शिवानी की शादी को कुछ ही महीने हुए थे। जैसे ही हनीमून की रात पति रविकांत के साथ वह पहली बार पास आई, तभी बाहर से किसी ने ज़ोर से आवाज़ दी — "बेटा, बाहर आओ!"
शिवानी हड़बड़ा गई। जल्दी से कपड़े पहनकर बाहर आई तो देखा बुआ सास, चंपा देवी दरवाज़े पर खड़ी थीं।
“बेटा, आज तुम्हारी पहली रात है, सबकुछ अच्छे से करना… तुम्हारा रवि अभी नादान है।”
शिवानी मुस्कुराई, मन ही मन सोची — “चार महीने की फोन पर बातें ही काफी थीं यह जानने के लिए कि ‘बबुआ’ कितने नादान हैं।”
वो चुपचाप कमरे में लौटी। फिर पति-पत्नी के बीच शरारतें हुईं और रात अपने रंग में ढल गई।
कुछ दिन बाद रिश्तेदारों का आना-जाना शुरू हुआ। हर कोई आते ही आशीर्वाद देता —
“जल्दी से कोई खुशी की खबर सुना देना।”
पहले तो शिवानी शरमा जाती, लेकिन धीरे-धीरे उसे यह टोकाटाकी चुभने लगी। उसका मन करता — “इतनी जल्दी है तो पहले ही बच्चा पैदा करके भेज देतीं!”
संस्कारों के कारण वह कुछ नहीं कहती, लेकिन एक रात उसने रविकांत से कहा —
“हमें अब डॉक्टर से मिलकर कुछ सोच लेना चाहिए… छह महीने हो चुके हैं।”
रविकांत ने हैरानी से जवाब दिया —
“क्या पागलपन है? शादी में अभी ही इतना खर्चा हुआ है। बच्चा पालना कोई खेल नहीं है।”
शिवानी भड़क गई —
“बोलने वालों को आप नहीं सुनते, पर दिनभर घर में मैं ही सुनती हूं सबका ताना!”
यही पहली बार था जब दोनों में झगड़ा हुआ।
फिर एक दिन सास उर्मिला देवी समझाने आईं —
“बेटा, अगर कोई दिक्कत है तो साफ-साफ कहो, हम डॉक्टर के पास चलेंगे।”
शिवानी ने ठंडी आवाज में कहा —
“मैं तो तैयार हूं, लेकिन आपके बेटे को जल्दी नहीं है।”
घर में खलबली मच गई। लेकिन रविकांत के पिता, हरिशंकर जी ने हस्तक्षेप किया और मामला शांत करवाया।
दो-तीन दिन सब शांत रहा, लेकिन फिर एक शाम वही चर्चा शुरू हो गई। रविकांत बोला —
“अभी मेरी कमाई इतनी नहीं कि मैं एक और ज़िम्मेदारी उठा सकूं।”
इस पर मां उर्मिला बोलीं —
“क्या बच्चा करोड़ों लेकर आएगा? भाग्य लेकर आता है!”
लेकिन उस दिन हरिशंकर जी ने सबको चुप कर दिया —
“जब हमारे पास कम था, तब हमारी ज़रूरतें भी कम थीं।
आज ज़रूरतें बढ़ गई हैं — इंटरनेट, मोबाइल, ब्रांडेड स्कूल, मिनरल वॉटर।
पहले एक साइकिल से पूरा परिवार चलता था, आज हर किसी को बाइक चाहिए।
इसलिए ज़िम्मेदारी लेने से पहले थोड़ी समझदारी ज़रूरी है।”
फिर उन्होंने बेटे को कहा —
“बाप बनने से पहले आदमी को आत्मनिर्भर बनना चाहिए।
एक ही बच्चा हो, लेकिन उसकी परवरिश शानदार हो।
और हां, देर न करना, नहीं तो तुम्हारा रिटायरमेंट और उसके बोर्ड एग्ज़ाम एक साथ पड़ जाएंगे!”
उस दिन के बाद से घर में दोबारा किसी ने बच्चे को लेकर दबाव नहीं डाला।
दो साल बाद, जब शिवानी और रविकांत ने खुशी से अपने जीवन में बेटी "काव्या" का स्वागत किया, तो पूरा परिवार उसे देखकर मुस्कुराता रहा। हरिशंकर जी की सीख घर की नींव बन गई — कि समझदारी, सहमति और समय का संयोजन ही एक स्वस्थ परिवार की पहचान है।
दोस्तो समय से पहले न कुछ होता है, और न दबाव में किए फैसले सुख देते हैं। परिवार में बुजुर्गों की समझदारी और संवाद का वातावरण हो, तो हर चुनौती हल्की लगती है।
0 टिप्पणियाँ