आज कितने अरसे के बाद रश्मि के चेहरे पर सुकून दिखाई दे रहा था। वो आज सफलता के उस मुकाम पर थी जिसपर होने की उसने आशा ही छोड़ दी थी। रश्मि एक मध्यमवर्गीय परिवार की बेटी थी, वो हमेशा पढ़-लिखकर कुछ बनने का सपना देखा करती थी। उसके पिता अजय की एक किराने की दुकान थी और उसकी माँ एक गृहणी थी। उसकी एक 2 साल छोटी बहन काजल और एक 4 साल छोटा भाई मोहित था।
रश्मि ने अभी स्नातक की परीक्षा दी ही थी कि उसके लिए एक लड़के कार्तिक का रिश्ता आ गया। देखने सुनने में रिश्ता बहुत अच्छा था। उसके माता-पिता को भी कार्तिक और उसका परिवार बहुत पसंद आया। हालांकि रश्मि को शादी करने का मन नहीं था क्योंकि वो तो पढ़-लिखकर अपने पैरों पर खड़ी होना चाहती थी। पर अपने माता-पिता के समझाने और उनकी खुशी को देखते हुए शादी के लिए हाँ कर दी। उसकी शादी में उसके पिता ने अपने सामर्थ्यनुसार अच्छा-खासा खर्च किया। शादी के बाद रश्मि अपने ससुराल आ गई और अपने पारिवारिक जीवन में मन लगाने की कोशिश करने लगी। कुछ दिन तो उसके अच्छे बीते पर धीरे-धीरे उसके आगे कार्तिक और बाकि घर के लोगों की असलियत सामने आने लगी। वो लोग रश्मि को हमेशा दहेज लाने के लिए प्रताड़ित करते और उसके साथ सुबह से रात तक सिर्फ काम करवाते रहते थे। उसकी हालत नौकरानी से भी बत्तर बना दी गयी थी। रश्मि खुद को बहुत असहाय महसूस कर रही थी वो अपने माता-पिता से भी अपनी परेशानी नहीं बाँट पा रही थी । उसे लगता था कि मेरी परेशानी सुनकर मेरे माता-पिता भी परेशान हो जायेंगें और वह बचपन से यह भी सुनते आ रही थी कि जहाँ लड़की की डोली जाती है वहीं से उसकी अर्थी भी उठती है बस यही सब सोचकर वो अंदर-ही-अंदर घुट रही थी । उसे अपने बचने का कोई रास्ता नहीं समझ आ रहा था। किसी तरह उसके दिनकट रहे थे।
अचानक एक दिन रश्मि के पिता अपनी बेटी से मिलने उसके ससुराल पहुंचे। अपने पिता को देखकर रश्मि के सब्र का बांध टूट गया और वो उनके सीने से लगकर रोने लगी। उसके पिता रश्मि की हालत देखकर आश्चर्यचकित रह गये, उन्हें खुद पर ग्लानि हो आयी कि उसकी बेटी ऐसी हालत में हैं। उन्होंने उसे अपने पास बैठाया और प्यार से उसके सर पर हाथ फेरते हुए सारी बातें पूछी। अपनी बेटी के मुंह से उसकी तकलीफ सुनकर उनकी आँखों में आंसू आ गये। उन्होंने उसे अपने गले से लगाते हुए कहा कि इतने दिनों से तुमने हमें कुछ बताया क्यों नहीं, मैं उन बापों में से नहीं हूँ जो कहते हैं कि "बेटी अब तो ससुराल ही तेरा घर है और अब तो तु यहाँ की मेहमान है" अगर ससुराल अच्छा है तो सिर- माथे पर नहीं तो मैं एक पल नहीं सोचूंगा तु अपना सामान बाँध और चल मेरे साथ कहकर अजय जी रश्मि को लेकर चले आये और घर में सबों को सारी बात बतायी। साथ ही ये भी कहा कि अब रश्मि अपने पैरों पर खड़ी होगी और अपनी जिंदगी की लड़ाई खुद लड़ेगी। मैं हर कदम पर इसके साथ रहूँगा। रश्मि ने भी जी-जान से अपनी पढ़ाई की और आज वो डीएम के पद पर चयनित हुई है।
- Yashi
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