दिल्ली की भीड़-भाड़ वाली सड़क पर सुशीला देवी धीरे-धीरे चल रही थीं। उम्र करीब 65 साल, चेहरा झुर्रियों से भरा, मगर आँखों में गहरी उदासी। पति का देहांत पाँच साल पहले हो चुका था और बेटा-बेटी अपनी दुनिया में खोए हुए थे।
अचानक पीछे से किसी ने उनके पैर छुए।
“माँ जी, आशीर्वाद दीजिए।”
सुशीला देवी चौंक पड़ीं। सामने खड़ी थी एक लगभग 25-26 साल की लड़की। साधारण सलवार-कुर्ता पहने, पर चेहरे पर तेज़ और आँखों में अपनापन।
“बेटी, मैं तुम्हें जानती तक नहीं, फिर मेरे पैर क्यों छू रही हो?” सुशीला देवी ने आश्चर्य से पूछा।
लड़की मुस्कुराई—
“आप नहीं जानतीं, लेकिन मैं आपको भली-भाँति जानती हूँ। आज मैं जो कुछ भी हूँ, आपकी वजह से हूँ।”
“मैं राधा हूँ… याद है, बारह साल पहले आप महिला आश्रम आई थीं अपने पति के जन्मदिन पर? सबको मिठाई और कपड़े बाँट रही थीं। तभी आपने मुझे एक कोने में चुपचाप बैठा देखा था। मैं बाकी बच्चों की तरह खिलौनों और मिठाई के पीछे नहीं भागी थी।”
सुशीला जी की आँखें फैल गईं।
“अरे हाँ… याद आया! तुम वही लड़की हो न, जो पुराने किताबों को सीने से लगाए बैठी थी? मैंने तुमसे पूछा था कि क्यों नहीं ले रही मिठाई? तब तुमने कहा था— ‘मुझे भूख से ज्यादा डर है अनपढ़ रह जाने का।’”
राधा की आँखें नम हो गईं।
“जी माँ जी। वही दिन मेरी ज़िंदगी का सबसे बड़ा मोड़ था। आपने आश्रम वालों से कहा था— इस बच्ची की पढ़ाई-लिखाई की पूरी ज़िम्मेदारी मेरी होगी। उसके बाद हर महीने आपने पैसे भिजवाए, किताबें भेजीं और यहाँ तक कि मुझे अच्छे स्कूल में दाखिला दिलवाया।”
सुशीला की आँखों से आँसू बह निकले।
“बेटी, मुझे तो लगा था मैंने बस एक छोटा-सा काम किया है। पर सच कहूँ, कुछ दिनों बाद मेरी दुनिया उजड़ गई। पति स्वर्ग सिधार गए, बेटा विदेश में बस गया और बेटी ससुराल में इतनी व्यस्त हो गई कि शायद महीनों बाद फोन करती है। आज घर होते हुए भी मैं अकेली हूँ।”
राधा ने उनका हाथ थाम लिया।
“नहीं माँ जी, अब आप अकेली नहीं हैं। आपने मुझे माँ का साया दिया था, अब मैं आपको बेटी का सहारा दूँगी।”
राधा ने आगे बताया—
“माँ जी, आपकी मदद से मैंने पढ़ाई पूरी की। फिर मेहनत से प्रतियोगी परीक्षा पास की और आज मैं दिल्ली में प्रशासनिक अधिकारी बन चुकी हूँ। जो भी सम्मान मुझे मिला है, उसमें आपकी आशीष सबसे बड़ी वजह है। मैंने हमेशा सोचा था कि एक दिन आपसे मिलूँगी और अपना कर्ज़ चुकाऊँगी।”
सुशीला जी ने भावुक होकर कहा—
“बेटी, मैंने तो बस इंसानियत निभाई थी। पर आज जान रही हूँ कि अच्छे कर्म का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता। तू सचमुच मेरी बेटी जैसी है।”
उस दिन के बाद राधा अक्सर सुशीला जी से मिलने आने लगी। कभी दवा लेकर आती, कभी उन्हें डॉक्टर के पास ले जाती, कभी शाम को पार्क में घुमा लाती। धीरे-धीरे मोहल्ले के लोग कहने लगे—
“ये राधा तो सगी बेटी से भी बढ़कर है।”
सुशीला जी का अकेलापन मिटने लगा। उन्होंने महसूस किया कि खून का रिश्ता ही सबकुछ नहीं होता, सच्चा रिश्ता दिल से बनता है।
एक दिन सुशीला जी ने कहा—
“बेटी, मैं बूढ़ी हो चली हूँ। शायद ज्यादा दिन तेरे साथ न रह पाऊँ। पर एक वचन दे—जिस तरह मैंने तुझे सहारा दिया था, तू भी किसी और बच्चे की पढ़ाई की ज़िम्मेदारी उठाएगी।”
राधा ने तुरंत हाथ जोड़ दिए—
“माँ जी, यह वचन तो मैंने कब का ले लिया है। आपकी प्रेरणा से मैंने दो अनाथ बच्चियों की पढ़ाई संभाल रखी है। चाहती हूँ कि वे भी आगे चलकर किसी और की ज़िंदगी रोशन करें।”
सुशीला जी की आँखों में चमक आ गई।
“अब मुझे चैन है। मेरी दी हुई रोशनी आगे भी फैलती रहेगी।”
समय बीता। सुशीला जी को अब अकेलापन नहीं सताता था। राधा हर सुख-दुख में उनके साथ थी। लोगों ने कई बार ताना दिया कि “ये तुम्हारी सगी बेटी तो नहीं है,” लेकिन सुशीला जी गर्व से कहतीं—
“राधा मेरी बेटियों से भी बढ़कर है। जन्म से नहीं, कर्म से रिश्ता बनता है। और ये रिश्ता ही सबसे अनमोल होता है।”
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