मुस्कान की मिठास

 सर्दियों की सुबह थी। सड़क किनारे एक छोटी सी चाय की दुकान थी, जहाँ कॉलेज के छात्र अक्सर चाय पीने के लिए आया करते थे। दुकान पर दो लड़कियाँ हमेशा साथ में दिखतीं—एक थी नेहा, चुलबुली और तेज, दूसरी थी रानी, शांत और हमेशा मुस्कुराने वाली।

एक दिन कॉलेज के प्रोफेसर शर्मा जी अपनी कार रोककर चाय पीने के लिए उस दुकान पर पहुँचे। उन्होंने देखा, नेहा ऑर्डर ले रही थी और रानी धीरे-धीरे कप धो रही थी। रानी की चाल थोड़ी धीमी थी, लेकिन उसके चेहरे पर एक उदासी थी। प्रोफेसर साहब बोले, "नेहा! तुम्हारी दोस्त रानी इतनी सुस्त क्यों है? देखो, तुम कितनी फुर्तीले हैं!"

नेहा मुस्कुरा दी, लेकिन जवाब देने से पहले ही बगल की दूसरी चायवाली ने आकर रानी के हाथ से सारे कप ले लिए और तेजी से धोने लगी। प्रोफेसर साहब ने सोचा, शायद नेहा नाराज़ होगी या झगड़ा होगा, मगर दोनों में से कोई भी कुछ नहीं बोला।

शर्मा जी ने पैसे दिए तो नेहा ने वो पैसे रानी की ओर बढ़ा दिए। प्रोफेसर साहब की जिज्ञासा बढ़ी—"ये क्या माजरा है?"

नेहा बोली—"सर, रानी कुछ महीनों पहले सड़क दुर्घटना में घायल हो गई थी। उसकी पीठ और एक हाथ में बहुत चोट आई है, तेज़ काम कर पाना अब उसके लिए मुश्किल है। उसकी मां घरों में झाड़ू-पोंछा करती हैं, घर की जिम्मेदारी इसी पर थी, मगर अब काम कम हो गया है।"

इतना कहते-कहते नेहा थोड़ा भावुक हो गई—"हम सब, यहां के छोटे-मोटे दुकानदार, एक परिवार की तरह हैं। हमारी टोली में एक ताऊ जी हैं—सब उन्हें ‘संगी ताऊ’ कहते हैं। उन्हीं ने एक दिन सबको चाय पिलाते हुए समझाया कि ‘बेटा, ज़रूरतमंद की मदद करना ही असली इंसानियत है।’ तभी से हम सबने तय किया है—दुकान की रोज की कमाई से आधी रकम रानी को दी जाती है, ताकि वो इलाज करवा सके, पढ़ाई भी जारी रख सके। जो काम नहीं कर पाती, उसमें हम सब उसकी मदद करते हैं।"

शर्मा जी के मन में सम्मान का भाव उमड़ आया। उन्होंने नेहा और रानी दोनों की पीठ थपथपाई और बोले, "बेटा, तुम सब सच्चे इंसान हो। अगर देश के हर कोने में ऐसी एकता और अपनापन जिंदा रहे, तो दुनिया स्वर्ग बन जाए!"

रानी मुस्कुराते हुए बोली, "सर, मां कहती हैं—दूसरों के दुख को अपना बना लो, तो ईश्वर खुद तुम्हारे साथ हो जाते हैं।"

शर्मा जी मुस्कुराए और सोचने लगे—इंसानियत अभी भी जिंदा है…

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