"अनीता! वो मिठाई वाले ने साफ मना कर दिया उधारी पर देने से..."
मैंने दरवाज़े की ओट से धीरे से कहा।
पत्नी अनीता रसोई में दोपहर की तैयारी कर रही थी, पर चेहरे पर उदासी उतर आई। आज दामाद और बेटी पहली बार मायके आए थे — शादी के बाद की पहली नज़रे उतारने की रस्म, घर में चहल-पहल होनी थी, लेकिन जेबें खाली थीं।
सरकारी स्कूल में चपरासी की नौकरी है, और बेटी की शादी के बाद अभी तक उधार की किस्तें ही चुकाई जा रही हैं। बेटी के हाथ में कुछ मिठाई, एक जोड़ा साड़ी, और छोटे से उपहार देने की रस्म निभानी थी, पर हालात…
"कुछ करना होगा अनीता… सोचा था, शर्मा जी से सौ–दो सौ ले लूंगा, मगर वो खुद परेशान हैं। अब सोचा हूँ कि थोड़े गहने गिरवी रख दूं।"
"गहने!? नहीं रामलाल जी... रह लेने दो मिठाई-उपहार की रस्म... बेटी को प्यार देंगे, वही सबसे बड़ा तोहफा होगा," अनीता ने धीमे स्वर में कहा।
मैं कुछ कहता, उससे पहले ही बेटी रिया और दामाद रवि कमरे में आ गए। उनके चेहरे पर सच्ची खुशी झलक रही थी, लेकिन मेरी नज़रें झुकी रहीं। पहली बार आए हैं दामाद को कुछ देने लायक भी न रहे हम।
रिया ने ध्यान से हमारा चेहरा देखा, फिर धीरे से मुस्कराते हुए बोली,
"पापा , हमें पता है आप क्या सोच रहे हैं। मम्मी भी परेशान लग रही हैं। लेकिन क्या आप सच में सोचते हैं कि हम यहां मिठाई या साड़ी के लिए आए हैं?"
मैं चुप... अनीता भी संकोच में।
रिया आगे बोली,
बेटियों को सिर्फ अपने पिता से दुलार? चाहिए
रवि ने मेरा हाथ पकड़ते हुए कहा,
"पापा जी , अब हम साथ हैं... आपकी कोई चिंता, अब सिर्फ आपकी नहीं। आप हमारे पिता की तरह हैं — आपको किसी के आगे न सर झुकाना है, न कुछ साबित करना।"
मेरी आंखें भर आईं। मैंने बेटी के सिर पर हाथ रखा और कहा,
"बेटा, तू तो सच में हमारे घर की लक्ष्मी है... आज समझ में आया, असली इज्ज़त वही है, जो सादगी में हो और दिल से हो।"
रिया ने हल्के से मुस्कुराकर कहा,
"पापा , अगली बार जब आएंगे तो आप चाय के साथ सिर्फ मुस्कराहट देना — बाकी सब हम लेकर आएंगे।"
शिक्षा:
सम्मान दिखावे से नहीं, सच्चे रिश्तों से आता है। कभी-कभी हम दुनिया के दिखावे में अपनी सीमाएं भूल जाते हैं, जबकि अपनों की नज़रों में हमारी ईमानदारी और सादगी ही सबसे बड़ी पूंजी होती है।
विनय कुमार मिश्रा
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