अनमोल आशीर्वाद

   विशाल अपने कुछ दोस्तों और बिज़नेस पार्टनर्स के साथ घर पर लंच पार्टी दे रहा था। सब लोग आलीशान ड्रॉइंग रूम में बैठे थे। AC की ठंडी हवा, सोफों पर आराम से टिके मेहमान, और टेबल पर महंगे व्यंजन सजाए गए थे।

इसी बीच विशाल के पिताजी गोविंद दास जी धीरे-धीरे चलते हुए कमरे में आए। साधारण-सी धोती और ढीली-सी कुर्ता पहने हुए। हाथ में तांबे का गिलास था।

“बेटा, जरा फ़िल्टर का पानी भरवा देना, गिलास खाली हो गया है,” गोविंद दास जी ने सहजता से कहा।

विशाल का चेहरा तमतमा गया।

“पापा! आप बीच में क्यों आ गए? आपको कितनी बार कहा है कि जब घर में मेहमान आए हों तो अपने कमरे से बाहर मत निकला कीजिए। आपको पता भी है ये लोग मेरे बिज़नेस पार्टनर हैं। आपकी ये धोती-कुर्ता देखकर क्या इम्प्रेशन जाएगा? सब समझेंगे कि मैं किसी देहाती परिवार से हूँ!”

कमरे में सन्नाटा छा गया। कुछ लोग झेंपकर इधर-उधर देखने लगे। गोविंद दास जी की आँखें झुक गईं।

“बेटा, मुझे तो बस पानी चाहिए था…” वे धीरे से बोले।

“तो नौकर को बुला लेते! आपकी आदत ही है, मुझे सबके सामने शर्मिंदा करने की।” विशाल ने तेज आवाज़ में कहा।

गोविंद दास जी चुपचाप वापस अपने कमरे में चले गए। आँखों से आँसू टपक पड़े। उनकी पत्नी का देहांत कई साल पहले हो चुका था। अब वे सिर्फ बेटे-बहू और पोते के साथ रहते थे। सोचा था बुढ़ापे में बेटा सहारा बनेगा, लेकिन सहारा तो दूर, अब तो अपमान ही उनका हिस्सा रह गया था।

शाम को जब मेहमान चले गए, बहू ने विशाल से कहा—
“आपने ठीक नहीं किया। पापा जी तो बस पानी लेने आए थे। आपको इस तरह डांटना नहीं चाहिए था।”

विशाल गुस्से में बोला—
“तुम नहीं समझतीं। मेरी इमेज सबके सामने खराब हो गई। कोई समझेगा कि इतना बड़ा बिज़नेसमैन होकर भी घर का माहौल कितना गँवार है।”

अगली सुबह जब विशाल सोकर उठा, तो उसके पिताजी कमरे में नहीं थे। बिस्तर खाली था और मेज पर एक चिट्ठी रखी थी।

“प्रिय बेटे विशाल,

मैंने अपनी पूरी उम्र तेरी सफलता के लिए लगा दी। खेत बेचकर तुझे पढ़ाया, छोटे-मोटे काम करके तुझे खड़ा किया। सोचा था बुढ़ापे में तू मेरा सहारा बनेगा। पर लगता है, मैं तेरी तरक्की और इमेज के बीच बोझ बन गया हूँ।

बेटा, मैं अब इस घर से जा रहा हूँ। मुझे मत ढूँढना। जहाँ रहूँगा, आत्मसम्मान से रहूँगा।

ईश्वर तुझे खूब तरक्की दे।

—तेरा बूढ़ा, देहाती बाप

विशाल के हाथ काँपने लगे। उसने पूरे घर में तलाशा, लेकिन पिताजी नहीं मिले। मोहल्ले वालों से पता चला कि सुबह-सुबह स्टेशन जाते हुए उन्हें देखा था।

कुछ ही महीनों बाद विशाल के बिज़नेस पर गहरा संकट आ गया। एक बड़ा प्रोजेक्ट डूब गया, बैंक का कर्ज़ सिर पर चढ़ गया। जिन दोस्तों और पार्टनर्स के सामने वह पिता को लेकर शर्मिंदा हो रहा था, वही लोग अब उसका साथ छोड़ चुके थे।

विशाल की कंपनी बंद हो गई। आलीशान बंगला और कारें बिक गईं। अब वह एक मामूली नौकरी के लिए दर-दर भटकने लगा।

बहू भी परेशान थी, बच्चे स्कूल बदलने को मजबूर हुए। जीवन में मानो अंधेरा छा गया।

एक रात विशाल बहुत देर तक सो नहीं सका। आँखों के सामने बार-बार पिताजी का झुका चेहरा और उनकी चिट्ठी घूम रही थी। उसे अहसास हुआ कि उसकी तरक्की सिर्फ उसकी मेहनत से नहीं थी। उसके पीछे पिता के आशीर्वाद और त्याग का हाथ था।

“काश, मैंने उस दिन पापा को डांटा न होता… काश, मैं उन्हें माँ की तरह सम्मान देता…”

आखिरकार विशाल ने पिताजी को ढूँढने का निश्चय किया। कई शहरों में खोजा। एक दिन हरिद्वार के घाट पर उसकी नज़र एक बुज़ुर्ग पर पड़ी, जो साधारण कपड़ों में यात्रियों को पूजा-पाठ करवा रहे थे।

वह दौड़कर पहुँचा।

“पापा…!”

गोविंद दास जी ने मुड़कर देखा। आँखों में ठहराव था।

“क्या चाहिए तुम्हें, बेटे? अब क्यों आए हो? मैंने तो कहा था मुझे मत ढूँढना।”

विशाल घुटनों के बल बैठ गया—
“पापा, मुझे माफ़ कर दीजिए। मैंने आपको बहुत दुख दिया। आपकी डाँट और आशीर्वाद ही मेरी असली पूँजी थे। आपके आशीर्वाद का हाथ हटते ही सबकुछ बिखर गया। कृपया मेरे साथ चलिए। घर आपका इंतज़ार कर रहा है।”

गोविंद दास जी ने गहरी साँस ली।
“बेटा, घर तो अब तेरा है। मैं वहाँ बोझ ही बनूँगा। पर अगर तू सच में बदल गया है तो एक वचन दे—अब कभी अपने माता-पिता को अपमानित न करेगा। और अपने बच्चों को भी यही सिखाएगा कि माँ-बाप जीवन का असली आशीर्वाद होते हैं।”

विशाल ने रोते हुए वचन दिया।

उस दिन के बाद विशाल ने अपने पिता को सिर्फ “पापा” नहीं, बल्कि भगवान का रूप मान लिया। साधारण कपड़े पहने हुए पिताजी अब उसे देहाती नहीं, बल्कि उसकी असली ताक़त लगते थे।

घर का माहौल बदल गया। विशाल ने भले ही फिर बड़ी सफलता न पाई हो, लेकिन पिता के आशीर्वाद से उसका परिवार फिर खुशियों से भर गया।

लेखिका : संगीता अग्रवाल


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