"पापा, जल्दी जूते पहनाइये | स्कूल बस छूट जायेगी |" आठ बर्षीय रोहित बोला |
"आता हूँ, रूको, टिफिन तो रखने दो |" पापा राज हडबडाते हुए बोले |
" लाइये पापा, मैं अपना और रोहित का टिफिन पैक कर लेती हूँ | आप उसे जूते पहना दें |" दस बर्षीय राधिका पापा से बोली |
राज टिफिन छोडकर रोहित को जूते पहनाया और झटपट दोनों को लेकर निकल पडा | दोनों बच्चों को स्कूल बस में बैठाकर घर आया |
" बेटा, मैंने तुम्हारे लिए भी रोटी बना दिया है | नाश्ता कर लेना | मुझे भी रोटी खाकर दवा खाना है | " माँ उसे अंदर आते देखकर आगे बोली - " बेटा बहू को ले आओ | मुझसे काम नहीं होता | बहू सब अच्छे से संभाल लेती है | " माँ बिमार है , ज्यादा काम नहीं कर पाती है | उसे समय पर दवा खाना होता है, जो खाली पेट तो खा नहीं सकती | कब कौन सा दवा माँ को खाना है,यह सब बातें राज को तीन दिन पहले ही पता चला था | अतः उसने माँ को रोटी खाने दिया और आफिस जाने के लिए तैयार होने चला गया | झटपट तैयार होकर नाश्ताकर वह आफिस के लिए चल पड़ा | माँ से कह दिया था कि उसका टिफिन नहीं बनाना वह आफिस के कैंटीन में ही दोपहर को खा लेगा | आफिस में पहुंचते ही वह काम में लग गया | लंच टाइम में वह कैंटीन में खाते हुए अपना टिफिन याद करने लगा, जो इस खाने से बहुत अच्छा होता था | टिफिन केे खाने के साथ उसे अपनी पत्नी रमा की याद आने लगी, जो रोज उसे समय पर अच्छी तरह टिफिन बनाकर देती थी | उसका टिफिन ही क्यों, वह तो हर काम अच्छे से करती थी | बच्चों का टिफिन, बच्चों को स्कूल जाने के लिए तैयार करना, उनका होमवर्क करवाना, उसकी बिमार माँ का ध्यान करना, पूरे घर को सम्भालना सब वह अकेले करती थी और समय पर करती थी | उसने ही उसकी कदर न की और बार- बार उसे यही कहता था कि तुम दिनभर करती क्या हो? इतना तो सभी औरतें करती है, तुम ने किया तो क्या विशेषता है? वह तो उसकी इन बातों को सुनकर भी ध्यान नहीं देती थी, पर चार दिन पहले की बात है,उसने तो हद ही कर दी | वह आफिस जाने के लिए नहाकर बाथरूम से बाहर आया तो उसके कपड़े और मोजा, रूमाल वगैरह निकाल कर रखे नहीं थे, जो रोज रमा रख देती थी | उसके पूछने पर रमा ने कह दिया कि आलमारी में रखे हैं, ले लें | बस इतनी सी बात पर उसने उसे सुनाना शुरू कर दिया | सुनते - सुनते उसने इतना कहा कि वह कोई बैठी नहीं है | उसका टिफिन बना रही है | इसपर उसे और गुस्सा आ गया और बात इतनी बढ़ गई कि उसने रमा को बहुत कुछ कह दिया | रमा भी गुस्सा गई और गुस्से में मायके चली गई | उसे लगा कि कोई बात नहीं है, वह सब संभाल लेगा, पर उसे तीन- चार दिन में ही दिन में तारे दिखाई देने लगे और पता चल गया कि रमा कितना काम करती है, कितना सम्भालती है | तभी तो वह परेशान रहती है और चिडचिडाती रहती है |वह उसकी मदद भी नहीं करता और उसे सुनाता भी रहता है कि वह करती ही क्या है? घर में काम ही कितना होता है | वह तो दिनभर आराम ही करती होगी | माँ की तबियत भी ठीक नहीं रहती,बस किसी तरह थोड़ा काम कर लेती है, फिर भी रमा उनका ध्यान रखती है | सोचा था कि वह रमा को लाने नहीं जायेगा और वह जब आये, खुद ही आये, पर अब वह सोच रहा था कि परसों रविवार है | वह रमा के मायके जाकर उससे माफी मांग लेगा और उसे साथ ही लेता आयेगा | जब वह आ जायेगी तो आगे से अपना काम खुद कर लेगा और जहाँ तक संभव होगा, उसकी मदद भी करेगा | उसने ऐसा निश्चय किया और ऐसा किया भी | रमा की परेशानी भी दूर हो गई | वह राज के इस बदलाव से खुश रहने लगी |
# दिन में तारे दिखाई देना
स्वलिखित और अप्रकाशित
सुभद्रा प्रसाद
पलामू, झारखंड |
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