जैसे ही मैं क्लास में पहुंचा शोर मचा हुआ था शीनू बुक्का फाड़ कर रोए जा रही थी।
"..मेरे बापू मारेंगे फिर से रुपए नही देंगे फीस देने के लिए सौ रुपए लाई थी..!
चुपचाप बता दो किसने रुपए चुराए हैं तुम लोग यहां पढ़ने आते हो या चोरी करने .. हम लोग चोरी करना सिखाते हैं क्या ..!!मेरा क्रोध बढ़ रहा था ...शीनू तुम्हे किसपर संदेह है मैने शीनू से पूछा।
शीनू ने कुछ नहीं कहा लेकिन सबकी निगाहें रामू की ही तरफ उठ रही थीं जो मासूम सी शकल बनाए अनभिज्ञ सा बैठा था।
क्यों रामू तुमने तो नही लिए हैं अगर जरूरत है तो बता दो कोई कुछ नही कहेगा मैने सीधे सीधे रामू से ही पूछ लिया।
मैं क्यों चुराऊंगा सर जी क्या मैं यहां चोरी करने आता हूं मैं तो यहां पढ़ाई करने आता हूं जिसका रुपया है गलती उसकी है वह संभाल कर क्यों नहीं रखता ढीटता से उसने प्रत्युत्तर दिया।
उसका जवाब ही उसका अपराध बयान कर रहा था।
रामू आखिरी बार कह रहा हूं रखे हो तो दे दो अभी मैंने फिर से समझाते हुए कहा।
आप सबको मुझ पर ही शक है लीजिए तलाशी ले लीजिए मेरी ...कहता वह तुरंत अपनी शर्ट उतारकर पेंट भी उतारने लग गया .....
वह निहायत ढिठाई से मुस्कुरा रहा था।परंतु मैने भी# घाट घाट का पानी पिया था मुझे यकीन हो गया था रुपए इसने चुराए हैं।
पर अब बात रुपए मिलने की नही थी उसकी चोरी की आदत सुधारने की थी मैं चाहता था वह स्वयं अपनी गलती स्वीकार करे तभी सुधार संभव था।
अपना बैग लाओ मुझे दो इसकी तलाशी भी तो लेनी है मेरे कहते ही वह बैग देने में आनाकानी करने लगा।
मैंने झपट कर उसका बैग ले लिया और बाहर ले जाकर तलाशी लेने लगा मुझे तुरंत एक कॉपी में दबा नीले रंग का सौ का नोट दिख गया। कुछ सोच कर किसी को बिना बताए मैने तुरंत नोट अपने हाथ में रखते हुए बैग उसे वापिस कर दिया।
बैग में तो नहीं है ... मैंने दृढ़ता से कहा।
रामू के चेहरे पर आश्चर्य के साथ राहत थी।
शीनू लो तुम ये सौ रुपए रख लो फीस जमा कर दो और अब से सब बच्चे आते ही सबसे पहले रुपए जमा कर दिया करो कहता मैं अपने कक्ष में आ गया।
छुट्टी का समय हो गया था सभी बच्चे चले गए थे मैं भी चिंतामग्न अपना सामान समेट घर आने की तैयारी कर रहा था ।
तभी मैंने देखा रामू चुपचाप आकर सिर झुका कर खड़ा हो गया है।
मैंने उसकी तरफ कोई ध्यान नहीं दिया खामोशी से अपना बैग उठाकर दरवाजे की ओर बढ़ गया।
मेरी अवहेलना से वह टूट गया।
मेरे पैरो पर गिर पड़ा "....सरजी माफ कर दीजिए मुझे मारिए सजा दीजिए...
मैं फिर भी खामोश ही रहा।
आज के बाद जो चोरी करूं तो आप मेरा मरा मुंह देखेंगे...चीख पड़ा वह... रोता जा रहा था माफ कर दीजिए सर कहता मेरे पैरों पर लिपट गया था।
मैंने दोनों हाथो से उठा कर उसे गले से लगा लिया ।
मैने तुम्हे माफ किया बेटा अब मुझे पूरा विश्वास है कि आज के बाद तुम चोरी कभी नहीं करोगे।
लघुकथा#
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