उत्तर प्रदेश के एक गांव में सुखराम का परिवार रहता था। सुखराम के तीन बेटे—प्रमोद, रमेश और सुरेश—और एक बेटी सीमा थी। उनके घर का माहौल हमेशा खुशियों और चहल-पहल से भरा रहता था।
बच्चों की परवरिश में सुखराम और उनकी पत्नी गीता देवी ने कभी कोई कसर नहीं छोड़ी थी। सबसे बड़े बेटे प्रमोद को पढ़ाई में हमेशा अव्वल देखा गया, इसी लगन के बल पर वह शहर जाकर डॉक्टर बन गया। सबसे छोटा बेटा सुरेश भी अपने स्कूल-कॉलेज में होशियार रहा और आखिरकार इंजीनियर बनकर बड़े शहर में बस गया।
मगर बीच वाला बेटा रमेश, पढ़ाई-लिखाई में कुछ खास नहीं था। वह स्वभाव से सीधा-सादा, थोड़ा लापरवाह, और बहुत भोला था। गांव के खेत-खलिहानों, हल जोतने, मजदूरी करने, कभी पेंटर, कभी मिस्त्री—जैसे-तैसे अपने दिन काटता रहा। गांव वालों की नजर में वह निकम्मा ही कहलाता था, और मां-बाप के लिए भी चिंता का विषय बन गया था।
समय बीतता गया। प्रमोद और सुरेश, दोनों की शादियां अच्छे परिवार में हो गईं। बेटी सीमा का भी एक संपन्न घर में विवाह हो गया। पर रमेश की शादी के लिए कोई भी रिश्तेदारी तैयार नहीं थी। मां-बाप कई जगह रिश्ता लेकर गए, लेकिन लोग पढ़ाई-लिखाई न होने, स्थायी काम न होने के कारण रमेश को ठुकरा देते थे।
फिर एक दिन, सीमा मायके आई तो सबसे पहले प्रमोद और सुरेश से मिली। रमेश से औपचारिक-सी मुलाकात की और बोली—"क्या कर रहे हो इन दिनों? कमाते कितने हो?" रमेश सिर्फ मुस्करा दिया, उसके पास बताने लायक कुछ नहीं था।
मां को भीतर से यह बात बहुत चुभती थी, लेकिन मां थी—बेटे के लिए हमेशा उम्मीद बांधे रहती।
समय के थपेड़ों में सुखराम की अचानक मृत्यु हो गई। अब घर की जिम्मेदारी पूरी तरह गीता देवी पर आ गई।
दोनों बड़े बेटों और बेटी के घर-परिवार, नौकरी और बच्चों की दुनिया अलग हो चुकी थी। गीता देवी को डर था कि कहीं संपत्ति-बंटवारे की बातें न शुरू हो जाएं।
इसी चिंता में उन्होंने गांव की ही एक सीधी-सादी, घरेलू स्वभाव वाली लड़की से रमेश की शादी करवा दी—कम से कम बेटे को जीवन का साथी मिल जाएगा।
शादी के कुछ महीने बाद ही रमेश में चमत्कारी बदलाव आने लगा।
अब वह सुबह जल्दी उठता, खेतों में मेहनत करता, मिस्त्री का काम भी करता, गांव वालों के छोटे-मोटे काम भी कर देता। उसका स्वभाव और जिम्मेदारी देख गांव वालों की राय भी बदलने लगी।
रमेश अब हर बात में अपनी पत्नी और मां की राय लेता। कभी उसके दोस्त बुलाते—"चल रमेश, आज क्रिकेट खेलते हैं, थोड़ी मस्ती कर लें।"
रमेश मुस्करा कर कहता—"भाई, अब जिम्मेदारी बढ़ गई है। पहले अकेला था, जैसे-तैसे कमा लेता था। अब पत्नी और कल को बच्चे होंगे—उनका पेट भरना है, कुछ जोड़ना है। चल नहीं पाऊंगा।"
एक दिन प्रमोद और सुरेश दोनों घर आए। दोनों ने देखा कि रमेश काम में जुटा रहता है, लेकिन कमाई उतनी नहीं कि शहर के भाइयों की बराबरी कर सके। प्रमोद बोला—"अब तो रमेश का अपना परिवार भी है। अच्छा होगा कि संपत्ति का बंटवारा कर लें। हर किसी को हिस्सा मिल जाएगा, आगे की चिंता नहीं रहेगी।"
सुरेश ने हामी भर दी।
मां ने बहुत मना किया—"बेटा, बंटवारे से घर की खुशियां बिखर जाएंगी। जब तक मैं जिंदा हूं, बंटवारा मत करना।"
पर दोनों अपने निर्णय पर अड़े रहे।
सीमा को भी बुलवा लिया गया।
वकील आया। मां को बहुत दुख हुआ।
सीमा और दोनों भाई मिलकर कागज बनवाने लगे।
रमेश को बुलाया गया।
रमेश बोला—"आप सबका जो भी फैसला है, मुझे मंजूर है। मुझे जो हिस्सा देना है, दे देना। मैं तो शाम को काम से आकर अंगूठा लगा दूंगा।"
सीमा बोली—"तू हमेशा ऐसा ही रहेगा। बंटवारा सबके सामने होता है, आमने-सामने बैठकर।"
दोनों बड़े भाई भी ताने देने लगे—"हम जितना कमाते हैं, तू उसके आस-पास भी नहीं पहुंच सकता।"
वकील ने संपत्ति का विवरण पूछा—"कुल दस बीघा जमीन है और एक मकान। तीनों भाइयों और बहन को हिस्सा कैसे बांटना है?"
रमेश बोला—"पांच-पांच बीघा मेरे दोनों भाइयों के नाम लिख दो। जो मकान है, वो मेरी बहन के नाम कर दो।"
सब चौंक गए—"तू क्या लेगा?"
रमेश मुस्कराया—"मेरे हिस्से में मेरी मां है।"
फिर अपनी पत्नी की ओर देखकर बोला—"क्यों, सही कहा ना?"
पत्नी आंखों में आंसू लिए अपनी सास से लिपट गई—"मां से बड़ी वसीयत मेरे लिए कुछ नहीं।"
घर में सन्नाटा छा गया।
सीमा रोते हुए रमेश से लिपट गई—"माफ कर दो भैया, मैंने तुम्हें कभी समझा ही नहीं।"
रमेश बोला—"बहन, यह घर तेरा भी है, जितना मेरा। बंटवारा तो मजबूरी का नाम है, अगर दिल से कोई रिश्ता नहीं है तो बंटवारा कर भी लोगे, रिश्ते टूट जाएंगे। लेकिन मां के आंचल के नीचे सब एक जैसे हैं—डॉक्टर, इंजीनियर या मजदूर।"
प्रमोद और सुरेश का सिर शर्म से झुक गया।
उन्होंने बंटवारे के कागज फाड़ दिए।
मां ने दोनों बेटों को गले लगा लिया। रमेश और उसकी पत्नी मां के चरणों में झुक गए।
उस दिन के बाद परिवार में कभी बंटवारे की बात नहीं हुई।
घर फिर से हंसने-बोलने लगा। त्योहार, तीज-त्यौहार सब एक साथ, पूरे जोश के साथ मनाए जाने लगे। गांव वालों के लिए सुखराम का परिवार फिर से एक मिसाल बन गया—
"जहां मां का आंचल है, वहां कभी बंटवारा नहीं होता।"
दोस्तों रिश्तों की असली दौलत घर, जमीन या पैसे नहीं, बल्कि आपसी प्रेम, सम्मान और मां के आंचल की छांव है। परिवार को बांटने के बजाय दिलों को जोड़ना ही असली सुख है।
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