बेटी अब ससुराल ही तेरा घर है

 सुधा अपने माता-पिता की एकलौती बेटी थी जिसे बड़े नाजों से पाला गया था, इसलिए उसे अपने जीवन में उतार चढ़ाव का कभी सामना नहीं करना पड़ा था। उसकी सभी इच्छाएँ सिर्फ उसके कहने भर से पूरी हो जाती थी। जिम्मेदारी क्या होती है इसका उसे अहसास ही नहीं था।

उसके माता-पिता भी ज्यादा ध्यान नहीं देते थे उन्हें लगता था कि समय आने पर वह खुद ही समझ जायेगी। इसी तरह दिन बितने लगे और सुधा की शादी की उमर हो गई। उसके माता-पिता ने एक अच्छा लड़‌का देखकर उसकी शादी कर दी।  उस लड़के का नाम सुधिर था

और उसके परिवार में माता - पिता, एक भाई और एक बहन थे वे सभी ही काफी अच्छे स्वभाव के थे और सुधा को बहुत प्यार भी करते थे। उसके ननद देवर भी उसके आस-पास भाभी - भाभी कहकर घूमते रहते थे। पर सुधा को इनसब से चीढ़ होती थी, उसे गुस्सा आता था और लगता था

कि ये सब उसकी आजादी में बाधक है। वो हमेशा सुधिर को कहती रहती थी कि हम लोग कहीं अलग जाकर रहे पर सुधिर उसकी बातों को नकार देता था और उसे समझाता था कि सच्ची खुशी सबके साथ रहने में हैं पर सुधा यह समझना ही नहीं चाहती थी। एक दिन किसी छोटी सी बात पर सुधा रूठकर अपने मायके चली आई

क्योंकि उसे पता था कि उसके माता-पिता हमेशा उसका ही पक्ष लेंगे। पर इस बार वो गलत थी सुधिर ने सुधा के माता-पिता को फोन पर सारी बातों की जानकारी दे दी थी और उनसे कहा कि अब आपको जो सही लगे वहीं करिये।

उनलोगों को भी इस बात का एहसास हो गया कि सुधा की परवरिश में कुछ गलती हो गई है और उसे अब सुधारना होगा। वे लोग बैठकर सोच ही रहे थे कि उन्हें सुधा आते हुए दिखायी दी। सुधा ने उनको प्रणाम किया और कहा मम्मी-पापा मैं अब ससुराल नहीं जाऊँगी वहाँ के लोग अच्छे नहीं है।

सुधा की मम्मी ने सुधा को समझाते हुए कहा कि देखो मुझे सारी बातें पता है। "बेटी तुम ये मत भूलो कि अब ससुराल ही तेरा घर है, अब तो तु यहाँ की मेहमान है।" जैसा व्यवहार तुम अपने घर में सबके साथ करोगी वैसा ही तुम्हारे साथ भी होगा इसलिए तुम जैसे आई हो वैसे ही वापस चली जाओ

क्योंकि तुम्हारे माता-पिता तुम्हारी गलत बातों में अब तुम्हारा साथ नहीं देगें । सुधा ये सुनकर असमंजस में खड़ी रह गई उसे यकिन ही नहीं हो रहा था कि ये वहीं माता-पिता हैं जो उसके एकबार कहने पर ही कुछ भी कर जाते थे। उसे ऐसे ही खड़े देखकर उसके पिता ने कहा बेटी तुम ये मत समझना कि तुम्हारे माँ-बाप बदल गये हैं

या उन्हें तुम्हारी परवाह नहीं है पर अगर आज मैनें तुम्हारा साथ दिया तो यकिन मानो वो तुम्हारी जिंदगी के लिए बहुत बुरा होगा। सुधा को भी अब अपनी गलती का एहसास हो रहा था। उसने अपने माता-पिता से कहा मुझे आपकी बात समझ में आ रही है और मैं आपदोनों को विश्वास दिलाती हूँ की आगे से ऐसी गलती फिर नहीं करूँगी ऐसा कह कर वो खुशी-खुशी अपने घर वापस चली गई।

ज्योति कुमारी


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