रीज की हालत इतनी खराब और अस्त-व्यस्त थी कि एक अदद बिस्किट का पैकेट रखने की जगह नहीं थी। सारा फ्रीज आलतू-फालतू सामान से भरा पड़ा था और अब देखो, साफ सुथरी जगह ही जगह थी।

फ्रिज में रखी पानी की बोतलें, जिन्होंने हफ्ते भर से पानी का मुँह नहीं देखा था और गंदी पड़ी थीं, अब साफ और पूरी भरी हुई चमक रही थीं।

मैंने साथ लाई हुई सब्जियाँ भी उसी में रख दी।

तभी मेरा ध्यान गया कि पीछे-पीछे घी के दीए एवं अगरबत्ती की भीनी-भीनी खुशबू भी चली आ रही थी और मन को आनंदित कर रही थी। मैं फ्रेश होने के लिए वाशरुम में घुस गया।

हफ्ते भर का गंदा और सड़ांध मारता बाथरूम अब एकदम चकाचक था और उसमें बदबू के बजाय ओडोनील की फ्रेशनेस की महक फैली हुई थी।

साफ-सुथरा टावेल भी टंगा हुआ था।

कमरे में लौटा तो देखा मेरा बैग सोफे पर न होकर दीवाल पर लगे हैंगर पर टंगा हुआ है। सुबह अपना जो टॉवेल बिस्तर पर ही छोड़ दिया था, वह भी वहाँ न होकर खिड़की के बाहर तार पर लटका सूख रहा था।

बिस्तर पर गंदी चादर की जगह बिल्कुल साफ झक चादर बिछी हुई थी। तकिये के खोल और खिड़कियों के पर्दे भी एकदम साफ -सुथरे।

अलमारी का पल्ला खोला, जिसमें सुबह तक बिना धुले कपड़े ठुंसे हुए थे। लेकिन अब सारे ही कपड़े धुले, इस्त्री किए व्यवस्थित रखे थे।

सुबह खोजने पर भी एक रुमाल नहीं मिल रहा था और अब, अंदर साफसुथरे रुमाल पर रुमाल की गड्डी रखी हुई थी।

सुबह मोजों की जोड़ी नहीं मिली तो अलग-अलग डिजाइन के मोजे पहनकर निकल गया था लेकिन अब सारे मोजे एक स्थान पर करीने से पड़े मुझे देख मुस्कुरा रहे थे।

लाल, पीली, नीली सफेद,काली शर्ट्स एवं टी-शर्ट्स बढ़िया हैंगर पर टंगी हुई थीं।

मैं धीरे से टीवी के सामने बैठा। वह टीवी जिसपर धूल की परतें जम गई थीं, अब चमक रहा था और स्क्रीन पर चित्र भी स्पष्ट दिख रहे थे।

प्यास लगी तो पानी पीने किचेन में पहुँचा।

जिस किचेन में लहसुन, प्याज, सब्जियों के सड़े छिलके,जुठन और न जाने किस-किस किस्म की गंध भरी रहती थी, अब  भूख जगा देने वाले स्वादिष्ट भोजन की सुगंध से महक रहा था।

भावनाओं में बहता, बाहर आकर टीवी के सामने एक चेयर पर बैठ गया। मैंने अपनी आँखें बंद कर लीं और सोचने लगा।

फिर आँखें खोलकर अपनी ही बाँह पर चिकोटी ली कि, कहीं ये सब स्वप्न तो नहीं।

कि तभी गरमागरम आलु,गोभी के पकौड़ों की प्लेट,ताजी हरी धनिया-पुदीने की चटनी और भाप निकलती चाय किसी ने सामने टेबल पर रख दी।

एक हफ्ते से जब घर आता था तो सोचता कि आज खाने के लिए कुछ अच्छा बनाउंगा लेकिन थकावट के कारण जैसे-तैसे दही चावल या बिस्किट या स्नैक्स पर गुजारा कर लिया करता था और आज कमरे में बज रहे धीमें संगीत के बीच भाप निकलती स्वादिष्ट चाय और गरम पकौड़ों का आनंद ले रहा था।

सोचते-सोचते मेरे भीतर का अहम जैसे जर्रा-जर्रा होकर बिखरता जा रहा था।

अब तक खुद को, तन और मन से मजबुत पुरुष होने का दंभ भरता मैं, आज घर में उसकी मौजुदगी के एहसास से ही पिघलता जा रहा था।।।।

और फिर अपने बालों में नरम उंगलियों की प्यार भरी छुअन महसुस होते ही,मेरा गला रुंध गया और बहुत रोकते हुए भी आँसू की कुछ बूंदें आँखों से निकलकर गालों पर बह निकलीं।

मैंने किसी तरह खुद को सम्हाला।

स्वर्गिक आनंद की अनुभूति लेती मेरी नजरें घुमती हुईं आकर उसपर ठहरीं, तो अहसास हुआ ...........

-अरविन्द कुमार सिंह


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