नीति बीमाऱ सास विमला और दो छोटे बच्चो के साथ घर मे अकेली थी पति तरुण किसी काम के सिलसिले मे शहर से बाहर गये हुए थे । अचानक सास की तबियत बिगड़ गई आनन फानन डॉक्टर को बुलाया गया पर कुछ ही घंटो मे सब खत्म हो गया । नीति सास से लिपट जोर जोर से रोना चाहती थी पर जिम्मेदारियां उसे इसकी मोहलत नही दे रही थी । पड़ोसियों की सहायता से उसने सब रिश्तेदारो को फोन करवाया तरुण को उसने खुद फोन किया किन्तु दूसरे शहर मे होने के कारण उसे थोड़ा वक्त लगना था।
घर पर रिश्तेदारो का आना शुरु हो गया , ननद राखी रोती बिलखती आई और माँ से लिपट गई । सब रिश्तेदार उसे तसल्ली दे रहे थे । इधर नीति अपने आँसू पीती हुई अंतिम क्रिया की तैयारियों मे लगी थी क्योकि तरुण के आने के बाद ज्यादा वक्त नही बचना था दिन ढलने मे। कुछ रिश्तेदार और पड़ोसी नीति की सहायता मे लगे थे । इधर नीति अपने बच्चो को भी संभाल रही थी । तभी रिश्तेदारो मे खुसर पुसर होने लगी ।
" देख तो जरा इस नीति को कैसे शांत है और बेचारी राखी कैसे रो रोकर हलकान हुए जा रही है !" ताई सास बुआ सास से बोली।
" हाँ भाभी अब बेटी को तो माँ का दुख होगा ही ना बहू तो पराये घर की है !" बुआ बोली।
" पराये घर की है पर विमला के साथ रहते दस साल हो गये कुछ तो गम होना चाहिए सास के जाने का अरे नही भी है तो थोड़े घड़ियाली आँसू ही बहा लेती दुनिया को दिखाने को !" ताई सास हाथ नचा के बोली।
" बस पूछो मत भाभी आजकल की बहुओ को जरा दुख नही होता इन्हे सास ससुर का ऐसी पत्थर दिल होती है ये !" बुआ सास बोली।
नीति ये सब सुन रही थी पर इस वक्त कुछ बोलने की स्थिति मे नही थी उसकी सास को अंतिम विदाई जो देनी थी उसे । थोड़ी देर मे तरुण आ गया और जल्दी जल्दी सब काम निपटाए गये । सास के मृत शरीर ने जैसे ही घर की चौखट पार की नीति माँ माँ बोलती हुई पछाड़ खा गिर पड़ी । उसका रोना सुन सब लोगो की आँख मे आँसू आ गये । थोड़ी देर पहले जो ताई सास और बुआ सास बात बना रही थी वो नीति को संभाल रही थी क्योकि नीति के आंसू घड़ियाली नही थे बस किसी तरह जिम्मेदारी निभाने के लिए उसने उन आंसुओ को रोक रखा था पर अब जो वो बहे तो उन्हे रोकना मुश्किल हो रहा था । आखिर बहू ने अपनी जिम्मेदारी निभा दी थी और अब एक बेटी जैसी बहू अपनी सास के जाने का दुख सहन नही कर पा रही थी।
संगीता अग्रवाल
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