अनन्या की शादी को आठ साल हो चुके थे। शर्मा परिवार में वह बहू बनकर आई थी—संस्कारों, उम्मीदों और जिम्मेदारियों का एक बड़ा सा गठरी अपने कंधों पर लिए। शुरू-शुरू में सब कुछ सामान्य था। सास कमला जी उसे बेटी-सा स्नेह देती थीं, ससुर जी शांत स्वभाव के थे और पति रोहन समझदार। अनन्या को लगता था कि वह सचमुच एक अच्छा परिवार पा गई है।
लेकिन समय के साथ परिस्थितियाँ बदलने लगीं।
घर में हर निर्णय, हर परंपरा, हर नियम—सब पहले से तय थे। बहू का काम था बस उन्हें निभाना। अनन्या ने भी यही किया। उसने अपनी पसंद को चुपचाप किनारे रख दिया। सुबह उठने का समय, नाश्ते का मेन्यू, कपड़ों के रंग, त्योहारों की तैयारी—सब कुछ परिवार की मर्ज़ी से होता था।
“अच्छी बहू वही होती है जो घर में घुल-मिल जाए,”
कमला जी अक्सर कहा करती थीं।
अनन्या घुलती रही… हर दिन थोड़ा-थोड़ा।
उसने अपनी नौकरी छोड़ दी क्योंकि सास को लगता था कि “घर की बहू का बाहर काम करना अच्छा नहीं लगता।”
उसने अपनी सहेलियों से मिलना कम कर दिया क्योंकि “घर के काम पहले होते हैं।”
उसने अपनी किताबें, अपनी डायरी, अपने सपने—सब अलमारी के किसी कोने में रख दिए।
रोहन देखता था, पर ज़्यादातर चुप रहता।
“माँ का स्वभाव ऐसा ही है,” वह कह देता,
“तुम थोड़ा एडजस्ट कर लिया करो।”
अनन्या एडजस्ट करती रही।
लेकिन इंसान कितना ढल सकता है?
एक दिन उसकी माँ अस्पताल में भर्ती हुईं। अनन्या को उनके पास रुकना था। उसने कमला जी से कहा,
“माँ की तबीयत बहुत खराब है, मैं दो-तीन दिन उनके पास रहना चाहती हूँ।”
कमला जी का चेहरा सख्त हो गया।
“त्योहार सिर पर है, घर में इतना काम है… अभी जाना ज़रूरी है क्या?”
अनन्या कुछ बोल नहीं पाई।
उसकी आँखों में आँसू थे, पर आवाज़ नहीं।
उस रात उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली। वर्षों बाद।
पहले पन्ने पर लिखा था—
“तेरी मर्ज़ी से ढल जाऊँ हर बार,
यह मुमकिन तो नहीं—
आख़िर मैं भी इंसान हूँ।”
उसे याद आया—यह पंक्तियाँ उसने कॉलेज में लिखी थीं। तब वह अपने लिए खड़ी होना जानती थी। तब वह मुस्कुराती थी, खुलकर हँसती थी। आज वह खुद से ही दूर हो चुकी थी।
अगले दिन उसने पहली बार घर में अपनी बात रखी।
“माँ,” उसने सास से कहा,
“मैं आपकी बहू हूँ, पर मैं किसी की बेटी भी हूँ। अगर आज मैं अपनी माँ के पास नहीं जाऊँगी, तो ज़िंदगी भर खुद को माफ़ नहीं कर पाऊँगी।”
कमला जी चौंक गईं।
यह वही अनन्या नहीं थी जो हर बात पर ‘जी माँ’ कह देती थी।
रोहन भी पहली बार बोला,
“माँ, अनन्या सही कह रही है। हमें उसे समझना चाहिए।”
कमला जी कुछ देर चुप रहीं।
उन्हें अपना अतीत याद आ गया—जब वह खुद नई-नई बहू बनकर आई थीं, और अपनी माँ के लिए तरसती रह गई थीं। तब उनसे भी कहा गया था—
“बहू को इतना भाव नहीं देते।”
कमला जी की आँखें भर आईं।
“जा बेटा,” उन्होंने धीमे से कहा,
“अपनी माँ के पास जा।”
उस दिन अनन्या अस्पताल गई। अपनी माँ के सिर पर हाथ रखा। पहली बार उसे लगा कि उसने सही किया है।
घर लौटने के बाद सब कुछ एकदम नहीं बदला, पर एक शुरुआत ज़रूर हुई।
अब अनन्या चुप नहीं रहती थी।
वह सम्मान से अपनी बात रखती थी।
घर के लोग भी धीरे-धीरे समझने लगे कि समझौता और समर्पण में फर्क होता है।
एक शाम कमला जी ने खुद उससे कहा,
“बेटा, इंसान को इतना भी नहीं झुकना चाहिए कि वह टूट जाए। मैंने तुम्हें देर से समझा।”
अनन्या मुस्कुरा दी।
यह मुस्कान किसी जीत की नहीं थी, बल्कि खुद को वापस पाने की थी।
क्योंकि रिश्ते निभाने के लिए खुद को मिटा देना ज़रूरी नहीं होता।
कभी-कभी अपनी मर्ज़ी, अपनी भावनाएँ और अपनी पहचान बचाना भी उतना ही ज़रूरी होता है।
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