हर वर्ष की तरह मैं खूब प्रसन्न था।होली के अवसर पर हर साल हमारे ईंटो के भट्टो की लेबर हमारी कोठी पर ढोल बजाते,नाचते गाते सपरिवार आते थे।होली के गीत गाते रागिनी गाते, खूब मौज मस्ती करते,मेरे पिता सहित हम सबके वे गुलाल लगाते।मुझे खूब मजा आता।
60 के दशक की घटना है,तब मैं बालपन होते हुए भी कुछ कुछ समझने लगा था।मेरे पिता लेबर को बेइंतिहा प्यार करते,उन्हें किसी चीज की कमी नही होने देते थे।चार माह का राशन,कपड़े लत्ते, बोनस रूप में रुपये वे होली पर अवश्य देते।इससे मुझे उन पर उस बाल पन में भी गर्व होता।लेकिन एक बात मुझे खलती थी,वो थी भट्टे की लेबर का कोई भी व्यक्ति मेरे पिता के सामने कुर्सी या मूढ़े पर नही बैठता था,हमेशा नीचे जमीन पर ही बैठता था।मुझे यह खलता था,क्यो ऐसा होता है,मेरे बालमन मे आता कि ये क्या बिल्कुल तुच्छ है,इन्हें हमारे सामने बराबर में बैठने का अधिकार मेरे पिता क्यो नही दे रहे?
उस दिन होली पर भी यही हुआ,लगभग 100-150 उनके पारिवारिक सदस्य थे।पिताजी ने उनके लिये नाश्ते आदि की बड़ी व्यवस्था की थी।बाकी सामान तो दिया ही था।वे सब पिताजी को दुवाएं देते हुए विदा हुए।पर मैं नोट कर रहा था कि आज भी उनमें से कोई भी सामने पड़े खाली मूढो पर ना बैठकर नीचे बैठ रहे थे।सबके जाने के बाद मैं पिताजी से कह ही बैठा बाबूजी ये बलबीर,दुर्गा सब के सब आपके चेहरे पर गुलाल तो लगा लेते है पर बैठते जमीन पर ही हैं।क्या ये तुच्छ हैं?
मेरे बाल सुलभ प्रश्न को सुन मेरे पिता भौचक्के रह गये।उन्होंने इतना ही कहा,नही रे,इन लोगो के कारण ही तो हम सेठ हैं, ये शायद हमारे प्रति उनका सम्मान है।कहते कहते पिताजी तुरंत चले गये।
अगले दिन मैंने देखा कि हमारी कोठी के बरामदे में चार पांच नये मूढ़े आ गये है।उस दिन के बाद मैंने अपनी कोठी पर किसी भी बलबीर या दुर्गा को जमीन पर बैठे नही देखा।अब उन्हें आग्रह पूर्वक मूढ़े पर बिठाया जाता था।
बालेश्वर गुप्ता,नोयडा
सच्ची घटना।
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