“माधव, भट्ठी जलाने से पहले दो मिनट रुक जाओ। मुझे तुमसे कुछ ज़रूरी बात करनी है।”
केशव ने अपने छोटे भाई माधव के कंधे पर हाथ रखते हुए कहा। सुबह के चार बज रहे थे। लखनऊ की पुरानी गलियों में स्थित ‘रघुनाथ मिष्ठान भंडार’ के पिछले हिस्से में, जहाँ उनकी पुश्तैनी रसोई थी, अभी भी अंधेरा छाया हुआ था। केवल भट्ठी के पास जलते हुए एक छोटे से बल्ब की पीली रोशनी थी।
माधव ने हाथ में पकड़ी हुई बड़ी कलछी को नीचे रख दिया। उसके माथे पर पसीने की बूँदें थीं, जो भट्ठी की गर्मी से नहीं, बल्कि एक अजीब सी घबराहट से उभर आई थीं। केशव का स्वर आज सामान्य नहीं था। उसमें एक भारीपन था, जो बरसों से चले आ रहे इस दूध और केसर की महक वाले रिश्ते पर बोझ बन रहा था।
“हाँ भैया, कहिए न। सब खैरियत तो है? क्या दूध वाले ने फिर दाम बढ़ाने की बात की है?” माधव ने सहज बनने की कोशिश की, एक पुरानी लकड़ी की मेज का सहारा लेते हुए।
“नहीं माधव, बात दूध या चीनी के दाम की नहीं है,” केशव ने नज़रें चुराते हुए कहा। वह अपनी धोती के छोर को उंगलियों में मरोड़ रहा था। “बात हमारे और तुम्हारे बीच की है। पिछले कुछ हफ्तों से मेरे बेटे, विकास और सुमित, मुझसे कह रहे हैं कि अब ज़माना बदल गया है। वे चाहते हैं कि हम इस दुकान और ब्रांड का बँटवारा कर लें। वे अपनी हिस्सेदारी लेकर शहर के नए मॉल में एक आउटलेट खोलना चाहते हैं।”
माधव के कानों में जैसे पिघला हुआ सीसा उतर गया। जिस कड़ाही में वह पिछले तीस सालों से अपने बड़े भाई के साथ मिलकर दूध औटा रहा था, आज वही दूध उसे फटता हुआ महसूस हुआ।
“बँटवारा?” माधव का स्वर काँप गया। “भैया, यह आप क्या कह रहे हैं? बाबूजी ने मरते वक्त हमारा हाथ एक-दूसरे के हाथ में दिया था। यह दुकान सिर्फ ईंट-गारे की इमारत नहीं है, यह हमारी विरासत है। ‘रघुनाथ की जलेबी’ का स्वाद इसलिए मशहूर है क्योंकि हम दोनों भाई इसे एक साथ, एक ही नीयत से बनाते हैं। अगर हम बँट गए, तो वह स्वाद...”
“स्वाद से घर नहीं चलता माधव!” केशव अचानक थोड़े ऊँचे स्वर में बोला, जैसे वह खुद को ही समझाने की कोशिश कर रहा हो। “देखो, मैं बूढ़ा हो रहा हूँ। मेरे लड़के पढ़-लिखकर एमबीए कर चुके हैं। वे कहते हैं कि हम पुरानी लकीर के फकीर बने बैठे हैं। वे इस दुकान को ‘फ्रेंचाइजी’ बनाना चाहते हैं। और इसके लिए उन्हें कैपिटल चाहिए, जो दुकान के बँटवारे से ही निकलेगा। मैंने सोच लिया है। वकील आज दोपहर को कागज़ात लेकर आएगा।”
केशव अपनी बात कहकर तेज़ी से रसोई से बाहर निकल गया, जैसे वह माधव की आँखों में आए आंसुओं को देखना नहीं चाहता था। माधव वहीं, ठंडी पड़ी भट्ठी के पास बुत बनकर खड़ा रह गया।
उस दिन पहली बार ‘रघुनाथ मिष्ठान भंडार’ की शटर देर से खुली। ग्राहकों की भीड़ बाहर इंतज़ार कर रही थी, लेकिन अंदर का सन्नाटा चीख रहा था।
अगले कुछ दिन घर का माहौल किसी युद्ध के मैदान जैसा हो गया। केशव का परिवार—उसकी पत्नी और दोनों बेटे—पूरी तरह से व्यावसायिक हो चुके थे। वे डाइनिंग टेबल पर कैलकुलेटर लेकर बैठते और दुकान की एक-एक इंच ज़मीन, बर्तनों और यहाँ तक कि पुराने ग्राहकों की लिस्ट का भी बँटवारा करने की योजना बनाते।
माधव की पत्नी, सुजाता, जो बहुत शांत स्वभाव की थी, उसने माधव को समझाया, “सुनिए, अगर जेठ जी यही चाहते हैं, तो मान जाइए। रोज़-रोज़ की किचकिच से तो अच्छा है कि हम अपनी अलग राह पकड़ लें। आपके हाथ में जो जादू है, उसे कोई नहीं छीन सकता।”
लेकिन माधव जानता था कि यह जादू उसके अकेले का नहीं था। केशव भैया चाशनी की तार परखने में माहिर थे, और माधव तलने में। दोनों एक-दूसरे के पूरक थे। एक के बिना दूसरा अधूरा था।
आखिरकार, बँटवारे का दिन आ ही गया। दुकान के बीचों-बीच एक लकड़ी का पार्टिशन खड़ा कर दिया गया। बायीं तरफ का हिस्सा केशव के पास गया, जिसे उनके बेटों ने तुरंत रेनोवेट करवाना शुरू कर दिया। उन्होंने वहाँ एसी लगवाए, कांच के दरवाज़े लगाए और नाम रखा—‘रघुनाथ स्वीट्स एंड बेकर्स’।
दायीं तरफ का छोटा हिस्सा माधव के पास रहा। उसने कोई बदलाव नहीं किया। वही पुरानी गद्दी, वही लकड़ी के काउंटर और वही पुरानी कड़ाही। उसने अपने हिस्से का नाम रखा—‘असली रघुनाथ स्वाद’।
शुरुआत में, केशव की नई दुकान पर भारी भीड़ उमड़ी। चमक-धमक, एयर कंडीशनर और वेटर की वर्दी ने लोगों को आकर्षित किया। विकास और सुमित ने पुरानी जलेबी की जगह डोनट्स और पेस्ट्रीज़ भी रखनी शुरू कर दीं। उन्होंने जलेबी बनाने के लिए मशीनें मंगवा लीं ताकि काम जल्दी हो सके।
दूसरी ओर, माधव की दुकान पर सन्नाटा था। लोग नई दुकान की चकाचौंध देख रहे थे। माधव सुबह चार बजे उठता, अकेले भट्ठी जलाता, और उसी शिद्दत से रबड़ी और जलेबी बनाता, जैसे वह बरसों से बनाता आ रहा था। लेकिन अब उसके पास केशव भैया नहीं थे जो चखकर बताते कि “माधव, आज इलायची थोड़ी कम है।” उसे वह कमी हर पल खलती थी।
एक महीना बीत गया।
धीरे-धीरे हवा का रुख बदलने लगा। केशव की दुकान पर मशीन से बनी जलेबियों में वो बात नहीं थी। वे दिखने में तो बिल्कुल गोल और एक जैसी थीं, लेकिन उनमें वह ‘खमिर’ और वह ‘लोच’ नहीं था जो हाथ से फेंटे हुए मैदे में होता था। चाशनी भी ज़्यादा मीठी और चिपचिपी होती थी क्योंकि केशव अब खुद गल्ले पर बैठता था, रसोई में नहीं जाता था। सारा काम कारीगरों और मशीनों के भरोसे था।
पुराने ग्राहक, जो स्वाद के पारखी थे, एक बार नई दुकान में जाकर ठगा हुआ महसूस करते और फिर धीरे से खिसक कर माधव की पुरानी दिखने वाली दुकान पर आने लगे।
“अरे माधव भैया,” पुराने ग्राहक दीनदयाल जी ने कुल्हड़ वाली लस्सी पीते हुए कहा, “वो बात नहीं रही उस तरफ। एसी की हवा में जलेबी ठंडी हो जाती है और स्वाद भी बाज़ारू हो गया है। असली मज़ा तो अभी भी तुम्हारे हाथ में ही है।”
माधव मुस्कुरा देता, लेकिन उसका दिल रोता। वह देखता कि कैसे कांच के उस पार केशव भैया गल्ले पर बैठे-बैठे ऊंघ रहे हैं। उनके बेटे दुकान पर कम और मोबाइल पर ज़्यादा व्यस्त रहते।
एक दिन शाम को भारी बारिश हो रही थी। लखनऊ की सड़कों पर पानी भर गया था। माधव अपनी दुकान बढ़ा रहा था कि तभी उसने देखा कि केशव की दुकान के बाहर एक हंगामा हो रहा है।
वह दौड़कर बाहर आया। देखा तो फूड इंस्पेक्टर और कुछ अधिकारी केशव की दुकान के अंदर खड़े थे। विकास और सुमित घबराए हुए थे।
“आपके मिठाइयों में मिलावटी रंग और अमानक तेल पाया गया है,” इंस्पेक्टर चिल्ला रहा था। “हमे शिकायत मिली थी। सैंपल फेल हो गए हैं। दुकान सील करनी पड़ेगी।”
केशव कोने में खड़ा काँप रहा था। उसके चेहरे पर बदहवाशियां उड़ रही थीं। जिस साख को उसके पिता और उसने पचास सालों में बनाया था, उसे उसके बेटों के लालच ने पचास दिनों में मिट्टी में मिला दिया था। वे ज़्यादा मुनाफे के चक्कर में सस्ते तेल और केमिकल वाले रंगों का इस्तेमाल कर रहे थे, और केशव को इसकी भनक तक नहीं लगने दी थी।
भीड़ जमा हो गई थी। लोग थू-थू कर रहे थे। “अरे, रघुनाथ जी का नाम डुबो दिया इन लोगों ने।”
माधव से रहा नहीं गया। वह भीड़ को चीरता हुआ अंदर गया।
“साहब, कुछ गलतफहमी हुई होगी,” माधव ने इंस्पेक्टर के सामने हाथ जोड़ते हुए कहा।
“कौन हो तुम?” इंस्पेक्टर ने कड़क कर पूछा।
“मैं इनका छोटा भाई हूँ। और यह दुकान... यह दुकान अलग ज़रूर दिखती है, लेकिन हमारा लाइसेंस नंबर एक ही परिवार के नाम पर है,” माधव ने झूठ बोला, ताकि भाई की इज़्ज़त बच जाए। “शायद लड़कों से गलती हो गई होगी सप्लायर चुनने में। आप जुर्माना लगा दीजिये, लेकिन दुकान सील मत कीजिये। यह हमारे बाबूजी की निशानी है।”
केशव ने फटी-फटी आँखों से माधव को देखा। जिस भाई को उसने दुत्कार कर अलग कर दिया था, आज वही उसकी ढाल बनकर खड़ा था।
इंस्पेक्टर ने माधव की साख को पहचान लिया। पूरे शहर में माधव की ईमानदारी के चर्चे थे। “ठीक है माधव जी, आपके कहने पर वार्निंग देकर छोड़ रहे हैं और चालान काट रहे हैं। लेकिन अगर अगली बार ऐसा हुआ, तो लाइसेंस रद्द हो जाएगा।”
अधिकारी चले गए। भीड़ छंट गई। शटर गिरा दिया गया।
दुकान के अंदर अब सिर्फ केशव, माधव और केशव के दोनों बेटे थे। केशव के बेटे सिर झुकाए खड़े थे।
केशव धीरे से उठा और लड़खड़ाते हुए माधव के पास आया। उसने माधव के दोनों हाथों को अपने हाथों में ले लिया। उसकी आँखों से आँसू बह निकले और उसकी सफ़ेद दाढ़ी को भिगोने लगे।
“माधव...” केशव का गला रुंध गया। “मैं हार गया, मेरे भाई। मैं चकाचौंध में अंधा हो गया था। मुझे लगा था कि मशीनें और डिग्री वाले बेटे दूकान को आगे ले जाएंगे। लेकिन मैं भूल गया था कि ‘रघुनाथ’ का स्वाद तेल और चीनी में नहीं, हमारी ईमानदारी में था। आज अगर तुम नहीं होते, तो बाबूजी की तस्वीर पर कालिख पुत जाती।”
विकास और सुमित भी शर्मिंदा थे। उन्होंने आगे बढ़कर चाचा के पैर छुए। “चाचा जी, हमें माफ़ कर दीजिये। हम बिजनेस को प्रॉफिट से तौलने लगे थे, विरासत को भूल गए थे।”
माधव ने केशव को गले लगा लिया। “भैया, दुकान के दो हिस्से हो सकते हैं, लेकिन चूल्हे की आग को कैसे बाँटोगे? वो तो एक ही रहती है न? आपकी परख और मेरी मेहनत—जब तक ये दोनों नहीं मिलेंगे, तब तक वह स्वाद वापस नहीं आएगा।”
अगली सुबह, लखनऊ के लोगों ने एक अजीब नज़ारा देखा।
‘रघुनाथ मिष्ठान भंडार’ के बीच का वह लकड़ी का पार्टिशन हटा दिया गया था। एसी और फैंसी कांच के दरवाज़े अभी भी लगे थे, लेकिन अंदर का नज़ारा बदल चुका था।
केशव और माधव, दोनों एक साथ, उसी पुरानी बड़ी कड़ाही के पास बैठे थे। केशव चाशनी की जाँच कर रहा था और माधव जलेबियाँ तल रहा था। दुकान के बाहर जो बोर्ड लगा था, उस पर से ‘स्वीट्स एंड बेकर्स’ और ‘असली स्वाद’ जैसे शब्द हटा दिए गए थे। अब वहाँ सिर्फ एक ही बोर्ड था— “रघुनाथ और संस (स्थापना 1970)”।
महक फिर से वही थी। वह महक जो सिर्फ घी और इलायची की नहीं थी, बल्कि भाईचारे और पश्चाताप के आंसुओं से धुली हुई पवित्रता की थी।
विकास और सुमित अब काउंटर पर नहीं बैठे थे। उन्होंने एप्रन पहन रखा था और वे ग्राहकों को पानी पिला रहे थे और जूठे दोने उठा रहे थे। केशव ने उनसे कहा था, “अगर इस गद्दी का मालिक बनना है, तो पहले नौकर बनना सीखना होगा। स्वाद को समझना है, तो पहले भट्ठी की तपिश सहनी होगी।”
दोपहर को जब भीड़ कम हुई, तो केशव ने माधव के लिए अपने हाथों से पान लगाया और उसे थमाते हुए कहा, “माधव, कल से मुझे सुबह चार बजे जगा देना। बुढ़ापा आ गया है, लेकिन अभी इतना भी नहीं कि अपने छोटे भाई के साथ कदम मिलाकर न चल सकूँ।”
माधव मुस्कुराया और पान मुँह में दबा लिया। उस दिन की जलेबी शहर में सबसे मीठी थी, क्योंकि उसमें कड़वाहट की कोई मिलावट नहीं बची थी।
रिश्तों की डोर जब स्वार्थ के ब्लेड से कटने लगती है, तो उसे जोड़ने के लिए त्याग और माफ़ कर देने की गोंद ही काम आती है। रघुनाथ भंडार अब सिर्फ एक दुकान नहीं, बल्कि एक सबक बन गया था—कि जड़ें अगर एक हों, तो शाखाएं कितनी भी दूर क्यों न जाएँ, पोषण उन्हें एक ही ज़मीन से मिलता है। अलग होकर वे सिर्फ सूख सकती हैं, पनप नहीं सकतीं।
लेखक : नमित खरे
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