आख़िरी सफ़र

 दिल का दौरा पड़ने से पूरे घर में हड़कम मच गया चारो तरफ अफरा तफरी का माहौल  कोई सोते सोते जग गया तो कोई सिंक में बर्तन छोड़ कर तो कोई आधे गीले बदन के साथ गाउन में खुद को लपेट कर।सब बाबू जी को घेर कर खड़े हैं ।भाई समय ही ऐसा था कोई क्या करता ? सुबह चार बजे का समय  घर कि  सभी औरतें उठ गईं थीं सिवा छोटी बहू के क्योंकि उसकी अभी नई नई शादी हुई है और बाकी के तो बच्चे पढ़ाई लायक हैं तो सभी रसोई में लगी है कोई सफाई तो कोई टिफिन तो कोई स्नान में ,घर में रवि के तीन बहुएं है और सभी मिल जुल कर सारे काम निपटाती हैं।पर कुछ दिनों से या ये कह लो कि जब से सास का इंतकाल हुआ है कुछ तनावपूर्ण माहौल रहता है जो कि महसूस होता है  दिखता नही पड़ता।

इसी वजह से रवि ने  सबकी रसोई अलग करने का फैसला किया और सबको अलग कर दिया।पहले तो लोगों ने ना नुकुर की पर बाद में धीरे धीरे सब सहज हो गई।और फिर क्या वक़्त वक़्त पर उन्हें भी नाश्ता खाना दवाई सब मिलने लगा और वो सब भी खुश रहने लगीं पर अचानक आये सुबह के इस अटैक ने सब को हिला के रख दिया फिर हाल तो घर में रखी दवा से काम चलाता और  दस बजने का इंतेज़ार करने लगे और जैसे ही दस बजा सभी  लेकर  हास्पिटल पहुंच गए वहां पता चला भर्ती करना पड़ेगा आनन फानन में उन्हें आई सी यू में भर्ती करा दिया गया पर देखने कोई समय समय पर भी नही आ पाता।

नर्स से पूछने पर पता चलता कि जब वो आते हैं तो मिलने का समय खत्म हो चुका होता है।और मिलने के समय में कोई आफिस में रहता है तो कोई बच्चों के ट्यूशन में।

इस लिए देख रेख का सारा जिम्मा वहां की नर्स को ही दे दिया गया पर है ये सुन रवि को थोड़ा अटपटा लगा पर चुप रहा । हां जिस दिन छुट्टी हुई उस दिन बड़ा बेटा जरूर आया छुट्टी कराने वो भी ये कहते हुए कि आज जरूरी मीटिंग पोस्ट फोन करके आया हूँ और अब तबीयत कैसी है आप की आई एम सो स्वारी मैं आ नही पाया और आज भी बड़ी मुश्किल से छुट्टी मिली ।

वैसे मैने आपकी देख रेख के इंतजामात कर दिये थे।

चलिये घर चलते हैं फिर देखते हैं क्या कुछ हो सकता है।कहते हुए उसने डिस्चार्ज फाइल उठाई और नर्स को इशारे से पापा को व्हील चेयर पर बैठाकर लिफ्ट तक ले चलने   का इशारा कर  खुद लिफ्ट के पास जाकर खड़ा हो गया।

ऐसे में रवि के मन में एक ही अंतर द्वंद चल रहा जब यहां कोई देखने नही आया तो घर जाकर कौन करेगा मेरी कैसे रहूंगा मैं ।जिसे शायद रेखा ने पढ़ लिया था और बोली रवि जी 

बंधनों से परे भी बंधन होते हैं जो दिखाई नही देते सिर्फ़ महसूस होते हैं ।और हम समझते हैं कि वही अपने होते  हैं। जो वक्त बेवक्त हमसे बिछड़ते रहते हैं।रवि जी , वो नही ,कभी महसूस करके देखियेगा । एक टक देखते हुए उसने नज़रे झुकाते हुए कहा  सही कह रही हैं आप रेखा जी , हम सब जिन बंधनों में ता उम्र सुकून ढूढ़ते  हैं दरसल वो स्वार्थ के और खोखले होते हैं। तभी तो वक्त दर वक्त बदलते और बिछड़ते रहते हैं और हम हैं उन्हीं में उनसे बिछड़ के भी उन्हीं के लिए आंसू बहाते  हैं।मगर सच तो ये है कि जो तमाम बंधनों से परे फर्ज और इंसानियत से लिपटे होते हैं हक़ीकत में वो ही सच्चे और मज़बूत रिश्ते होते हैं। आज उन्हें इस बात का अहसास हुआ कि स्त्री मां ,बहन , पत्नी,प्रेयसी से आगे भी है जो निस्वार्थ और समर्पित भाव से तब तक साथ रहती है जब तक इंसान स्वस्थ न हो जाये ।ये जानते हुए भी कि जुड़ने वाले के साथ का सफ़र अति सूक्ष्म है।फिर भी हंसते हुए कुशल जीवन की कामना करती है ।

धन्य है तू नारी तेरे न दिखने वाले रूप तो अति प्रभावशाली है।।

दरसल हुआ ये कि दुगनी तनख्वाह के साथ बेटा उसे भी पिता जी के साथ घर ले आया था जो वहां उनकी देखभाल करेगी जिसे देखकर रवि बाबू स्तब्ध थे कि जिन रिश्तों में उम्र भर रहा उनसे अलग इंसानियत के रिश्तों के साथ जीवन का आख़िरी सफर गुजारेगा।

    धन्य है तू नारी धन्य है

कंचन श्रीवास्तव आरज़ू प्रयागराज


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