मन की हूक

 गर्मी की छुट्टी खत्म  होने वाली है। घर मे बैठे बैठे बहुत  से काम  ढूँढ  निकाले , फिर एक दिन  पतिदेव  ने हिमाचल  का प्रोग्राम  बना लिए।, ताकि काम से कुछ ब्रेक मिल सके और  बच्चे भी थोड़ी मस्ती कर सकें।

शरीर  तो इस  प्रोग्राम  मे शामिल  हो गया पर इस मन का क्या करें  जो बार बार  यादों के गलियारे मे भटक जाता है

आज पिताजी को गुजरे  हुए  दो वर्ष  बीत गए हैं और उन दो वर्ष मे कुछ  नही बदला  है। और अगर बदला  है तो गर्मी की छुट्टियों का इंतजार।

पहले छुट्टियां शुरु होने से पहले ही पिताजी फोन करना शुरु कर देते कि बच्चों की छुट्टी  कब से हो रही , आ जाओ कुछ दिनों के लिए। फिर मै भी पहुंच  जाती छुट्टियों में अपना बचपन ढूँढने ।आज भी याद है कि कैसे मैने जानबूझकर कर बोला था कि दिल्ली मे यहां की तरह  ताजी सब्जी नही मिलती, फिर  क्या था पिताजी रोज सुबह उठकर कर  नयी- नयी  बाजार  से जा कर ले आते और  खुद खाने के नाम पर कहते कि आज यही सब्जी बनेगी। पिताजी मे पता नही कहां से इतना जोश आ जाता कि मिठाई ,फल  सब्जी  लाने के चक्कर  मे पता नहीं कितनी बार  बाजार  के चक्कर लगा आते।महीनेभर  की छुट्टिया ऐसे ही खत्म  हो जाती और पता भी नही  चलता कि छुट्टी खत्म  हो गयी

परन्तु इस बार  गर्मी की छुट्टी कुछ  ज्यादा ही लंबी लग रही । शायद  पिताजी का ना होना छुट्टियों की रफ्तार  को कम कर गया।और मन के एक कोने मे एक हूक छोड़ गया कि दो वर्ष  पहले की गर्मी की छुट्टी अब कभी वापस नही आएगी।

दीप शिखा


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